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बॉम्बे हाई कोर्ट के रिटायर्ड जज चेल्लुर ने पत्र लिखकर कहा, जज लोया की मौत एसआईटी जांच के लिए उपयुक्त केस

LiveLaw News Network
26 Nov 2017 2:11 PM GMT
बॉम्बे हाई कोर्ट के रिटायर्ड जज चेल्लुर ने पत्र लिखकर कहा, जज लोया की मौत एसआईटी जांच के लिए उपयुक्त केस
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बॉम्बे हाई कोर्ट के रिटायर्ड जज बीएच मरलापल्ले ने कथित रूप से बॉम्बे हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश मंजुला चेल्लुर चिट्ठी लिखकर ब्रिजगोपाल हरिकिशन लोया की संदिग्ध मौत के आरोपों की एसआईटी जांच कराने की मांग की है। लोया सीबीआई के विशेष जज थे और वह भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और गुजरात पुलिस के कई अधिकारियों के खिलाफ सोहराबुद्दीन फर्जी मुठभेड़ मामले की सुनवाई कर रहे थे।

न्यायमूर्ति मरलापल्ले ने कहा कि उनका यह दृढ़ विश्वास है कि यह एक ऐसा मामला है जिसकी विशेष जांच दल से जांच कराई जानी चाहिए। इसके बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट द्वारा अनुच्छेद 235 की उस व्याख्या का जिक्र किया जिसमें कहा गया है कि “हाई कोर्ट निचली न्यायपालिका का अभिभावक होता है”।

उन्होंने कहा कि इसलिए इस तरह की जांच निचली अदालत के जजों को “निश्चित रूप से यह विश्वास दिलाएगा कि वे अनाथ नहीं हैं”।

इससे पहले दिल्ली हाई कोर्ट के रिटायर्ड जज न्यायमूर्ति एपी शाह ने भी इस मामले पर अपनी प्रतिक्रया व्यक्त की थी। उन्होंने कहा था अगर न्यायमूर्ति लोया की मौत के बारे में उनके परिवार वालों के आरोपों की जांच नहीं की गई तो इससे न्यायपालिका विशेषकर इसके निचले कैडर को गलत संदेश जाएगा। उन्होंने न्यायमूर्ति लोया को 100 रुपए के घूस के कथित प्रस्ताव पर भी अपनी चिंता जाहिर की थी।

लोया की संदिग्ध मौत का मामला

जज लोया की मृत्यु संदिग्ध हालातों में होने के बारे में पहली बार रपट कारवाँ मैगज़ीन में प्रकाशित हुई। इस रपट में जज लोया की बहन अनुराधा बियानी, उनकी भांजी नुपुर बालाप्रसाद बियानी और पिता हरकिशन के बयान छपे हैं। इस मैगज़ीन के अनुसार लोया की पत्नी शर्मिला और पुत्र अनुज ने उस समय इसलिए इस पर कुछ भी नहीं बोला क्योंकि उन्हें अपनी जान का डर था।

इस रपट के अनुसार जज लोया अपने एक सहयोगी मुंबई की सत्र अदालत में जज स्वप्ना जोशी की पुत्री की शादी में 30 नवंबर 2014 को नागपुर गए थे। 1 दिसंबर 2014 को लोया के परिवार वालों को बताया गया कि ह्रदय गति रुक जाने से जज लोया की मौत हो गई है।

न्यूज़ चैनल एनडीटीवी को दिए एक इंटरव्यू में न्यायमूर्ति शाह ने कहा, “लोया के परिवार के लोग बहुत शिद्दत से यह महसूस कर रहे हैं कि उनकी मौत संदिग्ध हालात में हुई है। उनके कपड़ों पर खून के धब्बे से शुरू कर उनके पंचनामे की रिपोर्ट पर किसी और का हस्ताक्षर करना व अन्य परिस्थितिजन्य बातों को देखते हुए यह जरूरी है। इन लोगों का मानना है कि यह निष्कर्ष निकालना कि उनकी मौत हृदयगति रुक जाने से हुई, गलत है...

...मेरा मानना है कि यह बहुत जरूरी है कि न्यायपालिका के प्रमुख – या तो देश के मुख्य न्यायाधीश या बॉम्बे हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को इस मामले की पड़ताल करनी चाहिए।”

द वायर के साथ बातचीत में न्यायमूर्ति शाह ने कहा कि परिवार द्वारा लगाए गए आरोपों की जांच नहीं करने से “न्यायपालिका, विशेषकर इसके निचले कैडर को बहुत ही गलत संदेश जाएगा।” उन्होंने भ्रष्टाचार के आरोपों पर भी चिंता जताई क्योंकि आरोप लगाया जाता है कि जज लोया को 100 करोड़ रुपए घूस का प्रस्ताव दिया गया था।

न्यायमूर्ति शाह के हवाले से कहा गया, “यह जरूरी है कि हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश या सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश खुद ही इससे जुड़े दस्तावेजों की तहकीकात करें और तय करें कि जांच का आदेश दिया जाए या नहीं क्योंकि अगर इन आरोपों की जांच नहीं हुई तो इससे न्यायपालिका पर गंभीर धब्बा लग जाएगा।”

खुलासा

लोया की संदिग्ध हालात में मौत की रपट कैरेवान मैगज़ीन में पहली बार छपा जिसमें जज लोया के रिश्तेदारों के इंटरव्यूज छपे हैं – उनकी बहन अनुराधा बियानी, उनकी भतीजी नुपुर बालाप्रसाद बियानी और पिता हरकिशन के बयान हैं। इस मैगज़ीन के अनुसार, जज लोया की पत्नी शर्मिला और पुत्र अनुज को अपने जान का डर था और इसलिए वे लोग चुप रहे।

रिपोर्ट के अनुसार, जज लोया 30 नवंबर 2014 को एक सहयोगी जज जो कि मुंबई सत्र न्यायालय में जज थी, की बेटी की शादी में नागपुर गए थे। 1 दिसंबर को उनके परिवार के लोगों को फ़ोन आया कि भारी हृदयाघात के कारण जज लोया की मौत हो गई है।

पत्रकार निरंजन टाकले की खोजी रपट में कहा गया है कि दिल का दौड़ा पड़ने की कहानी में बहुत सारी विसंगतियां हैं। उनके मृत्यु के समय को लेकर विसंगतियां हैं, जज लोया का फ़ोन परिवार को सौंपने से पहले उस फ़ोन के सारे कॉल रिकॉर्ड और संदेश मिटा दिए गए थे। जज के पंचनामा पर किसी “मैयाताचा चुलातभाऊ” या चचेरे भाई ने हस्ताक्षर किया था जबकि उनके परिवार के लोगों का कहना है कि उनके परिवार में ऐसा कोई सदस्य है ही नहीं। इसके अलावा उनके परिवार के लोगों को जज लोया के कपड़ों पर खून के धब्बे थे।

एक अन्य आलेख में आरोप लगाया गया है कि न्यायमूर्ति मोहित शाह ने अमित शाह के पक्ष में फैसला देने के बदले जज लोया को 100 करोड़ रुपए का प्रस्ताव दिया था।

“मेरे भाई को पक्ष में फैसला सुनाने के लिए 100 करोड़ रुपए धूस का प्रस्ताव् दिया गया। मोहित शाह ने खुद ही यह प्रस्ताव दिया था।”

जज लोया की मृत्यु के बाद नए जज एमबी गोसावी ने तीन दिन तक मामले की सुनवाई करने के बाद अमित शाह को बरी कर दिया। आलेख ने इस मामले की जिस तरह से सुनवाई की गई उसकी भी आलोचना की और कहा कि इससे सितम्बर 2012 में सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश का उल्लंघन हुआ है कि “शुरू से अंत तक इस मामले की सुनवाई एक ही अधिकारी करेगा।”

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