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विवादित संपत्ति मामलों में कोर्ट फीस तय करे के लिए सिर्फ सेल डीड ही आधार नहीं : सुप्रीम कोर्ट सबूत के आधार पर कोर्ट फीस तय नहीं की जा सकती [निर्णय पढ़ें]

LiveLaw News Network
11 Aug 2017 8:43 AM GMT
विवादित संपत्ति मामलों में कोर्ट फीस तय करे के लिए सिर्फ सेल डीड ही आधार नहीं : सुप्रीम कोर्ट सबूत के आधार पर कोर्ट फीस तय नहीं की जा सकती [निर्णय पढ़ें]
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सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि किसी संपत्ति के विवाद में विवादित संपत्ति के लिए कोर्ट फीस सिर्फ किसी कानून के प्रावधान के मुताबिक सेल  डीड के आधार पर तय नहीं की जा सकती बल्कि संपत्ति का सही मूल्यांकन किसी दूसरे स्तर पर हो सकता है।

जे वसंती vs N रमानी कंथम्माल केस में ये व्यवस्था देते हुए जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता में तीन जजों की पीठ ने कहा कि प्रतिवादी एेसे मामलों में अधिकार क्षेत्र का मुद्दा भी उठा सकता है।

दरअसल हाईकोर्ट ने एेसे केस में ट्रायल कोर्ट के आदेश पर मुहर लगाते हुए कहा था कि कोर्ट फीस सेल डीड में दिए संपत्ति के मूल्य के आधार पर ही दी जाएगी। हाईकोर्ट ने ये भी कहा कि कोर्ट फीस तथ्य और कानून के मिश्रित सवाल पर आधारित होती है और सबूत के आधार पर निर्धारित की जाती है।

इस संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की बेंच ने रत्नावर्माराजा vs विमला केस का हवाला देते हुए कहा कि मौजूदा केस में ये फैसला लागू नहीं हो सकता जिसमें कहा गया कि कोर्ट फीस सबूत के आधार पर निर्धारित होगी और ये मामला राजस्व व राज्य के मुनाफे का है। इसे केस में प्रतिवादी के तौर पर केस लड रहे पक्षकार के हाथों में ट्रायल  में बाधा पहुंचाने के लिए हथियार नहीं बनाया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उक्त केस में संपत्ति का सही मूल्यांकन मुद्दा था ना कि कोर्ट फीस एक्ट के तहत किसी प्रावधान को लागू करने का।

पीठ ने इस मुद्दे पर टिप्पणी करते हुए कहा कि हम ये कह सकते हैं कि किसी विवाद में संपत्ति में कोर्ट फीस सिर्फ किसी कानून के प्रावधान के मुताबिक सेल  डीड के आधार पर तय नहीं की जा सकती जो सिर्फ कानून के एक प्रावधान में लागू है। इसलिए एेसे माहौल में ये कहना सही नहीं होगा कि  कोर्ट फीस सबूत के आधार पर निर्धारित होगी और ये मामला राजस्व व राज्य के मुनाफे का है। इसे केस में प्रतिवादी के तौर पर केस लड रहे पक्षकार के हाथों में ट्रायल  में बाधा पहुंचाने के लिए हथियार नहीं बनाया जा सकता। ये इसलिए है कि कानून प्रतिवादी को ये अधिकार देता है कि वो अलग पैमाने पर अधिकारक्षेत्र का मुद्दा उठा सके।


 
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