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केरल हाईकोर्ट ने सरकार के प्राइवेट मेडिकल कालेजों में तय फीस पर रोक लगाने किया इंकार, लेकिन कहा कानून में लंबे वक्त तक टिकने वाला नहीं लगता [याचिका और आदेश पढ़ें]

LiveLaw News Network
10 Aug 2017 2:47 PM GMT
केरल हाईकोर्ट ने सरकार के प्राइवेट मेडिकल कालेजों में तय फीस पर रोक लगाने किया इंकार, लेकिन कहा कानून में लंबे वक्त तक टिकने वाला नहीं लगता [याचिका और आदेश पढ़ें]
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केरल हाईकोर्ट ने प्राइवेट मेडिकल कालेज में दाखिले के लिए राज्य सरकार द्वारा बनाई गई रेगुलेटरी कमेटी के प्रोविजनल फीस तय किए जाने पर अंतरिम रोक लगाने से इंकार कर दिया। हालांकि हाईकोर्ट ने कहा है कि प्रथम दृष्टया जो फीस तय की गई है वो कानून में लंबे वक्त तक टिकने वाली नहीं लगती।

केरल हाईकोर्ट की चीफ जस्टिस नवनीती प्रसाद सिंह और जस्टिस राजा विजयराघवन की खंडपीठ ने कहा कि रेगुलेटरी कमेटी ने जो फीस तय की है उसके लिंए ना तो तथ्य दिए और ना ही आंकडे। इसके अलावा कमेटी इसके लिए प्राधिकृत भी नहीं है। कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि हम कमेटी का सिफारिशों को रद्द भी कर सकते थे लेकिन ये सिर्फ अनिश्चितता का माहौल बनाएगा। खासतौर पर कुछ कालेज प्रबंधन और सरकार के बीच करार होने के चलते काउंसलिंग का पहला चरण 8 अगस्त से शुरु हो चुका है, इसलिए कोर्ट का अतरिम रोक का आदेश ना सिर्फ काउंसलिंग प्रक्रिया को बाधा पहुंचा सकता है बल्कि उन छात्रों को भी प्रभावित कर सकता है जो एक कालेज से दूसरे कालेज में माइग्रेशन चाहते हैं। साथ ही विकल्प में बदलाव होने पर जमा की गई फीस की रिफंड प्रक्रिया पर भी प्रभाव पडेगा।

दरअसल केरल सरकार ने प्राइवेट मेडिकल कालेजों के लिए केरल मेडिकल एजुकेशन ( रेगुलेशन एंड कंट्रोल आफ एडमिशन टू प्राइवेट मेडिकल एजुकेशनल इंस्टीटयूशन) आर्डिनेंस 2017 के तहत प्रोविजनल फीस नियंत्रण रेगुलेटरी कमेटी का गठन किया है। इस कमेटी ने  जनरल मेरिट सीट पर प्रति वर्ष 5 लाख रुपये फीस निर्धारित की है।

इसी को लेकर प्राइवेट मेडिकल कालेज प्रबंधनों ने आर्डिनेंस के साथ साथ फीस तय किए जाने को भी हाईकोर्ट में चुनौती दी है। याचिका में कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट ने T.M.A पाई फाउंडेशन आदि केसों में फैसला दिया है कि प्राइवेट कालेज अपनी फीस खुद तय कर सकते हैं। राज्य सरकार को सिर्फ ये अधिकार है कि वो कैपिटेशन फीस और मुनाफे पर नियंत्रण रखे। इसलिए फीस नियंत्रण के अधिकार के तहत राज्य सरकार फीस तय नहीं कर सकती। इसके अलावा कमेटी को इस तरह फीस तय करने का अधिकार नहीं है।

हालांकि 13 जुलाई 2017 को फीस तय किए जाने के बाद कुछ प्रबंधनों ने सीट बंटवारे के आधार पर सरकार से करार किया था। इसके तहत पारियारम मेडिकल कालेज में सामान्य सीट के लिए 10 लाख रुपये और CSI  कराकोनम और MES मेडिकल कालेजों में 11 लाख रुपये फीस तय की गई। इस तरह दो तरह के कालेजों की श्रेणी हो गई जिसमें एक वो जिसमें सरकार से करार ना करने पर सालाना पांच लाख रुपये फीस तय की गई जबकि दूसरी श्रेणी में करार होने पर सालाना 10 और 11 लाख रुपये फीस तय हुई। आर्डिनेंस के जरिए इस करार पर मुहर लगाई गई। कुछ छात्रों ने इस करार और बढी हुई फीस को भी चुनौती दी। हाईकोर्ट ने साफ किया है कि फीस तय करने का मुद्दा वो सुनवाई के बाद तय करेगा। कोर्ट मामले की सुनवाई 21 अगस्त 2017 को करेगा।

हालांकि हाईकोर्ट ने छात्रों में असुविधा और भ्रम को दूर करने के लिए फिलहाल कुछ निर्देश भी जारी किए हैं। इनके तहत

- छात्र प्रवेश परीक्षा कमिश्नर को पांच लाख रुपये का भुगतान कर दाखिला ले सकते हैं। ये रकम इसके बाद कालेज के खाते में भेज दी जाएगी।

- छात्रों को सूचित किया जाए कि फीस के या तो घटने ( अगर कालेज ने सरकार से करार किया है तो ) की संभावना है या फिर करार ना होने की सूरत में बढने की।

- अगर कोई  छात्र एेसे कालेज में दाखिला ले रहा है जिसमें फीस 11 लाख रुपये तय की गई है तो उसे प्रवेश परीक्षा कमिश्नर को फिलहाल पांच लाख रुपये देने होंगे। बाकी रकम के लिए वो बैंक गारंटी जमा कर सकता है।


 

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