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सोशल मीडिया में कही जाने वाली आपत्तिजनक बातें अपराध [निर्णय पढें]

LiveLaw News Network
5 July 2017 1:35 PM GMT
सोशल मीडिया में कही जाने वाली आपत्तिजनक बातें अपराध [निर्णय पढें]
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दिल्ली हाई हाई कोर्ट ने एक मामले की सुनवाई के दौरान कहा है कि एससी और एसटी समुदाय के किसी शख्स के खिलाफ सोशल मीडिया पर यहां तक कि ग्रुप में चैट में कही जाने वाली आपत्तिजनक बातें अपराध की श्रेणी में आएगा। यानी सोशल मीडिया पर एससी और एसटी समुदाय के किसी शख्स के खिलाफ आपत्तिजनक बातें करने वाला मुश्किल में आ सकता है। 


हाई कोर्ट ने कहा कि एसी और एसटी एक्ट 1989 में इस समुदाय के लोगों पर सोशल मीडिया के जरिये भी आपत्तिजनक टिप्पणियां करना वर्जित है और ऐसा करने वाले को इस धारा में सजा हो सकती है। इस मामले में फेसबुक में एक पोस्ट के खिलाफ दाखिल याचिका पर सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने उक्त टिप्पणी की। इस धारा के दायरे में वाट्सएप चैट भी आएगा। 


हाई कोर्ट के जस्टिस विपिन सांघी ने कहा कि फेसबुक यूजर अगर अपनी सेटिंग को प्राइवेट से पब्लिक करता है तो इससे जाहिर है कि उसके वाल पर जो बाते लिखी गई है वह सभी लोग देख सकते हैं यानी कोई भी फेसबुक यूजर्स देख सकेत हैं। कोई ऐसी आपत्तिजनक टिप्पणी अगर पोस्ट हो जाता है औऱर बाद में उसे प्राइवेसी सेटिंग के तहत प्राइवेट कर दिया जाता है तो भी एससी व एसटी एक्ट के तहत अपराध माना जाएगा। 


हाई कोर्ट में एक एससी महिला की ओर से दायिका दायर की गई थी। याचिका में उसने अपनी देवरानी पर आरोप लगाया था कि वह उसे सोशल साइट पर प्रताड़ित कर रही है। महिला का आरोप है कि देवरानी राजपूत है और उसने धोबी समुदाय के लिए गलत शब्द का प्रयोग किया। वहीं प्रतिवादी ने कहा कि फेसबुक पर लिखे बात को सच भी माना जाए तो भी उसका मकसद किसी को ठेस पहुंचाना नहीं था। उसने धोबी समुदाय के बारे में जो कुछ भी लिखा वह किसी खास व्यक्ति से संबंधित नहीं था। बाद में ये भी दलील दी कि उसके फेसबुक के प्राइवेट स्पेस पर किसी और का ये अधिकार नहीं है कि वह खुद को आहत माने और उसके अधिकार का उल्लंघन करे। कोर्ट ने हालांकि मामले में राजपूत महिला को राहत दी और उसके खिलाफ दर्ज केस रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि अगर कोई सामान्य तौर पर बात कही है और किसी जाति विशेष को निशाना नहीं बनाया गया तो वह अपराध नहीं है। कोर्ट ने उसकी इस दलील को खारिज कर दिया जिसमें उसने कहा था कि फेसबुक उसका प्राइवेट स्पेस है। कोर्ट ने कहा कि प्राइवेट स्पेस जरूर है लेकिन पब्लिक व्यू के दायरे में है।

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