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दंगा पीडित गैंगरेप केस में सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात सरकार से पूछा, दोषी पुलिसवालों पर क्या हुई कार्रवाई ?

LiveLaw News Network
23 Oct 2017 9:31 AM GMT
दंगा पीडित गैंगरेप केस में सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात सरकार से पूछा, दोषी पुलिसवालों पर क्या हुई कार्रवाई ?
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2002 के गुजरात दंगा पीडित गैंगरेप केस में सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात सरकार को चार हफ्ते में ये बताने को कहा है कि मामले में दोषी पुलिसवालों के खिलाफ कोई विभागीय कार्रवाई या अन्य कार्रवाई की गई है या नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने ये भी कहा कि दोषी करार दिए जाने के बाद वो सेवा में कैसे रह सकते हैं ?

इसके साथ ही चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस ए एम खानवेलकर और जस्टिस डीवाई चंद्रचूड ने पीडिता को गैंगरेप केस में बढा मुआवजा दिलाने की अलग याचिका दाखिल करने की इजाजत दे दी।

दरअसल गोधरा कांड के बाद हुई इस वारदात की पीडिता ने बढा हुआ मुआवजा और दोषी करार दिए गए पांच पुलिसकर्मियों व दो डॉक्टरों के खिलाफ कार्रवाई की अर्जी दाखिल की थी। इस दौरान पीडिता की ओर से पेश वकील शोभा ने कोर्ट को बताया कि इस मामले में जांच को प्रभावित करने के लिए पांच पुलिसकर्मियों व दो डॉक्टरों को हाईकोर्ट ने दोषी करार दिया था लेकिन ट्रायल के दौरान जेल में काटे वक्त को ही सजा मान लिया था। अब इन लोगों को फिर से सेवा में रख लिया गया है।

वहीं गुजरात सरकार की ओर से पेश हेमंतिका वाही ने कोर्ट को बताया कि उनके खिलाफ विभागीय कार्रवाई शुरु की गई है। बेंच ने सरकार को चार हफ्ते में कार्रवाई संबंधी जानकारी दाखिल करने को कहा है। वहीं कोर्ट ने बिलकिस को हाईकोर्ट के मुआवजे को लेकर आदेश को अलग याचिका के जरिए चुनौती दे।

गौरतलब है कि इसी साल चार मई को बोंबे हाईकोर्ट ने इस केस में 12 लोगों की उम्रकैद की सजा बरकरार रखी थी और ट्रायल कोर्ट के फैसले को पलटते हुए पांच पुलिसकर्मियों व दो डॉक्टरों को दोषी करार दे दिया था। लेकिन ट्रायल के दौरान काटी सजा को पर्याप्त माना था। उन्हे ड्यूटी ना निभाने और IPC की धारा 201 के तहत सबूत मिटाने का दोषी करार दिया गया।

दरअसल 3 मार्च 2002 को गोधरा कांड के बाद भडकी हिंसा में अहमदाबाद में पीडिता के परिवार के 7 लोगों की हत्या कर दी गई थी जबकि गर्भवती पीडिता के साथ गैंगरेप किया गया था। 21 जनवरी 2008 को ट्रायल कोर्ट ने 11 लोगों को उम्रकैद की सजा सुनाई जबकि पुलिसवालों व डॉक्टरों को बरी कर दिया। इसके बाद सीबीआई भी तीन लोगों की सजा को फांसी में तब्दील करने के लिए हाईकोर्ट पहुंची थी। 2004 में पीडिता की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने मामले को मुंबई ट्रांसफर कर दिया था।

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