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दिल्ली सरकार बनाम उपराज्यपाल : सुप्रीम कोर्ट के संविधान पीठ के सामने केंद्र ने अब तक जो दलील दी है

LiveLaw News Network
23 Nov 2017 5:26 PM GMT
दिल्ली सरकार बनाम उपराज्यपाल : सुप्रीम कोर्ट के संविधान पीठ के सामने केंद्र ने अब तक जो दलील दी है
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अतिरिक्त सोलिसिटर जनरल मनिंदर सिंह ने दिल्ली सरकार के बयान पर टिपण्णी की। दिल्ली सरकार ने अपनी दलील में दिल्ली के लिए राज्य का दर्जा देने पर जोर नहीं दिया। सिंह ने कहा, “दिल्ली की सरकार इस बात को स्वीकार करती है कि दिल्ली एक राज्य नहीं है लेकिन वे ऐसे सारे अधिकार चाहते हैं जो एक राज्य के पास होता है। यह कैसे संभव है? अगर वह एक राज्य नहीं है तो वह राज्य को मिली सुविधाओं का दावा नहीं कर सकती। यह कभी राज्य नहीं हो सकती और इसकी सरकार को कभी भी राज्य सरकार नहीं कहा जा सकता। इन्हें कोई विशेष कार्यपालक अधिकार नहीं दिए गए हैं।”

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दिल्ली सरकार को पुलिस, क़ानून व्यवस्था और जमीन को छोड़कर अन्य सभी मुद्दों पर क़ानून बनाने का अधिकार है और उसे उपराज्यपाल (एलजी) के साथ मिलकर काम करना है। दोनों के बीच सामंजस्य जरूरी है।

मामले की सुनवाई कर रहे पांच जजों की संविधान पीठ के अध्यक्ष मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा ने कहा, “प्रथम दृष्टया जब आप यह कहते हैं कि राज्य को कोई कार्यपालक अधिकार नहीं है और सरकार की मदद और सलाह मानने के लिए एलजी बाध्य नहीं है तो आपकी यह दलील तर्कपूर्ण नहीं लगती। मामला यह है कि निर्वाचित सरकार के कुछ कार्यपालक अधिकार हैं जिसके मुतल्लिक वे कुछ क़ानून बना सकती है लेकिन कार्यादेश के अनुरूप उसको एलजी के अनुसार और उनके परामर्श से ही काम करना होगा।

मुख्य न्यायाधीश ने अतिरिक्त सोलिसिटर जनरल से पूछा, “क्या एलजी सारा अधिकार अपने ही पास रख सकते हैं? प्रथम दृष्टया हमें लगता है कि एलजी अपने आप कोई आदेश नहीं जारी कर सकते।”

मुख्य न्यायाधीश ने उस समय यह टिप्पणी की जब एएसजी ने कहा कि दिल्ली के मंत्रिमंडल की मदद और सलाह को मानने के लिए एलजी बाध्य नहीं है।

अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली दिल्ली की सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के संविधान पीठ के समक्ष अपना बयान लगभग पूरा कर लिया है। सरकार ने कई याचिकाओं के माध्यम से दिल्ली हाई कोर्ट के 4 अगस्त 2016 के फैसले को चुनौती दी थी जिसमें कहा गया था कि एलजी दिल्ली का “प्रशासनिक प्रमुख” है और वह मंत्रिमंडल का सुझाव मानने के लिए बाध्य नहीं है और इस मामले में उसको विशेषाधिकार मिला हुआ है।

खंडपीठ के जज न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा, एके सीकरी, एएम खान्विलकर, डीवाई चंद्रचूड़ और अशोक भूषण की संविधान पीठ इस बात का निर्णय कर रहे हैं कि राष्ट्रीय राजधानी के प्रशासन में किसको वरीयता मिली है – एलजी को या दिल्ली सरकार को। सुनवाई 2 नवंबर को शुरू हुई।

दिल्ली सरकार की दलील अनुच्छेद 239AA पर आधारित है जो उसे विशेष अधिकार देता है और वह केंद्र के साथ संवैधानिक सीमा की लड़ाई को लेकर इस बात की न्यायिक धोषणा किए जाने की अपेक्षा कर रही है कि राष्ट्रीय राजधानी का प्रशासक कौन है।

केंद्र की मुख्य दलील




  • राष्ट्रीय राजधानी देश के सभी नागरिकों का है। दिल्ली सरकार का कहना है कि उसकी सरकार चुनी हुई सरकार है। केंद्र की सरकार भी चुनी हुई सरकार है। जहाँ तक दिल्ली विधानसभा की बात है, केंद्र का हाथ ऊपर है।

  • दिल्ली को केंद्र शासित प्रदेशों में विशेष दर्जा दिया गया लेकिन राज्यों की सूची में अभी उसको शामिल नहीं किया गया है। विधानसभा होने के बावजूद वह एक केंद्र शासित प्रदेश ही है।

  • संविधान के तहत केंद्र शासित प्रदेश राज्यों की सूची में नहीं शामिल हो सकते। यह कहना गैरलोकतांत्रिक होगा कि दिल्ली की विधानसभा के भी वही अधिकार हैं जैसे भारतीय संघ को।

  • संविधान का अनुच्छेद 239AA जिसमें दिल्ली के अधिकारों और उसकी स्थिति की चर्चा करता है, अपने आप में एक पूर्ण संहिता है।

  • संसद ने यह स्पष्ट किया है कि दिल्ली एक केंद्र शासित प्रदेश है और इस बारे में कोई संदेह नहीं है।

  • दिल्ली को राष्ट्रिय राजधानी की दैनिक जरूरतों को पूरा करने का अधिकार दिया गया था पर इसका वास्तविक अधिकार केंद्र और राष्ट्रपति के पास है।

  • पिछले तीन सालों में एलजी के ध्यानार्थ 650 फाइल लाए गए जिनमें से सिर्फ तीन मामलों में ही मतभेद थे।

  • दिल्ली सरकार विवाद उत्पन्न कर रही है ताकि एलजी और केंद्र सरकार के साथ उसकी लड़ाई में विभिन्न संस्थानों में मौजूद सामंजस्य को बिगाड़ा जा सके।

  • दिल्ली सरकार संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन कर अपने अधिकारों का दावा नहीं कर सकती जो कि इस शहर के प्रशासन के लिए शहर की सरकार और केंद्र के बीच सीधा बंटा हुआ है।

  • एलजी द्वारा बुलाई जाने वाली सभी बैठकों में दिल्ली सरकार के प्रतिनिधि मौजूद रहते हैं और दिल्ली सरकार के कार्य में एलजी के बाधा बनने का आरोप गलत है।

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