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आईएएस अधिकारी अनुराग तिवारी की हत्या मामले में कथित खाद्य घोटाले की जांच सीबीआई से नहीं कराने के इलाहाबाद हाईकोर्ट के निर्णय के खिलाफ याचिका खारिज [आर्डर पढ़े]

LiveLaw News Network
27 Oct 2017 9:15 AM GMT
आईएएस अधिकारी अनुराग तिवारी की हत्या मामले में कथित खाद्य घोटाले की जांच सीबीआई से नहीं कराने के इलाहाबाद हाईकोर्ट के निर्णय के खिलाफ याचिका खारिज [आर्डर पढ़े]
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सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ ने आईएएस अधिकारी अनुराग तिवारी की हत्या के सिलसिले में कथित खाद्य घोटाले की सीबीआई जांच नहीं कराने के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने 25 मई को अपने फैसले में तिवारी की हत्या के सिलसिले में कथित खाद्य घोटाले की विस्तृत जांच सीबीआई से कराने संबंधी मांग को 23 अक्टूबर को खारिज कर दिया था। यह याचिका ‘वी द पीपल’ नामक संस्था ने अपने महासचिव प्रिंस लेनिन के माध्यम से दायर की थी। याचिकाकर्ता ने अपनी याचिका में मांग की थी कि कोर्ट सीबीआई को खाद्य घोटाले की विस्तृत जांच करने का निर्देश दे। याचिकाकर्ता ने खाद्य घोटाले की वजह से तिवारी की हत्या होने की आशंका जाहिर की थी।

कर्नाटक कैडर के 2007 बैच के अधिकारी तिवारी 17 मई को रहस्यमय परिस्थिति में मृत पाए गए। हत्या से ठीक पहले मीराबाई मार्ग, लखनऊ के राजकीय गेस्ट हाउस में अपने दोस्तों के साथ तिवारी ने अपना 36वां जन्मदिन मनाया था जिसमें उनके करीबी दोस्त और बैच के मित्र शामिल हुए थे। उनका शव तड़के इस गेस्ट हाउस से 150 मीटर की दूरी पर सड़क के किनारे पाया गया था जब वे सुबह की सैर को गए थे। इस मामले की शुरुआती जांच राज्य पुलिस ने की लेकिन बाद में सरकार ने इस मामले की जांच 17 जून को सीबीआई को सौंप दी।

तिवारी की नियुक्ति बेंगलुरु के खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति विभाग में आयुक्त के पद पर हुई थी। उनकी विसरा रिपोर्ट सीबीआई को सितंबर में मिली जिससे पता चला है कि उनकी हत्या हुई और उनके शरीर पर काफी चोट के निशान पाए गए। रिपोर्ट के अनुसार उनकी मृत्यु दवा की अत्यधिक मात्रा लेने की वजह से नहीं हुई, जैसा कि पहले माना जा रहा था। तिवारी के परिवार के सदस्य का मानना है कि उनकी हत्या हुई है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने लेनिन की याचिका इसलिए खारिज कर दी थी क्योंकि उन्होंने अपने दावे की पुष्टि में किसी भी तरह के सबूत नहीं पेश किए थे जिससे यह पता चले कि तिवारी ने व्यापक घोटाले का भंडाफोड़ किया था। लेनिन के दावे अखबारों की रिपोर्टों पर आधारित थे जिसको कोर्ट में सबूत के तौर पर नहीं पेश किया जा सकता, ऐसा कोर्ट ने कहा। हाईकोर्ट ने कहा, “यह जनहित याचिका का खुल्लमखुल्ला दुरुपयोग है इसलिए इसको खारिज किया जाता है लेकिन उनको इसके लिए दंडित किया जाएगा।” कोर्ट ने लेनिन को 50 हजार रुपए का जुर्माना चुकाने को कहा। कोर्ट ने कहा, “याचिकाकर्ता लखनऊ जिले की ट्रेज़री में तीन महीने के भीतर यह राशि जमा करेगा और अगर वह ऐसा नहीं करता है तो लखनऊ का जिलाधिकारी उनके भू-राजस्व से यह राशि बकाए के रूप में वसूलेगा।

सोमवार 23 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ जिसमें मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति दीपक मिश्र, न्यायमूर्ति एएम खान्विलकर और डीवाई चंद्रचूड़ शामिल थे, ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ के फैसले के खिलाफ लेनिन की याचिका खारिज कर दी।


 
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