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जब डॉक्टर, वकील को पैसा मिले तो सरोगेट मां को क्यों नहीं ? उसे परोपकार का उपदेश क्यों ? सरोगेसी को लेकर संसदीय स्थायी समिति ने बिल पर उठाए सवाल

LiveLaw News Network
13 Aug 2017 9:51 AM GMT
जब डॉक्टर, वकील को पैसा मिले तो सरोगेट मां को क्यों नहीं ? उसे परोपकार का उपदेश क्यों ? सरोगेसी को लेकर संसदीय स्थायी समिति ने बिल पर उठाए सवाल
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संसदीय स्थायी समिति ने सरोगेसी ( रेगुलेशन ) बिल 2016 में बडे बदलाव की सिफारिशें की हैं। इन सिफारिशों में कहा गया है कि सरोगेट को सही तरीके से कानूनी सरंक्षण और नियंत्रण निगरानी में नहीं रखा गया तो उसके शोषण होने की संभावनाएं बनी रहेंगी। इस शोषण को विधायिका के नियम तय करने और निगरानी करने से कम किया जा सकता है।

इस रिपोर्ट में कहा गया है कि सरोगेसी सेवा के लिए सरोगेट को मिलने वाले आर्थिक मौकों को पैतृक आधार पर खारिज नहीं किया जाना चाहिए। लेकिन महिला को किसी के लिए निशुल्क सेरोगसी करने की इजाजत तो ठीक है लेकिन उन्हें इसके लिए भुगतान किए जाने पर प्रतिबंध लगाना पूरी तरह अनुचित और मनमाना है। कमिशनिंग जोडे को जब बच्चा मिलता है तो डॉक्टर, वकील और अस्पताल को पैसा मिलता है जबकि सरोगेसी से बच्चा पैदा करने वाली महिला को उपकार का सिद्धांत पढाया जाता है। ये जमीनी हकीकत से बिल्कुल अलग है और इसे हटाया जाना चाहिए।
इस रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि नजदीकी रिश्तेदारों के लिए परोपकार में सेरोगेसी करना कहीं ना कहीं मजबूरी और दबाव में ही होता है।

दरअसल ये बिल संसदीय समिति को स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण द्वारा रेफर किया गया था क्योंकि इसमें कई अनियमितताएं पाई गई थीं। ये बिल पहले राज्यसभा में पेश किया गया और फिर दस अगस्त को लोकसभा में रखा गया।

दरअसल ये बिल सिर्फ नजदीकी रिश्तेदारों के लिए परोपकार के लिए ही सरोगेसी की इजाजत देता है और इसी ने समिति को हैरा।यन किया है। समिति ने अपनी रिपोर्ट में ये भी कहा है कि किसी बच्चे को गोद लेना कभी भी सरोगेसी का विकल्प नहीं बन सकता। गोद लेने के नाम पर सरकार किसी जोडे की सरोगेसी के जरिए अपने जैविक संतान हासिल करने के अधिकार को नहीं छीन सकती। सेरोगट मदर ते लिए गर्भ के दौरान मेडिकल जांच और मानसिक काउंसलिंग आदि के लिए मुआवजे के तौर पर माना जा सकता है। इसमें बच्चे का देखभाल,सरेगेट मदर के अपने बच्चों की मामसिक जांच, खानपान और दवाओं के साथ साथ डिलीवरी के बाद की देखभाल इसमें शामिल है।

कमेटी ने ये भी सिफारिश की है कि अगर गर्भावस्था के दौरान या बच्चे को जन्म देते वक्त सरोगेट मदर की मौत हो जाती है तो उसके रिश्तेदार को अतिरिक्त मुआवजा दिया जाना चाहिए। इस मुआवजे की रकम संबंधित एजेंसियों को तय करनी चाहिए और इसके बाद सरोगेट मदर और जोडे के बीच इसे लेकर मोलभाव नहीं होना चाहिए।
हालांकि समिति ने कहा है कि सरोगेसी को एक पेशे की तरह छूट नहीं दी जानी चाहिए। बिल के अनुसार एक महिला सिर्फ एक बार ही सेरोगसी कर सकती है। समिति ने इस पर अपनी सहमति जताई है।

समिति के सामने कहा गया है कि सरोगेसी को सिर्फ भारतीय शादीशुदा जोडे के लिए ही अनुमति देना संविधान के दिए जीने के अधिकार, निजी स्वतंत्रता, प्रजनन स्वायत्ता और समानता के अधिकार का हनन है। लेकिन समिति विदेशियों के लिए सरोगेसी की इजाजत देने के पक्ष में नहीं है। समिति ने कहा है कि विदेशी भारत को इसलिए चुनते हैं क्योंकि यहां सरोगेसी सस्ती पडती है। हांलांकि समिति ने बिल में NRI, PIO और OCI को सरोगेसी के लिए काबिल ना मानने पर अपनी असहमति जताई है। समिति ने सिफारिश की है कि एेसे जोडे या तो NOC दे या घोषणापत्र दें कि सरोगेसी से हुए बच्चे को वहीं नागरिकता मिलेगी जो उनके पास है।

समिति ने ये भी सिफारिश की है कि जोडे को  सरोगेसी के माध्यम से दूसरे बच्चे के लिए एक और मौका दिया जाना चाहिए अगर पहले बच्चे में कुछ कमियां हो तो भले ही पहला बच्चा सरोगेसी से हुआ हो या नहीं।समिति ने ये भी सिफारिश की है कि सरोगेस मदर के लिए एक विस्तृत बीमा कवर भी दिया जाना चाहिए जो कि 6 साल तक के लिए हो। इसमें सरोगेसी के वक्त और इसके बाद होने वाले असर को देखते हिए एक निश्चित मेडिकल बीमा और जीवन बीमा किया जाना चाहिए।

इसके अलावा सरोगेट बच्चे के लिए भी सामाजिक सुरक्षा बीमा का प्रावधान होना चाहिए ताकि सरोगेसी के वक्त जोडे की मौत होने या तलाक होने के चलते बच्चे को सरंक्षण दिया जा सके।  समिति ने ये भी कहा है कि सरोगेट मदर और बच्चा चाहने वाली मां दोनों को मैटरनिटी के लाभ मिलने चाहिएं क्योंकि दोनों ही बच्चे के जन्म और देखभाल में शामिल रहती है।

समिति ने कहा है कि इस सवाल का जवाब भी दिया जाना चाहिए कि अगर किसी जोडे में कोई एक गैमिट देने में नाकाम रहता है तो किसी दूसरे व्यक्ति से वो दान के तौर पर लिया जा सकता है। इसके लिए विधवाओं या तलाकशुदा महिलाओं से दान के बारे में भी विचार किया जाना चाहिए।

समिति चाहती है कि सरोगेसी ( रेगुलेशन ) बिल 2016 से पहले ART बिल भी लाया जाना चाहिए ताकि जो अस्पताल सरोगेसी कराएंगे उन्हें नियंत्रण किया जा सके। समिति ने ये भी सुझाव दिया है कि संबंधित एजेंसी एक तय समय सीमा के तहत जोडे और सरोगेस मदर की हालत को देखते हुए गर्भपात कि इजाजत भी दे। साथ ही ART बिल 2014 में भूर्ण स्टोर करने की इजाजत देने की सिफारिश भी की गई है।
ये बिल लिव इन पार्टनरशिप में रहने वालों को सरोगेसी की इजाजत नहीं देता और समिति ने इसे बेवजह का भेदभाव बताते हुए कहा है कि एक एेसा तरीका बनाया जाना चाहिए जिसें हर तोई सरोगेसी नियंत्रण के दायरे में आ सके।

वहीं इससे जुडे हुए लोगों ने समिति को कहा है कि सिर्फ मेरिटल स्टेटस के आधार पर सेरोगेसी की इजाजत देना मानवाधिकारों का उल्लंघन होगा। इसके साथ ही शादीशुदा जोडे को संतान ना होने की बिल की शर्त की भी कडी आलोचना की गई है। रिपोर्ट में कहा गया है कि देश में एक बच्चे की पोलिसी नहीं है एेसे में संतान ना होने की शर्त हटाई जा सकती है। इतना ही नहीं बिल में ये भी कहा गया है कि पांच साल तक संतान ना होने पर सेरोगेसी कराई जा सकती है। विशेषज्ञों ने इसकी भी आलोचना की है और कहा है कि ये प्रजनन स्वायत्ता के अधिकार का हनन है। रिपोर्ट में कहा गया है कि सेरोगेसी के लिए निसंतान होना आधार बनाया गया है लेकिन जो जोडे मेडिकल रुप से फिट हैं जरूरी नहीं कि वो पांच साल तक इंतजार करें। आजकल देरी से होने वाली शादियों में अगर कोई पांच साल तक का इंतजार करेगा तो उम्र के चलते उसके गैमिट पर असर पड सकता है।

वहीं बिल सिंगल पेरेंट को सेरोगेसी के लिए योग्य नहीं मानता क्योंकि इसके लिए वीर्य आदि दान के लिए तीसरे पक्ष की जरूरत होती है और इससे कानूनी अडचनें व कस्टडी के मुद्दे सामने आ सकते हैं। वहीं लिव इन पार्टनर भी सरेगेसी नहीं करा सकते क्योंकि वो कानून से बंधे नहीं है और बच्चे की सुरक्षा तो लेकर भी बाध्य नहीं होंगे।

समिति ने पाया है कि बिल में विधवा या तलाकशुदा महिलाओं पर प्रतिबंध लगाकर जमीनी हकीकत से अपना मुंह मोड लिया है क्योंकि किसी महिला का सामाजिक रुतबा इसी पर होता है कि वो बच्चा पैदा कर सकती है या नहीं और उस पर हमेशा संतान पैदा करने का दबाव रहता है। समिति ने कहा कि सरोगेसी के लिए योग्यताओं का दायर इस तरह बढाया जाना चाहिए कि कोई लिव इन, विधवा या तलाकशुदा महिलाओं की सेवा भी ले सकें।

समिति ने कहा है कि इसके लिए अथारिटी से प्रजनन में समर्थता के प्रमाणपत्र की जरूरत भी नहीं होनी चाहिए बल्कि बच्चा पैदा करने में नाकाम और गर्भ पूरा करने में फेल होने संबंधी मेडिकल कागजात को ही सेरोगेसी के लिए सबूत मानना चाहिए।
समिति ने ये भी सिफारिश दी है कि राष्ट्रीय स्तर पर एक रजिस्ट्री बनाई जानी चाहिए जो हर सरोगेट क्लीनिक के कामकाज और सेरोगेसी से जुडी हर जानकारी का लेखा जोखा रखे।

समिति ने कहा है कि बिल में सरोगेसी मदर के तौर पर मानव तस्करी, अपहरण और देश के अन्य हिस्सों में गतिविधियों जैसे अपराधों पर कुछ साफ नहीं किया गया है। इसके अलावा लिंग आधारित सरोगेसी पर भी आलोचना की गई है।
इस समिति में चेयरमैन प्रो. राम गोपाल यादव समेत राज्यसभा के दस सदस्य हैं जबकि 22 लोकसभा सदस्य हैं। इस रिपोर्ट के बाद संसद के भीतर और बाहर बडी बहस होने की संभावना है।

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