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आसानी से उपलब्ध महिला को भी ‘ना’ कहने का अधिकार : बोंबे हाईकोर्ट [आर्डर पढ़े]

LiveLaw News Network
27 Sep 2017 6:49 AM GMT
आसानी से उपलब्ध महिला को भी ‘ना’ कहने का अधिकार : बोंबे हाईकोर्ट [आर्डर पढ़े]
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बॉम्बे हाई कोर्ट ने हाल ही में उस शख्स की अर्जी खारिज कर दी जिसमें याचिकाकर्ता ने पोक्सो मामले में दी गई सजा को सस्पेंड करनेे की गुहार लगाई थी। पोक्सो (प्रोटेक्शन ऑफ चाइल्ड फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंसेज एक्ट) में 10 साल कैद की सजा याचिकाकर्ता को सुनाई गई थी। ज्यादातर मामलों की तरह इस मामले में भी आरोपी विक्टिम का अंकल था।

याचिकाकर्ता आरोपी ने ट्रायल कोर्ट के जजमेंट के खिलाफ अर्जी दाखिल की थी औऱ कहा था कि जब तक अपील पेंडिंग है तब तक सजा सस्पेंड किया जाना चाहिए।

आरोपी की ओर से कहा गया कि लड़की ने रेप के बारे में कुछ भी नहीं कहा था। जब उसे शेल्टर होम ले जाया गया तब उसने कुछ नहीं कहा था। आरोपी ने आरोप लगाया था कि लड़की के दो पुरुष दोस्त थे और उसके साथ लड़की के सेक्सुअल रिलेशन थे। आरोपी की ओर से पेश आऱएन गीते ने कहा कि उनके मुवक्किल अकेले कमाने वाला शख्स है और ऐसे में उसे जमानत दी जानी चाहिए। हाई कोर्ट के जस्टिस एएम बदर ने केस के तथ्यों को देखने के बाद कहा कि विक्टिम लड़की की मां ने उसके पिता को छोड़ दिया था और वह अपनी आंटी के पास रह रही थी। आरोपी ने आंटी से शादी की हुई थी और उसने लगातार लड़की के साथ रेप किया था।

जस्टिस बदर ने टिप्पणी करते  हुए कहा...

एक महिला आसान सदगुण रखती है लेकिन इसका ये मतलब नहीं है कि कोई भी इसका एडवांटेज ले जाए। लड़की को पूरा अधिकार है कि वह ना कह सके। इस बात को मान भी लिया जाए कि विक्टिम के दो-दो पुरुष दोस्त थे इसका मतलब ये नहीं है कि याचिकाकर्ता उक्त लड़की के साथ जबरन संबंध बनाएं। लड़की सहमति देने की उम्र में भी नहीं थी वह बालिग नहीं थी। घर में कोई कमाने वाला नहीं है ये कारण नहीं है कि सजा को सस्पेंड कर दिया जाए। ऐसे में जमानत नहीं दी जा सकती और अर्जी खारिज की जाती है।


 
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