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पैतृक पक्ष में एक को जाति प्रमाणपत्र जारी किया जाता है तो खून के अन्य रिश्तों में भी उसे जारी किया जा सकता है : बॉम्बे हाई कोर्ट [निर्णय पढ़ें]

LiveLaw News Network
25 Nov 2017 11:30 AM GMT
पैतृक पक्ष में एक को जाति प्रमाणपत्र जारी किया जाता है तो खून के अन्य रिश्तों में भी उसे जारी किया जा सकता है : बॉम्बे हाई कोर्ट [निर्णय पढ़ें]
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बॉम्बे हाई कोर्ट ने कहा कि एक बार अगर पूरी जांच के बाद जाति प्रमाणपत्र खून के रिश्ते में जारी कर दिया जाता है तो पैतृक पक्ष में ऐसे ही दूसरे खून के रिश्ते को भी प्रमाणपत्र जारी हो सकता है।

बॉम्बे हाई कोर्ट के जस्टिस अनूप मेहता और जस्टिस मनीष पिटाले की बेंच ने दो भाइयों की अर्जी पर ये फैसला दिया। मुकेश वास्तव और विलास वास्तव की ओर से जाति जांच समिति के फैसले को चुनौती दी गई थी। इन दोनों को जारी सर्टिफिकेट को समिति ने अवैध करार दे दिया था।

याचिकाकर्ताओं को कार्यपालक मैजिस्ट्रेट ने 20 जून 1994 को एसटी श्रेणी के लिए सर्टिफिकेट जारी किया था। इन  दोनों याचिकाकर्ताओं को इस आधार पर नौकरी भी मिल गई। मुकेश को पोस्टल असिस्टेंट की नौकरी मिली जबकि विलाश को बृहण मुंबई म्युनिसिपल कॉरपोरेशन में नौकरी मिली।

जांच समिति ने सर्टिफिकेट का आंकलन किया और अपने ऑर्डर में 6 जनवरी 2009 को कहा कि इन दोनों का ये दावा कि ये महादेव कोली जाति के हैं सही नहीं है और दावे को जांच समिति ने खारिज करते हुए सर्टिफिकेट को अवैध कर दिया।

हाई कोर्ट ने कहा कि चूंकि याचिकाकर्ताओं की अपनी बहन और पहली कजन के सर्टिफिकेट को हाई कोर्ट ने सही करार दिया है ऐसे में इनके सर्टिफिकेट को अमान्य नहीं किया जा सकता।

हाई कोर्ट ने कहा कि पैतृक पक्ष में अगर कोई जीनिओलॉजी या अन्य विवाद न हो और एक को जाति प्रमाणपत्र दिया गया है तो फिर खून के रिश्ते में दूसरे के सर्टिफिकेट को अमान्य नहीं करार दिया जा सकता।

हाई कोर्ट ने अश्विनी विलास चह्वाण बनाम स्टेट ऑफ महाराष्ट्र के केस में दिए फैसले का भी हवाला दिया और कहा कि अगर पैतृक पक्ष में खून के रिश्ते में एक का जाति सर्टिफिकेट वैध है तो दूसरे के दावे भी वैध होंगे। अदालत ने जांच समिति के फैसले को खारिज कर दिया और कहा कि दोनों याचियों को चार हफ्ते में सही प्रमाणपत्र जारी किया जाए।


 
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