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विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेट के अपने पद के दुरुपयोग का मामला : सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों व केंद्र शासित क्षेत्रों के मुख्य सचिवों को नोटिस भेजा

LiveLaw News Network
8 Nov 2017 8:31 AM GMT
विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेट के अपने पद के दुरुपयोग का मामला : सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों व केंद्र शासित क्षेत्रों के मुख्य सचिवों को नोटिस भेजा
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अल्दानिश रेन बनाम भारत सरकार के मामले में सुप्रीम के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्र, न्यायमूर्ति एएम खान्विलकर और न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ की पीठ ने सभी राज्यों और केंद्र शासित क्षेत्रों के मुख्य सचिवों को नोटिस भेजा है। यह नोटिस आवेदनकर्ता की इस मांग पर जारी किया गया है कि विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेट (एसईएम) के अपने पदों के दुरुपयोग के कारण जिन नागरिकों को उनके संवैधानिक अधिकारों से वंचित किया जाता है उसकी रक्षा की जाए।

याचिकाकर्ता पेशे से सुप्रीम कोर्ट में एडवोकेट हैं और वह चाहते हैं कि कोर्ट सभी राज्यों और केंद्र शासित क्षेत्रों को नोटिस जारी कर उन्हें प्रवीण विजयकुमार तावारे बनाम विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेट मामले में बॉम्बे हाई कोर्ट के फैसले में दिए गए निर्देशों को मानने को कहें। इस मामले में फैसला 18 जून 2009 को आया और दत्तराया बनाम महाराष्ट्र राज्य मामले में भी इस फैसले को उद्धृत किया गया था। इस मामले का फैसला 22 अक्टूबर 2013 को आया।

एक अन्य मामले में आवेदनकर्ता को अग्रिम जमानत मिल गई। एसईएम ने आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 111 (अध्याय 8) के तहत नोटिस जारी किया और धारा 116 (3) के तहत फैसला दिया और ऐसा करने से पहले उसने सुनवाई का मौक़ा नहीं दिया। उसने आवेदनकर्ता को एक साल तक सशर्त अच्छे आचरण के लिए एक लाख रुपए का अंतरिम बांड भरने को कहा। आवेदनकर्ता ने कहा कि वह बांड के लिए आवश्यक धन का इंतजाम नहीं कर सकता और इसके परिणामस्वरूप एक आवेदनकर्ता को उसी दिन जेल भेज दिया गया।

न्यायमूर्ति बाज़्की ने अपने फैसले में कहा कि उस मामले में संहिता की धारा 111 के तहत मजिस्ट्रेट को किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करने या रोक कर रखने का अधिकार नहीं है। वह सिर्फ कारण बताओ नोटिस जारी कर सकता है और अगर जरूरी हुआ तो जांच शुरू कर सकता है। यहाँ तक कि किसी व्यक्ति को बांड भरने का निर्देश देना और ऐसा नहीं कर पाने पर उसको जेल भेज देने जैसी कारर्वाई वह अंतरिम दशा में भी नहीं कर सकता बशर्ते कि सच जानने के लिए किसी तरह की कोई जांच की गई हो। सरकारी वकील और एसईएम की दलील सुनने के बाद न्यायमूर्ति बाज़्की ने एसईएम को इस आधार पर संदेह का लाभ दिया कि उसको क़ानून के बारे में जानकारी नहीं थी।

न्यायमूर्ति बाज़्की ने हालांकि यह निर्देश दिया था कि राज्य सरकार को शीघ्र कदम उठाते हुए पहला निर्देश यह दिया कि सभी कार्यपालक मजिस्ट्रेट को प्रशिक्षित करना चाहिए ताकि उन्हें पता लग सके कि संहिता के अध्याय 8 के प्रावधानों को कैसे लागू किया जाए। अपने दूसरे निर्देश में उन्होंने कहा कि राज्य की पुलिस अकादमी में सभी कार्यपालक मजिस्ट्रेट को प्रशिक्षण दिया जाए। अपने तीसरे निर्देश में उन्होंने कहा कि जब भी मजिस्ट्रेट द्वारा अंतरिम या अंतिम आदेश दिया जाता है जिसमें किसी व्यक्ति को बांड या मुचलका भरने को कहा जाता है, तो इसके लिए उसे पर्याप्त समय मिलना चाहिए। उनका चौथा आदेश था कि जांच के स्तर पर मजिस्ट्रेट को जांच होने तक बांड भरने को नहीं कहना चाहिए बशर्ते कि वह प्राप्त सूचना की सत्यता के बारे में आश्वस्त है। पांचवां, जब भी कभी एक कार्यपालक मजिस्ट्रेट सीआरपीसी के अध्याय 8 के अंतर्गत धारा 116 की उप-धारा (3) के तहत कोई आदेश देता है कि किसी व्यक्ति को जेल भेजा जाए, तो इस आदेश की एक प्रति मुख्य सत्र न्यायाधीश को शीघ्र भेजा जाए। छठा, इस आदेश की प्रति प्राप्त होने पर मुख्य सत्र न्यायाधीश को इसे पढ़ना चाहिए और अगर उसको लगता है कि इसकी समीक्षा की जरूरत है तो वह संहिता की धारा 397 के तहत हस्तक्षेप कर सकता है। सातवाँ, किसी व्यक्ति को जेल भेजने के आदेश की एक प्रति विभाग में मजिस्ट्रेट के वरिष्ठ अधिकारी को अवश्य भेजा जाना चाहिए।

इस मामले की अगली सुनवाई अब 24 जनवरी 2018 को होगी।

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