पैलेट गन मामला: चीफ जस्टिस ने कहा अगर कश्मीर में प्रदर्शन के लिए पूछा था तो ये सुप्रीम कोर्ट की गलती

LiveLaw News Network

4 Oct 2017 10:58 AM GMT

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    जम्मू-कश्मीर में पैलेट गन इस्तेमाल करने के मामले की सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने कहा कि इस मामले में अगर सुप्रीम कोर्ट ने अगर ये पूछा था कि कश्मीर में लोग सडकों पर प्रदर्शन क्यों कर रहे हैं तो ये सुप्रीम कोर्ट की गलती थी। सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर सुनवाई करते हुए याचिकाकर्ता जम्मू कश्मीर हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के हलफनामे पर सवाल उठाते हुए कहा कि ये चौकाने वाला है। हलफनामे में कहा गया है कि भारत ने गलत तरीके से कश्मीर का परिग्रहण किया।

    दरअसल सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस, जस्टिस ए एम खानवेलकर और जस्टिस डीवाई चंद्रचूड की बेंच को बताया गया था कि पैलेट गन से जुडे कुछ मुद्दों पर जम्मू कश्मीर हाईकोर्ट सुनवाई कर रहा है। इसी पर चीफ जस्टिस ने कहा कि पहले हाईकोर्ट मामले पर फैसला दे दे उसके बाद सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की जा सकती है। लेकिन याचिकाकर्ता जम्मू कश्मीर हाईकोर्ट बार एसोसिएशन की ओर से कहा गया कि सुप्रीम कोर्ट ने ही इस मामले में पूछा था कि कश्मीर में लोग सडकों पर प्रदर्शन क्यों कर रहे हैं और हलफनामा दाखिल करने को कहा था। इसी पर चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने टिप्पणी की कि अगर कोर्ट ने ये कहा था तो ये गलती थी। ये हलफनामा चौकाने वाला है।

    वहीं केंद्र की ओर से सॉलीसिटर जनरल रंजीत कुमार ने भी हलफनामे पर सवाल उठाए और कहा कि इसमें कहा गया है कि 1947 से अभी तक जितने भी चुनाव जम्मू कश्मीर में हुए हैं वो गलत हैं और कश्मीर का भारत में परिग्रहण धोखे से किया गया है। उन्होंने मांग की कि इस याचिका को खारिज किया जाना चाहिए।

     हालांकि सुप्रीम कोर्ट याचिका में दिए गए दो मुद्दों पैलेट गन के इस्तेमाल पर रोक और फैक्ट फाइंडिंग कमेटी पर सुनवाई को तैयार हो गया। सुप्रीम कोर्ट 18 जनवरी 2018 को अंतिम सुनवाई करेगा और ये तय करेगा कि कश्मीर में पैलेट गन का इस्तेमाल हो सकता है या नहीं।

    गौरतलब है कि पहले मामले की सुनवाई के दौरान तत्कालीन चीफ जस्टिस जे एस खेहर की बेंच ने केंद्र सरकार को कहा था कि ऐसे तरीके ढूंढें जाएं जिन्हें पैलेट गन के विकल्प के तौर पर इस्तेमाल किया जा सके। पैलेट गन के विकल्प पर विचार किया जाए ताकि किसी भी नागरिक को नुकसान न पहुंचे।  सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को कहा छा कि ऐसे किसी विकल्प को देखें जिससे दोनों पक्षो को नुकसान न पहुंचे। जैसे पैलेट की जगह पानी की बौछार में कुछ कैमिकल मिलाकर प्रदर्शनकारियों पर इस्तेमाल किया जा सकता है।

    कोर्ट ने यह भी कहा था कि प्रदर्शन करने वालों को नुकसान पहुंचाना सुरक्षा बलों का मकसद नहीं होता। कोर्ट ने कहा था प्रदर्शनकारियों पर गंदा पानी, टेजर्स गन का इस्तेमाल किया जा सकता है ताकि उन्हें भी बचाया जा सके।

    सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि कश्मीर में शांति बनाने के लिए सरकार और लोगों में बातचीत होनी चाहिए। लेकिन इसके लिए पहले सुरक्षा बलों पर पथराव प्रदर्शन रुकने चाहिए। अगर इसी तरह दोनों पक्षों में टकराव होगा तो बातचीत कैसे होगी। कोर्ट सरकार को दो हफ्ते के लिए पैलेट गन के इस्तेमाल पर रोक लगाने के आदेश देगा अगर वहां के लोग हिंसक प्रदर्शन बंद कर बातचीत करने का आश्वासन देंगे।

    सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता जम्मू कश्मीर हाईकोर्ट बार एसोसिएशन से कहा था कि वो कश्मीर के लोगों और प्रतिनिधियों से बातचीत कर कंक्रीट सुझाव लेकर सुप्रीम कोर्ट आएं। सुप्रीम कोर्ट ने  तत्कालीन AG  मुकुल रोहतगी से कहा था कि वह याचिकाकर्ता को लोगों और हिरासत में मौजूद नेताओं को भी बातचीत में शामिल करे अगर कानून इजाजत देता है तो।

    वहीं केंद्र सरकार की ओर से इसका विरोध करते हुए मुकुल रोहतगी ने कहा था कि कश्मीर मुद्दे पर बातचीत होगी तो राजनीतिक स्तर पर।सुप्रीम कोर्ट इस मामले में डायलाग यानी बातचीत के लिए नहीं कह सकता।याचिकाकर्ता चाहते हैं कि अलगावादियों को बातचीत में शामिल किया जाए लेकिन कानून इसकी इजाजत नहीं देता। प्रधानमंत्री ने इस मुद्दे पर मुख्यमंत्री से बातचीत की है।

    वहीं याचिकाकर्ता का कहना था कि कश्मीर से अगर सुरक्षा बलों को हटाया जाए और पैलेट गन के इस्तेमाल पर रोक लगाएं तो शांति के लिए बातचीत हो सकती है। पहले सीज फायर होना चाहिए। मामले में पाकिस्तान से भी बातचीत होनी चाहिए।

    पिछली सुनवाई में कोर्ट ने भी सवाल उठाया था कि प्रदर्शनकारियों में 9,11, 13, 15 और 17 साल के बच्चे और नौजवान क्यों शामिल हैं?

    रिपोर्ट के मुताबिक जख्मी लोगों में 40-50-60 साल के लोग नहीं हैं खासकर 95 फीसदी जख्मी छात्र हैं।इससे पता लगता है कि बडी उम्र 28 साल है।

    केंद्र ने कहा था कि प्रदर्शनकारियों से निपटने के लिए नया SOP बनाया गया है। वो पैलेट गन के अलावा किसी दूसरे विकल्प पर भी विचार कर रहा है। याचिकाकर्ता की दलील थी कि ये बच्चे और नौजवान प्रर्दशनकारी नहीं बल्कि देखने वाले होते हैं।  सुरक्षा बल जब फायरिंग करते हैं या पैलेट गन चलाते हैं तो वो भी चपेट में आ जाते हैं। जो केंद्र ने हालात बताए वो सही नहीं हैं। कश्मीर में नागरिकों से युद्ध के हालात नहीं होने चाहिए।

    वहीं केंद्र सरकार की ओर से AG मुकुल रोहतगी ने कहा था कि कोर्ट को इस मामले में दखल नहीं देना चाहिए।कोर्ट को यह तय नहीं करना चाहिए कि सुरक्षा बल कौन से हथियार का इस्तेमाल करें, क्या तरीका इस्तेमाल करे। कश्मीर के हालात का अंदाजा यहां से नहीं लगाया जा सकता रोजाना वहां 50 घटनाएं हो रही हैं।  यहां तक कि बुरहान वानी की मौत के बाद 8 जुलाई से 11 अगस्त 2016 तक CRPF कैंप पर हमले की 252 वारदातें हुईं जिनमें 3177 लोग जख्मी हुए। सीमा पार से पथराव करने के लिए 16, 17 और 18 साल के युवकों को तैयार किया जा रहा है। AG ने पिछले साल अक्तूबर में तैयार गृहमंत्रालय की रिपोर्ट भी कोर्ट को दी थी। दरअसल, सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर जम्मू-कश्मीर में सेना द्वारा इस्तेमाल करने वाले पैलेट गन पर रोक लगाने की मांग की गई है। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा था। जम्मू कश्मीर हाईकोर्ट ने पैलेट गन पर रोक लगाने से इंकार कर दिया था।

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