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प्रभावी समाधान के लिए पारिवारिक अदालतें तकनीक का प्रयोग अवश्य करें : न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ [निर्णय पढ़ें]

LiveLaw News Network
25 Oct 2017 3:15 PM GMT
प्रभावी समाधान के लिए पारिवारिक अदालतें तकनीक का प्रयोग अवश्य करें : न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ [निर्णय पढ़ें]
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गत 9 अक्टूबर 2017 को सुप्रीम कोर्ट के तीन जजों की खंड पीठ ने संथिनी बनाम विजय वेंकटेश मामले में दिए गए अपने फैसले में इससे पूर्व कृष्णा वेणी नगम बनाम हरीश नगम मामले में दिए फैसले को पलट दिया। यह फैसला 2:1 की सहमति से दी गई थी। मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति दीपक मिश्र और न्यायमूर्ति एएम खान्विलकर ने बहुमत का फैसला दिया जबकि न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ ने फैसले से अपनी असहमति जताई।

इससे पहले कृष्णा वेणी नगम के मामले में सुप्रीम कोर्ट के दो जजों की पीठ ने उन पक्षकारों को वीडिओ कांफ्रेंसिंग की सुविधा का प्रयोग करने की इजाजत दी थी जो न्यायाल की कार्यवाही को कहीं अन्य स्थानांतरित करने के पक्षधर थे क्योंकि एक पक्ष इस कार्यवाही में उस स्थान से भाग लेने में अक्षम था जहाँ वह रह रहा था। इस पीठ में न्यायमूर्ति एके गोएल और यूयू ललित शामिल थे। बाद में एक कोऑर्डिनेटेड खंड पीठ ने विवाह संबंधी मामलों में वीडिओ कांफ्रेंसिंग के प्रयोग की इजाजत देने पर संदेह जाहिर किया और मामले की सुनवाई एक बड़ी पीठ से करने का आग्रह किया। इस खंड पीठ में न्यायमूर्ति कुरियन जोसफ और न्यायमूर्ति बानुमथि शामिल थे।

अब तीन सदस्यीय पीठ ने जो फैसला दिया है उसमें से दो जज तो एकमत हैं पर एक जज ने फैसले से असहमति जताई है। मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति मिश्र और न्यायमूर्ति खानविल्कर इस बात पर सहमत थे कि अगर मामले की कार्यवाही वीडिओ कांफ्रेंसिंग के माध्यम से करने की इजाजत दी गई तो यह “1984 में बनाए गए क़ानून के प्रावधानों के खिलाफ होगा और इससे न्याय का उद्देश्य पूरा नहीं होगा।”

न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ की असहमति वाले फैसले में कहा गया कि कृष्णा वेणी नगम मामले में दिया गया फैसला कोई यांत्रिक निर्देश नहीं था कि अपनी याचिका का स्थानांतरण चाहने वाले पक्षकारों को वीडिओ कांफ्रेंसिंग का रास्ता अपनाने को कहा जाएगा। फैसले की भाषा अनुमतिपूर्ण है और यह इतनी लचीली है कि इसमें न्याय का ख़याल रखने के लिए दिमाग के प्रयोग, पक्षकारों की स्थिति और उनकी परिस्थितियों के साथ-साथ तकनीकी और प्रायोगिक संदर्भ और स्थान संबंधी दूरी की समस्या का हल वीडिओ कांफ्रेंसिंग को अपनाने में मौजूद था।

पारिवारिक न्यायालय अधिनियम, 1984 की धारा 9 (1) और हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 23 (2) के तहत पारिवारिक न्यायालय को यह छूट दिया गया है कि वह अपनी कार्यपद्धति विकसित कर सकता है और जिसका कि वह इस मामले की सुनवाई में प्रयोग करेगा।

 अपनी असहमति में न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने कहा है कि पारिवारिक अदालत अधिनियम की धारा 10 (3) मामले के विषय या इसकी कार्यवाही को लेकर किसी तरह के समझौते के बारे में अपनी कार्यवाही खुद तय करने की छूट देती है। वीडिओ कांफ्रेंसिंग के प्रयोग को लेकर किसी भी तरह की रोक की बजाय इससे संबंधित प्रावधान पारिवारिक न्यायालय को वैवाहिक विवादों में जहाँ भी उपयुक्त हो, वीडिओ कांफ्रेंसिंग के प्रयोग का पर्याप्त अधिकार देता है।

न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने कहा कि नजदीक नहीं होने के बावजूद वीडिओ कांफ्रेंसिंग ने आमने-सामने बातचीत को संभव बनाया है। तकनीकी प्रगति ने मानव सभ्यता के इतिहास में एक नए युग का सूत्रपात किया है और इसने जीवन के हर क्षेत्र में उसकी क्षमता, उत्पादकता और परिणामों की गुणवत्ता को बढाया है। तकनीक ने एक खुले विश्व का रास्ता खोल दिया है और दुनिया तक सबकी पहुँच को संभव बनाया है जहाँ संवाद और जुड़े रहने की भौतिक रुकावटें अब टूट गई हैं।

उन्होंने कहा कि इससे पहले भी कई वैवाहिक विवाद की कार्यवाहियों में वीडिओ कांफ्रेंसिंग का प्रयोग हुआ है। तकनीक में आई प्रगति की वजह से कई देशों में वीडिओ कांफ्रेंसिंग के प्रयोग के बारे में व्यापक दिशानिर्देश तैयार किए गए हैं।

हालांकि, न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने स्पष्ट किया कि वीडिओ कांफ्रेंसिंग की इजाजत के पीछे सबसे बड़ा कारण न्याय को बढ़ावा देना होना चाहिए और इससे मामले के पक्षकारों को न्यूनतम घाटा होना चाहिए।


 
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