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पूर्व सीजेआई पद्म विभूषण जस्टिस पीएन भगवती का निधन 

LiveLaw News Network
25 Jun 2017 6:34 AM GMT
पूर्व सीजेआई पद्म विभूषण जस्टिस पीएन भगवती का निधन 
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भारत के पूर्व चीफ जस्टिस पीएन भगवती का निधन हो गया। जस्टिस पीएन ऐसे जज थे जिन्होंने पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन(पीआईएल)की अवधारणा व ज्यूडिशियल एक्टिविज्म को भारत में प्रस्तावित किया या लागू किया। उनका दाह-संस्कार शनिवार को शाम चार बजे लोधी रोड इलैक्ट्रिक शवदाह गृह में किया गया।


पद्म विभूषण से सम्मानित जस्टिस प्रफुल्लाचंद्रा नटवरलाल भगवती का जन्म 21 दिसम्बर 1921 को गुजरात में हुआ था। उनके पिता सुप्रीम कोर्ट के जज थे और वह स्वयं भी भारत के 17वें चीफ जस्टिस बने और उन्होंने 12 जुलाई 1985 से अपने रिटायर होने तक बीस दिसम्बर 1986 तक अपनी सेवाएं दी। भगवती ने अपनी शिक्षा मुम्बई में प्राप्त की। उन्होने इलफिनस्टोन कालेज से मैथ आनर्स की पढ़ाई की और वर्ष 1941 में बाॅम्बे यूनिवर्सिटी से अपनी डिग्री ग्रहण की। उन्होंने अपने कैरियर की शुरूआत बाॅम्बे हाईकोर्ट में प्रक्टिस करके की। वर्ष 1960 में उनको गुजरात हाईकोर्ट में बतौर जज नियुक्त कर दिया गया। सितम्बर 1967 में उनको हाईकोर्ट का चीफ जस्टिस बना दिया गया। दो बार कुछ-कुछ समय के लिए उन्होंने गुजरात के राज्यपाल के तौर पर भी काम किया। जुलाई 1973 में उनको सुप्रीम कोर्ट में जज नियुक्त कर दिया गया। वर्ष 1985 में वह चीफ जस्टिस आॅफ इंडिया बन गए।


सुप्रीम कोर्ट के जज के तौर पर उन्होंने पीआईएल की अवधारणा और भारतीय न्यायिक सिस्टम की असीम जिम्मेदारी को प्रस्तावित किया। इसलिए उनको देश में ज्यूडिशियल एक्टिविज्म आरंभ करने वाला माना गया।


बतौर जज अपने अनिंदनीय कार्यकाल के दौरान,उनके लिए बस एक छोटा काला धब्बा उनके द्वारा दिया गया एक विवादित फैसला था। यह फैसला एडीएम जबलपुर बनाम शिवकांत शुक्ला(इस केस को एडीएम जबलपुर या हैबिएस काॅरप्स केस के नाम से जाना जाता है) केस में दिया गया था। इस फैसले के तहत कहा गया था कि एमरजेंसी के दौरान,किसी व्यक्ति को गैरकानूनी तरीके से हिरासत में न लेने का अधिकार संस्पेंड किया जा सकता है। भागवती बाद में उन प्रमुख विचारों से सहमत हुए,जिनमें इस फैसले को शाॅर्ट साइटिड या कमबीन माना गया था और इसके लिए माफी भी मांगी।


लाइव लाॅ की टीम उनकी आत्मा के प्रति गहरा आदरभाव अभिव्यक्त करती है। भगवान उनकी आत्मा को शांति दे।
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