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सुप्रीम कोर्ट ने प्रोमोशन में आरक्षण पर एम नागराज के मामले में फैसले पर पुनर्विचार के लिए इसे संवैधानिक पीठ को भेजा [आर्डर पढ़े]

LiveLaw News Network
15 Nov 2017 4:13 PM GMT
सुप्रीम कोर्ट ने प्रोमोशन में आरक्षण पर एम नागराज के मामले में फैसले पर पुनर्विचार के लिए इसे संवैधानिक पीठ को भेजा [आर्डर पढ़े]
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सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को वर्ष 2006 में एम नागराज बनाम भारत सरकार के मामले में अपने फैसले पर पुनर्विचार के लिए उसे एक संवैधानिक पीठ को सौंप दिया है।

मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति एके सीकरी और न्यायमूर्ति एएम खानविल्कर की पीठ ने यह आदेश दिया जो कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 16(4), 16(4) (A) और 16(4)(B) की व्याख्या को चुनौती देने के बाद लिया गया।

वर्ष 2006 में सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि राज्य के लिए यह जरूरी नहीं है कि वह प्रोमोशन में एससी/एसटी के लिए आरक्षण का प्रावधान करे। हालांकि, अगर राज्य अपने विशेषाधिकारों का प्रयोग करना चाहते हैं तो उसे सार्वजनिक रोजगार में इस वर्ग के पिछड़ेपन और पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं होने की बात को सिद्ध करने के लिए उपयुक्त आंकड़े जुटाने होंगे। ऐसा उसे अनुच्छेद 335 को मानने के अलावा करना होगा।

यह भी कहा गया कि राज्य को यह देखना होगा कि आरक्षण 50 फीसदी की निर्धारित सीमा से आगे न बढ़े और उसे क्रीमी लेयर को इस सीमा से बाहर करने और अनंत काल के लिए आरक्षण देने से खुद को रोकना पड़ेगा।

मंगलवार को न्यायमूर्ति कुरियन जोसफ और न्यायमूर्ति आर बनुमती की पीठ ने इस मामले को एक संवैधानिक पीठ को सौंप दिया। पीठ ने कहा कि तीन संवैधानिक पीठों के निर्णयों के बाद यह प्रश्न अब प्रावधानों की व्याख्या पर निर्भर हो गया है। ये तीन मामले जिनमें इससे जुड़े फैसले दिए गए वे हैं इंद्रा साहनी और अन्य बनाम भारत सरकार, ईवी चिन्नैया बनाम आंध्र प्रदेश राज्य और एम नागराज एवं अन्य बनाम भारत सरकार एवं अन्य।

कोर्ट के समक्ष दायर याचिका में कहा गया था कि इसके बावजूद कि नागराज और चिन्नैया दोनों के मामले एक ही मुद्दे से जुड़े हुए थे, चिन्नैया के मामले में दिए गए फैसले का हवाला नागराज के मामले में नहीं दिया गया। इसके अलावा एससी/एसटी के पिछड़ेपन को भी चुनौती दी गई है।

इस तरह के प्रश्नों के आलोक में, दो न्यायाधीशों की पीठ ने कहा, “इस मामले में उठे सवालों को देखते हुए हमने अनुच्छेद 145 (3) के तहत संवैधानिक अधिकारों के अनुरूप इस मामले को अविलम्ब मुख्य न्यायाधीश को सौंप दिया है।”

बुधवार को इस मामले की सुनवाई के दौरान अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने इस आदेश की ओर कोर्ट का ध्यान आकृष्ट किया। प्रतिवादी ने भी उक्त आदेश की वैधता को चुनौती देने का प्रयास किया और कहा कि एक खंडपीठ मामले को संवैधानिक पीठ को नहीं सौंप सकता। हालांकि तीन-सदस्यीय पीठ ने इस ओर ध्यान नहीं दिया और कहा कि वह एक संवैधानिक पीठ का गठन करेंगे ताकि यह फैसला किया जा सके कि नागराज के मामले में दिए गए फैसले पर पुनर्विचार की जरूरत है कि नहीं।

यह आदेश त्रिपुरा हाई कोर्ट द्वारा अप्रैल 2015 में दिए फैसले के खिलाफ दायर एक अपील पर दिया गया है जिसमें आवेदनकर्ता ने त्रिपुरा अनुसूचित जाति और जनजाति (सेवा और पोस्ट में रिक्तियों का आरक्षण) अधिनियम, 1991 की धारा 4(2) और एससी/एसटी नियमों के नियम 9(2) को चुनौती दी थी।

आवेदनकर्ता सामान्य श्रेणी का है और उसने अपने आवेदन में कहा था कि नागराज के मामले में दिए गए निर्णय के खिलाफ राज्य सरकार ने आरक्षण की श्रेणी में आने वालों को प्रोमोशन देकर उनके समानता के अधिकारों का उल्लंघन किया है।

आवेदनकर्ता ने आगे कहा कि राज्य क़ानून के अनुसार कैडर-वाइज मात्रात्मक आंकड़े जुटाने में असफल रहा है और उसने जो आरक्षण दिया है वह निर्धारित 50 प्रतिशत की सीमा से अधिक है।

उस समय न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता, न्यायमूर्ति यूबी साहा और न्यायमूर्ति एससी दास की पूर्ण पीठ ने कहा था कि “राज्य सरकार ने आरक्षण को जिस तरीके से लागू किया है वह पूर्णतः गैर कानूनी है क्योंकि आरक्षण कैडर-वाइज नहीं दिया गया है।”


 
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