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दोनों पक्षों की सहमति के बिना वैवाहिक विवाद मामलों में नहीं हो सकती वीडियो कांफ्रेसिंग के जरिए सुनवाई : सुप्रीम कोर्ट [निर्णय पढ़ें]

LiveLaw News Network
10 Oct 2017 6:46 AM GMT
दोनों पक्षों की सहमति के बिना वैवाहिक विवाद  मामलों में नहीं हो सकती वीडियो कांफ्रेसिंग के जरिए सुनवाई : सुप्रीम कोर्ट [निर्णय पढ़ें]
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एक अहम फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि फैमिली कोर्ट में वैवाहिक विवाद के मामलों की सुनवाई तब तक वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिये अनिवार्य नहीं हो सकती जब तक पति और पत्नी दोनों सहमत ना हों। कोर्ट ने ये भी कहा है कि जहां तक हो सके, फैमिली कोर्ट को ऐसे मामलों सुनवाई ‘ इन कैमरा’ करनी चाहिए क्योंकि ये महिला की संवैधानिक पहचान और गरिमा से जुडा है।

 सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि मुकदमे की सुनवाई एक जगह से दूसरी जगह ट्रांसफर करने संबंधी याचिकाओं पर दोनों पक्षों की सहमति के बगैर वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिये सुनवाई नहीं हो सकती।

चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय बेंच ने 2:1 के बहुमत के आधार पर कृष्णा वेनी निगम मामले में दिए गए आदेश को अलग कर दिया। इस मामले पर दिए फैसले में कहा गया था कि अगर एक पक्ष या दोनों पक्ष सहमत हों तो मुकदमे की सुनवाई वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिये कराई जा सकती है।

सोमवार को चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा और जस्टिस ए एम खानवेलकर  द्वारा दिए गए फैसले में कहा गया कि फैमली कोर्ट एक्ट, 1984 की धारा-सात में दोनों पक्षों को वैधानिक संरक्षण देने की बात है। साथ ही अदालत का यह दायित्व होता है कि वह दोनों पक्षों के बीच मतभेद दूर करने का प्रयास करे और उन्हें फिर से मिलाने की कोशिश करे। अगर सुनवाई वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिये होगी तो धारा-सात का मकसद ही पूरा नहीं होगा। फैसले में कहा गया है कि कानून के तहत वैवाहिक विवाद के मामले की सुनवाई बंद कमरे में होनी चाहिए।

हालांकि बेंच में शामिल जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की राय अलग थी। उन्होंने अपने फैसले में कहा कि पारिवारिक विवाद निपटाने के लिए वीडियो कांफ्रेंसिंग को कई देशों ने अपनाया है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसे स्वीकृति मिली हुई है। देश में भी कई मामलों में इस तकनीक को अपनाया गया है। उन्होंने कहा कि हाईकोर्ट को वीडियो कांफ्रेंसिंग के इस्तेमाल को लेकर कानून बनाना चाहिए और फैमिली कोर्ट को केस के हिसाब से निर्णय लेने का अधिकार दिया जाना चाहिए। उन्होंने अपने फैसले में यह भी कहा कि शीर्ष अदालत को आधुनिक तकनीक अपनाने में रुकावट नहीं डालना चाहिए क्योंकि इससे सुनवाई जल्द पूरी होगी और लागत भी कम होगी।


 
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