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नानी और दादी के बीच संरक्षण लेने की लड़ाई में नानी जीती, बॉम्बे हाई कोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को सही ठहराया [निर्णय पढ़ें]

LiveLaw News Network
19 Nov 2017 4:24 AM GMT
नानी और दादी के बीच संरक्षण लेने की लड़ाई में नानी जीती, बॉम्बे हाई कोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को सही ठहराया [निर्णय पढ़ें]
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बॉम्बे हाई कोर्ट ने आठ साल की एक लड़की को उसके नानी के संरक्षण में भेज दिया है। लड़की के संरक्षण को लेकर उसकी नानी और दादी में अदालत में मामला चल रहा था।

न्यायमूर्ति मृदुला भाटकर ने नानी को बच्चे का अभिभावक नियुक्त करने के रायगढ (मनगाँव) के जिला जज के निर्णय को उचित ठहराया।

इस लडकी के माँ-बाप निम्मी और आतिफ थे जिन्होंने 2008 में शादी की। निम्मी ने इस्लाम धर्म कबूल कर लिया और बुशरा नाम रख लिया। 2 मार्च 2009 को उनकी लड़की पैदा हुई। चार साल बाद 11 मार्च 2013 ने आतिफ ने दुबई में बुशरा का गला घोंट दिया। लड़की अपने दादा-दादी के साथ भारत आ गई।

बुशरा की मौत के कुछ दिनों बाद उसकी माँ उस लड़की को लेकर केरल चली गई। इसके एक माह बाद आतिफ की माँ बुशरा का अंतिम संस्कार कराने के लिए लड़की को अपने घर ले गई और फिर उसे कभी वापस नहीं लौटाया।

इसके बाद नानी ने गार्डियन एंड वार्ड्स एक्ट, 1890 के अधीन मनगाँव, रायगड की अदालत में बच्ची को अपने संरक्षण में लेने के लिए आवेदन दिया। इस बीच आतिफ को दुबई की अदालत ने बुशरा की हत्या की जुर्म में मौत की सजा सुना दी।

इसके बाद लड़की के दादा-दादी ने इस आवेदन का विरोध किया और इस आवेदन के खिलाफ अपना जवाब दाखिल किया। आतिफ की माँ ने यह दलील भी दी कि लड़की को एक मुसलमान परिवार में होना चाहिए ताकि वह अपने धर्म के बारे में जान सके और उसको ठीक से मान सके।

हाई कोर्ट ने शुरू में जिला न्यायालय के फैसले को स्थगित कर दिया था और दोनों ही पक्षों के संरक्षण में बच्ची को देने का निर्णय किया था। इस बीच 26 नवंबर 2014 को बुशरा के भाई के खिलाफ आतिफ के माँ-बाप ने संरक्षण के अधीन बच्चे के खिलाफ यौन शोषण का मामला दायर किया। इस मामले को त्रिस्सुर, केरल की अदालत में ट्रांसफर कर दिया गया। 3 जुलाई 2015 को त्रिस्सुर के सीआई ने रिपोर्ट दी कि मामला झूठा है।

बच्ची की नानी की ओर से वकील फ्लाविया एग्नेस ने अदालत में कहा कि इस्लामी क़ानून के अनुसार, धारा 353 के तहत माँ के नहीं रहने पर लड़की को माँ की माँ (नानी) के संरक्षण में भेजना चाहिए।

दो मौकों पर बच्ची से खुद बात करने और दोनों पक्षों को सुनने के बाद न्यायमूर्ति भाटकर ने कहा, “मर्यादा के साथ जीने का अधिकार, बचपन को बचाने का अधिकार अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार के तहत आता है। यद्यपि संविधान अनुच्छेद 25 के तहत किसी भी धर्म को मानने का अधिकार देता है लेकिन दी हुई परिस्थिति में अनुच्छेद 21 का महत्त्व अधिक है...”।

 लेकिन दोनों पक्षों की दलील सुनने के बाद जिला अदालत ने बच्ची को बुशरा की माँ (नानी) के संरक्षण में भेज दिया।


 
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