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2015 संशोधन के तहत सिर्फ पक्षकार का कर्मी होना ही मध्यस्थ की अयोग्यता का कारण नहीं : सुप्रीम कोर्ट [निर्णय पढ़ें]

LiveLaw News Network
19 Sep 2017 8:45 AM GMT
2015 संशोधन के तहत सिर्फ पक्षकार का कर्मी होना ही मध्यस्थ की अयोग्यता का कारण नहीं : सुप्रीम कोर्ट [निर्णय पढ़ें]
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अरावली पावर कंपनी लिमिटेड  बनाम ईरा इंफ्रा इंजीनियरिंग लिमिटेड केस में सुप्रीम कोर्ट ने आर्बिट्रेशन एंड कंसिलेशन एक्ट 1996 में 2015 में हुए संशोधन के लागू होने से पहले पडने वाले प्रभाव पर विचार किया।

प्रतिवादी कंपनी ने वादी कंपनी से थर्मल पावर प्रोजेक्ट के लिए निर्माण कार्य का करार किया था। जब दोनों के बीच विवाद हुआ तो दोनों के बीच समझौता कराने के लिए वादी कंपनी के सीईओ को मध्यस्थ नियुक्त किया गया। गौर करने वाली बात ये थी की समझौता क्लॉज 29 जुलाई 2015 को लागू किया गया जबकि सीईओ को 19 अगस्त 2015 को मध्यस्थ नियुक्त किया गया। ये तारीख इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि मध्यस्थता कानून 1996 में 2015 में हुआ संशोधन 23 अक्तूबर 2015 से लागू किया गया।

समझौता प्रक्रिया में शामिल होने के बाद वादी ने बयान दर्ज कराने के लिए और वक्त मांगने के बाद 12 जनवरी 2016 को पहली बार मध्यस्थ पर सवाल उठाया। वादी ने इसके खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट में एक्ट के सेक्शन 14 के तहत याचिका दाखिल की। याचिका में पक्षपात और पूर्वाग्रह के आधार पर मध्यस्थ के आदेश को रद्द करने की मांग की गई। हाईकोर्ट ने याचिका को मंजूर कर लिया। वहीं प्रतिवादी ने भी एक्ट के सेक्शन 11 (6) के तहत दिल्ली हाईकोर्ट चीफ जस्टिस से मध्यस्थ नियुक्त करने की मांग की। हाईकोर्ट ने इसे भी मंजूर करते हुए वादी से तीन मध्यस्थों के नाम मांगे।

इस मामले में गौर करने वाली बात ये है कि एक्ट में पांचवी सूची के तहत 2015 में संशोधन  मध्यस्थ की निष्पक्षता और स्वतंत्रता के मामले में वाजिब संदेह संबंधी हालात की गणना करता है।

पांचवी सूची की पहली इंट्री के मुताबिक किसी भी पक्षकार से व्यावसायिक रिश्ते रखने वाला वर्तमान या पूर्व कर्मचारी, कल्संटेंट या सलाहकार मध्यस्थ है। चूंकि इस मामले में वादी कंपनी का सीईओ मध्यस्थ है तो पांचवी सूची के मुताबिक ये निष्पक्षता और स्वतंत्रता को प्रभावित करता है। चूंकि ये मध्यस्था 2015 में हुए संशोधन से पूर्व हुई थी इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने संशोधन के तहत इसे लागू नहीं किया।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एेसे मामलों में जिनमें मध्यस्थ किसी भी पक्षकार का कर्मचारी हो तो ये अयोग्यता का आधार नहीं है। इसके पीछे कारण ये है कि सुप्रीम कोर्ट दोनों पक्षकारों के बीच करार की शर्तों का प्रभाव लागू करने के लिए बाध्य है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसमें एक शर्त जोड दी कि एेसा कोई व्यक्ति मध्यस्थ नहीं बन सकता जो  कंपनी के संबंधित करार  विषय को नियंत्रित करता हो या उस अथॉरिटी के अधीन काम करता हो जिसका निर्णय विवाद में हो।

इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सेक्शन 11(6) के तहत हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस अॉटोमैटिक रूप से मध्यस्थ की नियुक्ति नहीं कर सकते जब तक निम्न शर्तों को साबित ना करें




  •  कोई पक्षकार सेक्शन 11(6) (a) के तहत नियुक्ति प्रक्रिया में कार्रवाई करने में नाकाम हो  या

  • कोई भी पक्षकार या दो मध्यस्थ सेक्शन 11(6) (b)  के तहत आशास्वरूप किसी समझौते पर पहुंचने में नाकाम हों या

  • कोई व्यक्ति या संस्थान सेक्शन 11(6) (c) के तहत नियुक्ति प्रक्रिया में कोई दिए गए कार्य  को करने में नाकाम हो जाए।


कोर्ट के निष्कर्ष इस प्रकार हैं 

1. संशोधन से पूर्व 1996 एक्ट के तहत आने वाले केस




  • ये तथ्य है कि नामांकित मध्यस्थ एक पक्षकार का कर्मचारी है और ये अवधारणा बनाने का अाधार नहीं है कि वो पूर्वाग्रह या पक्षापात करेंगे या निष्पक्ष नहीं रहेंगे।

  • हालांकि एेसा कोई व्यक्ति मध्यस्थ बनता है जो कंपनी के संबंधित करार  विषय को नियंत्रित करता हो या उस अथॉरिटी के अधीन काम करता हो जिसका निर्णय विवाद में हो तो वाजिब संदेह किया जा सकता है।

  • जब तक कार्रवाई करने की स्थिति उत्पन्न ना हो हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस या उनके स्तर के जज 1996 एक्ट के सेक्शन 11 के सबसेक्शन ( 6)के (a), (b) और (c) के तहत अधिकार का इस्तेमाल नहीं कर सकते।

  • चीफ जस्टिस या उनके निर्दिष्ट एक्ट के सेक्शन 11 के सबसेक्शन ( 6) के तहत अधिकार का इस्तेमाल करते वक्त मध्यस्थता खंड में दी गई नियुक्ति प्रक्रिया को लागू करने का प्रयास करेंगे।

  • चीफ जस्टिस  या उनके निर्दिष्ट एक्ट के सेक्शन 11 के सबसेक्शन ( 6) के तहत अधिकार का इस्तेमाल करते वक्त हालात पैदा होने पर किसी मध्यस्थ के पक्षपात या पूर्वाग्रह के वाजिब संदेह होने पर नियुक्ति प्रक्रिया को नजरअंदाज कर किसी निष्पक्ष को मध्यस्थ नियुक्त कर सकते हैं। इसके लिए कारण भी दर्ज कराए जा सकते हैं।


2.संशोधन एक्ट लागू होने के बाद 1996 एक्ट के तहत केस

अगर मध्यस्थता खंड संशोधित प्रावधान के साथ किसी तरह की बेईमानी पाता है तो भले ही करार में मध्यस्था खंड के अनुरूप हो तो मध्यस्थ की नियुक्ति अवैध होगी। एेसे में कोर्ट को मध्यस्थ नियुक्त करने का अधिकार होगा।

 

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