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बीफ बैन मुद्दे पर महाराष्ट्र पहुंची सुप्रीम कोर्ट, कोर्ट ने नोटिस कर पूछा क्यों ना फिर से पुलिस को मिले घर में तला़शी का अधिकार

LiveLaw News Network
11 Aug 2017 8:34 AM GMT
बीफ बैन मुद्दे पर महाराष्ट्र पहुंची सुप्रीम कोर्ट, कोर्ट ने नोटिस कर पूछा क्यों ना फिर से पुलिस को मिले घर में तला़शी का अधिकार
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महाराष्ट्र में बीफ बैन के मामले में महाराष्ट्र सरकार की अर्जी पर सुप्रीम कोर्ट ने बोंबे हाईकोर्ट के याचिकाकर्ता को नोटिस जारी कर पूछा है कि क्यों ना उस प्रावधान को फिर से लागू किया जाए जिसके तहत पुलिस शक के आधार पर किसी घर में तला़शी ले सकती है ?

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को भी अन्य याचिकाओं के साथ जोड दिया है।

दरअसल महाराष्ट्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर बोंबे हाईकोर्ट के 6 मई 2016 के उस आदेश को चुनौती दी थी जिसमें महाराष्ट्र एनिमल प्रिजरवेशन ( अमेंडमेंट) एक्ट 1995 के सेक्शन 5D को रद्द कर दिया गया था।

- गइसके मुताबिक पुलिस गाय का मांस रखने के शक के चलते किसी भी व्यक्ति को रोकने और तलाशी लेने का अधिकार दिया गया था। इसके साथ ही पुलिस को इस मामले में किसी के घर में घुसकर तलाशी करने का अधिकार भी दिया गया था। हालांकि राज्य में 1976 से ही गाय स्लाटरिंग पर रोक है।

महाराष्ट्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका में कहा है कि बोंबे हाईकोर्ट ने अपने फैसले में गलती की है और इस सेक्शन को रद्द करने पीछे ये तर्क दिया है कि ये लोगों के निजता के मौलिक अधिकार का हनन करता है। क्योंकि इसके तहत शक के आधार पर ही पुलिस किसी को रोक सकती है, घर में घुसकर तलाशी ले सकती है।

सरकार ने दाखिल अपनी याचिका में कहा है कि इस फैसले में हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट की 8 जजों के संविधान पीठ के 1954 और 6 जजों के पीठ का 1962 के फैसले को ध्यान में नहीं रखा जिसके मुताबिक निजता मौलिक अधिकार का हिस्सा नहीं है। अब सुप्रीम कोर्ट के 9 जजों की संविधान पीठ ने सुनवाई की है कि निजता मौलिक अधिकार का हिस्सा है या नहीं। एेसे में हाईकोर्ट ने सही तरीके से कानून को ध्यान में नहीं रखा और न्यायिक अनुशासन के अनुरुप फैसला नहीं दिया जो कि  जस्टिस डिलीवरी सिस्टम का मूल तत्व है।

सरकार ने बोंबे हाईकोर्ट के एक्ट के सेक्शन 9 D को रद्द करने के आदेश को भी चुनौती दी है जिसके मुताबिक पकडे जाने पर आरोपी को ही साबित करना होगा कि वो निर्दोष है। हाईकोर्ट का कहना था कि ये जीने के अधिकार का हनन है। सरकार ने कहा है कि ये प्रावधान PMLA,NDPS, कस्टम एक्ट समेत कई कानूनों में मौजूद है।

गौरतलब है कि राज्य सरकार द्वारा महाराष्ट्र पशु संरक्षण (संशोधन) अधिनियम लागू कर गायों के अलावा बैलों और सांडों के वध पर प्रतिबंध को मुंबई हाई कोर्ट ने कायम रखा था। हालांकि, हाई कोर्ट ने अधिनियम की संबद्ध धाराओं को रद्द करते हुए कहा था कि महज गोमांस रखना ही आपराधिक कार्रवाई को आमंत्रित नहीं कर सकता। राज्य के बाहर मारे गए पशुओं का मांस रखने पर आपराधिक कार्रवाई नहीं किए जाने संबंधी हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली और अन्य याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट पहले ही सुनवाई कर रहा है।

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