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रोहिंग्या मामले में होगी हाईवोल्टेज सुनवाई, सुप्रीम कोर्ट ने कहा पहले देखेंगे कि कोर्ट को आदेश देने का अधिकार है या नहीं

LiveLaw News Network
18 Sep 2017 11:23 AM GMT
रोहिंग्या मामले में होगी हाईवोल्टेज सुनवाई, सुप्रीम कोर्ट ने कहा पहले देखेंगे कि कोर्ट को आदेश देने का अधिकार है या नहीं
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रोहिंग्या मुस्लिमों को वापस बर्मा भेजने के मुद्दे पर अब सुप्रीम कोर्ट में हाईवोल्टेज सुनवाई देखने को मिलेगी। रोहिंग्या के समर्थन में वरिष्ठ वकील फली नरीमन, श्याम दीवान, अश्विनी कुमार, कॉलिन गोंजाल्विस और प्रशांत भूषण कोर्ट में बहस करेंगे।

वहीं केंद्र की ओर से फिलहाल ASG तुषार मेहता ही पेश हो रहे हैं। देखना होगा कि मामले की सुनवाई के वक्त क्या केंद्र सरकार AG के के वेणुगोपाल को भी उतारा जाता है या नहीं

क्या हुआ कोर्टरूम में 

सोमवार को सुनवाई  के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र के हलफनामे पर विचार करने के लिए तीन अक्टूबर तक सुनवाई टाल दी। राजीव धवन और प्रशांत भूषण ने इस मामले में NHRC को नोटिस जारी करने की मांग की। लेकिन चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने इससे इंकार कर दिया।  चीफ जस्टिस ने कहा कि अभी ये कदम जल्दबाजी होगा। पहले कोर्ट ये देखेगा कि क्या इस मामले में  आदेश जारी करने का अधिकार है ? अगर है तो किस हद तक वो अपने अधिकार का इस्तेमाल कर सकता है।

दरअसल NHRC ने साफ कर दिया है कि वो केंद्र के 40 हजार रोहिंग्या मुस्लिमों को वापस भेजने के फैसले का विरोध करेगा।

ये हैं याचिका 

दरअसल बर्मा से भागकर भारत आए रोहिंग्या मुस्लिमों को वापस बर्मा भेजने के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। ये याचिका वकील प्रशांत भूषण के माध्यम से दो शरणार्थियों ने दाखिल की है जिन्होंने 14 अगस्त 2017 की रॉयटर की खबर का हवाला दिया है। इसके तहत केंद्र सरकार ने सभी राज्य सरकारों को गैरकानूनी रूप से देश में रह रहे सभी विदेशी नागरिकों, जिनमें रोहिंग्या भी शामिल हैं, उनकी पहचान करने और निर्वासित करने के आदेश दिए हैं। रोहिंग्या बौध धर्म बहुलता वाले बर्मा में कारवाई का सामना कर रहे हैं। देश में इस वक्त करीब 40 हजार रोहिंग्या मुस्लिम बताए जा रहे हैं।

याचिका में कहा गया है कि केंद्र सरकार का ये कदम संविधान के अनुच्छेद 14, 21 और 51 ( C) के खिलाफ है। उनका ये भी कहना है कि ये अवापसी नियम के सिद्धांत के भी खिलाफ है जिसमें कहा गया है कि किसी भी शरणार्थी को एेसे देश में वापस नहीं भेजा जाएगा जहां उसकी जान का खतरा हो। अंतर्राष्ट्रीय कानून के तहत याचिकाकर्ता व अन्य रोहिंग्या को राहत मिलेगी जो बर्मा में खूनी खेल, कारवाई और हिंसा से बचकर भारत आए हैं।

अर्जी में UNHRC की 2016 की रिपोर्ट को भी शामिल किया गया जिसमें बर्मा में अथॉरिटी द्वारा रोहिंग्या मुस्लिम के जीने के अधिकार, स्वतंत्रता और सुरक्षा को लेकर मानवाधिकारों के गंभीर उल्लंघन का जिक्र किया गया है। ये भी कहा गया है कि उन्हें बर्मा की नागरिकता नहीं दी गई है जिसके कारण ये मामले और बढ गए हैं।

सुप्रीम कोर्ट को ये भी बताया गया है कि रोहिंग्या मुस्लिमों के साथ बर्मा में किस तरह का बर्बर बर्ताव किया जा रहा है। खासतौर से महिलाओं व बच्चों के साथ हिंसा की जा रही है। उन्हें सिगरेट से जलाया जा रहा है। दाढी जलाई जा रही है। टार्चर किया जा रहा है, अवैध तौर पर हिरासत में रखा जा रहा है और मेडिकल सुविधाएं देने से इंकार किया जा रहा है। साथ ही उनका  यौन शौषण भी किया जा रहा है।

अर्जी में कहा गया है कि भारत में शरणार्थियों की सुरक्षा को लेकर कोई कानून नहीं है और एेसे में UNHRC के नियमों को ही आधार माना जाता है। इसके तहत उन्हें देश में रहने की इजाजत दी जाती है। याचिका में इसी आधार पर रोहिंग्या मुस्लिमों को भारत में ही रहने और उपयुक्त सुविधाएं दिलाने की मांग की गई है।

जम्मू के रोहिंग्या की याचिका 

सरकार के रोहिंग्या मुस्लिम के कट्टरपंथी बनने के बयान के बाद जम्मू में 23 कैंपों के 7000 रोहिंग्या मुस्लिम सुप्रीम कोर्ट पहुंचे हैं। इन आरोपों का खंडन करते हुए याचिका में सरकार के वापस भेजने के कदम का विरोध करते हुए कहा गया है कि उन्हें इसलिए निशाना बनाया जा रहा है क्योंकि वो मुस्लिम हैं।

 इस जनहित याचिका में कहा गया है कि उन्हें निर्वासित करने का कदम संविधान द्वारा दिए गए अनुच्छेद 14 के समानता के अधिकार का हनन होगा क्योंकि सरकार ने तिब्बती शरणार्थी व अन्य को अपने देश वापस जाने को नहीं कहा है। उन्हें निर्वासन सहित सख्त बर्ताव के लिए चुना गया है और इसके परिणामस्वरूप उनकी जान जाएगी। ये सब इसलिए हो रहा है क्योंकि सब गरीब और मुस्लिम हैं। भारत सरकार ने उनके मामले में सीधा सपाट और दो टूक नस्लवादी रुख अपनाया है।

याचिका में कहा गया है कि सभी सात हजार रोहिंग्या का आतंकवाद से कोई लेना देना नहीं है। जब से वो जम्मू में रह रहे हैं तब से उनके खिलाफ कोई भी आरोप नहीं लगे हैं। कोई भी रोहिंग्या आतंकी गतिविधियों में शामिल नहीं रहा। स्थानीय पुलिस पिछले एक साल से सभी से पूछताछ कर रही है और उसके पास हर परिवार की पूरी जानकारी मौजूद है। इतना ही नहीं पुलिस उनके पुनर्वास कैंपों का हर महीने कई बार निरीक्षण भी करती है। सारे रोहिंग्या पुलिस का सहयोग करते हैं और सारी जानकारी मुहैया कराते हैं। इसलिए उनके बीच एक भी आतंकी नहीं है।

के एन गोविंदाचार्य की हस्तक्षेप याचिका 

रोहिंग्या  मुसलमान न सिर्फ़ राष्ट्रीय संसाधन पर बोझ है बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर ख़तरा भी है, राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन के नेता के एन गोविंदाचार्य ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर कहा है।

के एन गोविंदाचार्य ने अपनी याचिका में कहा कि देश में रह रहे रोहिंग्या  मुसलमान की पहचान कर इन्हें वापस भेज जाए। के एन गोविंदाचार्य ने उस याचिका का विरोध किया है जिसमें भारत में अवैध रूप से रह रहे रोहिंग्या मुसलमानों को म्यांमार वापस भेजने के केद्र सरकार के फैसले को चुनौती दी गई है।

चेन्नई के एक संगठन 'इंडिक कलेक्टिव' की अर्जी

रोहिंग्या  मुसलमान 'इस्लामिक आतंक' का चेहरा है और रोहिंग्या मुसलमान को भारत में रहने की इजाजत देना अशांति, हंगामा और दुर्दशा को आमंत्रित करने के समान हैं।

इंडिक कलेक्टिव ने अपनी याचिका में कहा है कि कि वह सुप्रीम कोर्ट को यह बताना चाहता है कि रोहिंग्या मुसलमान को भारत में रहने की इजाजत देने से क्या खतरा है इस लिए रोहिंग्या मुसलमानों से संबंधित मामले में उन्हें भी सुना जाए।

तीन वकीलों की याचिका 

रोहिंग्या मुसलमानों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में वकील रोशन तारा जायसवाल, ज़ेबा ख़ैर और के जी गोपालकृष्णन ने याचिका दाखिल कर मांग की है कि सुप्रीम कोर्ट केंद्र सरकार के उस फैसले पर रोक लागये जिसमें वो रोहिंग्या मुसलमानों को वापस म्यांमार भेजने का फैसला किया है।

याचिका में कहा गया है कि अगर उन्हें वापस म्यांमार भेजा जाता है तो उनका उत्पीड़न किये जाने का खतरा है। याचिका में कहा गया है कि केंद्र सरकार अच्छे से जानती है कि म्यांमार में किस तरह से रोहिंग्या मुसलमानों के मानवाधिकारों का उलंधन किया जा रहा है। याचिका में मांग की गई है कि सुप्रीम कोर्ट केंद्र सरकार को निर्देश दे कि वो कोई ऐसा दिशा निर्देश बनाये ताकि भविष्य में इस तरह को परिस्थितियो को हैंडल किया जा सके।

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