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सुप्रीम कोर्ट का बडा फैसला: गर्भपात कराने के फैसले का अधिकार सिर्फ महिला का, पति की याचिका खारिज

LiveLaw News Network
28 Oct 2017 10:39 AM GMT
सुप्रीम कोर्ट का बडा फैसला: गर्भपात कराने के फैसले का अधिकार सिर्फ महिला का, पति की याचिका खारिज
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सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि एक बालिग महिला को ही ये अधिकार है कि वो बच्चे को जन्म दे या गर्भपात कराए।

सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया है कि किसी भी महिला को गर्भपात  कराने के लिए पति की सहमति लेना जरूरी नहीं है।  सुप्रीम कोर्ट मेॉ चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ और जस्टिस ए.एम खानवेलकर  की बेंच ने महिला से अलग हो चुके पति की याचिका पर ये बडा फैसला सुनाते हुए याचिका को खारिज कर दिया। इससे पहले पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने भी कहा था कि गर्भपात का फैसला पूरी तरह से महिला का होना चाहिए।

पेश मामले में एक पति ने अपनी याचिका में पूर्व पत्नी के साथ उसके माता-पिता, भाई और दो डॉक्टरों पर  अवैध तरीके से गर्भपात का आरोप लगाया था। पति ने बिना उसकी सहमति के गर्भपात कराए जाने पर 30 लाख के मुआवजे के लिए सिविल सूट दाखिल किया था। लेकिन डॉक्टरों ने इसे पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में चुनौती दी और हाईकोर्ट ने मामले को रद्द कर दिया।

हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ पति ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की और फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि गर्भपात का फैसला लेने वाली महिला बालिग है। वो एक मां है और ऐसे में अगर वो बच्चे को जन्म नहीं देना चाहती है MTP एक्ट के तहत  उसे गर्भपात कराने का पूरा अधिकार है।

 यहां तक कि कोई मानसिक रूप से कमजोर महिला भी गर्भपात करा सकती है। ऐसे में परिवार या किसी दूसरे को कैसे जिम्मेदार ठहराया जा सकता है ?

दरअसल याचिकाकर्ता के मुताबिक उनकी शादी 1994 में हुई और 1995 में उनका बेटा हुआ। लेकिन फिर दोनों के बीच अनबन हो गई और उसकी पत्नी ने बेटे के साथ मायके में रहना शुरु कर दिया। 1999 में महिला ने चंडीगढ की कोर्ट में गुजारे भत्ते का केस किया को कोर्ट ने सुलह कराने की कोशिश की और 2002 में दोनों साथ रहने लगे। हालांकि फिर दोनों के बीच अनबन हो गई और वो अलग हो गए।

2003 में जब दोनों के बीच तलाक लिया उस समय महिला गर्भवती थी और वो बच्चे को जन्म नहीं देना चाहती थी। गर्भपात करवाना चाहती थी। लेकिन पति ने गर्भपात कराने की इजाजत देने से इंकार कर दिया। महिला ने चंडीगढ के एक अस्पताल में गर्भपात करा लिया। इसके बाद पति ने मुआवजे का केस दाखिल किया। केस को रद्द करते हुए पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने कहा था कि महिला ने वैवाहिक रिश्तों के तहत शारीरिक संबंध बनाए जिसका मतलब ये नहीं की वो महिला गर्भ धारण करने के लिए भी राजी हुई है।ये पूरी तरह महिला पर निर्भर है कि वह बच्चे को जन्म देना चाहती है या नहीं। पति उसे बच्चे को पैदा करने के लिए मजबूर नहीं कर सकता। हाईकोर्ट ने ये भी कहा कि महिला कोई मशीन नहीं है जिसमें कच्ची सामग्री डाली जाए और तैयार सामान बाहर आए। बच्चे को जन्म देने के लिए उसका राजी होना जरूरी है क्योंकि इससे उनके मानसिक स्वास्थ्य पर भी असर पडता है। हाईकोर्ट ने पति को सभी पक्षों को 25 हजार रुपये देने का आदेश भी दिया था।

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