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डीयू लाॅ फैकल्टी पर बीसीआई ने लगाया तीस लाख रूपए का जुर्माना

LiveLaw News Network
14 Jun 2017 7:28 AM GMT
डीयू लाॅ फैकल्टी पर बीसीआई ने लगाया तीस लाख रूपए का जुर्माना
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डीयू की लाॅ फैकल्टी पर नई मुसीबत आ गई है,बार काउंसिल आॅफ इंडिया(बीसीआई) ने उन पर तीस लाख रूपए जुर्माना लगा दिया है। साथ ही कहा है कि इस शैक्षणिक सत्र में 1440 से ज्यादा छात्रों को दाखिला न दे। यह जुर्माना एफिलियेशन फीस न देने,बिना अनुमति के पढ़ाना जारी रखने और अलग-अलग केंद्रों में उचित ढ़ांचागत सुविधाएं उपलब्ध न कराने के चलते लगाई है। पहले भी कहा गया था कि वह ज्यादा छात्रों को दाखिला न दे,जब तक कि उनके पास पर्याप्त ढ़ांचागत सुविधाएं व फैकल्टी मैंबर ना हो।

इस मामले में अब बीसीआई के समक्ष लाॅ फैकल्टी की डीन वेद कुमारी व यूनिवर्सिटी रजिस्ट्रार तरूण दास एक प्रतिरूप या बयान सौंपा है। इस पत्र में जुर्माने को माफ की मांग की गई है। कहा गया है कि फैकल्टी एक पब्लिक फंडिड एजुकेशन इंस्ट्टियूट है,जिसे यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन से फंड मिलते है। इस तरह के जुर्माने को भरने के लिए उनको कोई फंड नहीं मिलता है।

इस पत्र में यह भी मांग की गई है कि विभाग को ज्यादा छात्रों को दाखिला देने की अनुमति दी जाए क्योंकि यूनिवर्सिटी वैधानिक अधिकारियों की तरफ से उनको तीन सेंटर में छात्रों को दाखिला लेने की अनुमति मिली हुई है। इस पत्र में कहा गया है कि जहां तक कम फैकल्टी मैंबर की बात है तो कई पदों के लिए पहले ही विज्ञापन जारी किए जा चुके है। वहीं नियुक्ति की इस प्रक्रिया को नया शैक्षणिक सत्र पूरा होने से पहले पूरा कर लिया जाएगा। दावा किया गया है कि नई नियुक्ति होने के बाद शिक्षक व छात्रों का अनुपात सुधर जाएगा। इस समय जो अनुपात 43 छात्रों पर एक शिक्षक का है,वो सुधर कर 19 छात्रों पर एक शिक्षक का हो जाएगा। यह भी कहा गया है कि यह देश के स्रोत को बर्बाद करने के समान होगा क्योंकि बहुत सारे छात्र गुणवत्तापूर्वक व वहन करने योग्य लीगल एजुकेशन को प्राप्त करने का इंतजार कर रहे है।

सितम्बर 2014 में डीयू लाॅ फैकल्टी उस समय मुसीबत में फंस गई थी,जब बीसीआई ने लाॅ कोर्स के लिए इनकी मान्यता खत्म करने का निर्णय किया था। यह मामला इनके तीन सेंटर-कैंपस लाॅ सेंटर,लाॅ सेंटर एक व लाॅ सेंटर 2 से संबंधित थी। ऐसा इसलिए हुआ था कि बार-बार रिमाइंडर भेजने के बाद भी लाॅ फैकल्टी ने अपनी मान्यता की अनुमति को बढ़वाया नहीं था।

डीयू लाॅ फैकल्टी के तत्कालीन डीन प्रोफेसर अश्वनी कुमार बंसल ने उस समय बीसीआई को एक पत्र लिखकर इस कठोर कदम पर हैरानी जताई थी। सभी स्टेकहोल्डर में इस कारण आई बैचेनी के कारण एक महीने बाद डीयू ने मान्यता व इंस्पेक्शन के लिए बीसीआई को लीगल एजुकेशन रूल के तहत एक अर्जी भेजी थी ताकि संस्थान में लाॅ ग्रेजुएशन की पढ़ाई करने वाले छात्रों को राहत दी जा सके।

इस घटना के बाद यूनिवर्सिटी ने निर्णय लिया कि वह जल्द ही अपनी लाॅ फैकल्टी को अपने 90 साल पुराने कैंपस से बाहर शिफट कर देगी। परंतु यह निर्णय छात्रों को पसंद नहीं आया क्योंकि नई फैकल्टी का साइज छोटा था। जिसके बाद बीसीआई ने वर्ष 2013-14 तक लाॅ ग्रेजुएशन की डिग्री पास कर चुके छात्रों को बतौर वकील नामांकन कराने की अनुमति दे दी थी।

इसके बाद भी बीसीआई की लीगल एजुकेशन कमेटी ने डीयू को एक नया नोटिस जारी किया था,जिसमें कहा गया था कि वह अपनी कार्यप्रणाली की अवैधता के बारे में स्पष्टीकरण दे और मांग की थी कि लिखित में आश्वासन दिया जाए कि वह निर्धारित अनुशंसाओं का पालन करेंगे। साथ ही पिछले साल डीयू से बीसीआई ने यह भी कहा था कि वह अपने ईवनिंग लाॅ कोर्स को बंद कर दे और छात्रों की संख्या भी 800 के करीब कम कर दे। यह कदम बीसीआई द्वारा दायर एक एडवर्स रिपोर्ट के बाद उठाया गया था,जिसमें आरोप लगाया गया था कि यूनिवर्सिटी ने लीगल एजुकेशन रूल का उल्लंघन किया है क्योंकि वह शाम को सात बजे के बाद भी कक्षाएं लगा रहे है। साथ ही सलाह दी गई थी कि इन कक्षाओं के लिए अपना नांमाकन करवा चुके छात्रों को साढ़े पांच-पांच घंटे के विशेष शिक्षण दिए जाए। डीयू को यह भी निर्देश दिया गया था कि हर सेंटर के लिए प्रत्येक साल दो-दो लाख रूपए जमा कराए ताकि ईवनिंग कक्षाओं में पढ़कर ग्रेजुएशन करने वाले छात्रों को बतौर वकील अपना नामांकन करवाने में कोई दिक्कत न हो।

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