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तीन तलाक के खिलाफ दायर याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने रखा फैसला सुरक्षित

LiveLaw News Network
14 Jun 2017 7:20 AM GMT
तीन तलाक के खिलाफ दायर याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने रखा फैसला सुरक्षित
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तीन तलाक के खिलाफ दाखिल याचिका पर छह दिनों की मैराथन सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया है। सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस जेएस खेहर की अगुवाई वाली संवैधानिक बेंच ने मामले में सुनवाई के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया। मामले की जिरह के अंतिम दिन कई याचिकाकर्ता महिलाओं व वूमन राईट संगठनों की तरफ से पेश वकील आंनद ग्रोवर,सलमान खुर्शीद,आरिफ मोहम्मद खान व इंद्रा जयसिंह ने जोरदार दलील देते हुए मांग की है कि तीन तलाक को अवैध व असंवैधानिक करार दे दिया जाए।

वहीं कोर्ट ने ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ( एआईएमपीएलबी) की तरफ से पेश वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल को केंद्र सरकार की तरफ से पेश खंडन का काउंटर करने का भी मौका दिया।

तीन तलाक के मामले में काजियों को जारी सर्कुलर

केंद्र सरकार की तरफ से दी गई दलीलों का खंडन पूरा करने से पहले सिब्बल ने कोर्ट का बताया कि एआईएमपीएलबी ने बुधवार को एक बैठक बुलाई थी,जिसमें निर्णय लिया गया है कि सभी काजियों को एक सर्कुलर जारी किया जाएगा,जिसके अनुसार काजी निकाहनामा तैयार करते समय पति को सलाह देंगे कि वह तीन तलाक का प्रयोग न करें और निकाहनामा में ये शामिल किया जाएगा कि पत्नी तीन तलाक के प्रावधान को निकाहनामा में न रखने को कह सकती है। इससे पूर्व कोर्ट ने एआईएमपीएलबी से कहा था कि अगर संभव हो तो वह निकाहनामा (शादी का अनुबंध) में एक प्रावधान शामिल किया जाए,कि मुस्लिम महिलाओं को तीन तलाक को नो कहने का अधिकार मिल सके।

मुख्य न्यायाधीश जे एस केहर की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय खंडपीठ ने सिब्बल से कहा था कि क्या यह संभव है कि पत्नियों को एक विकल्प दिया जाए,जिसके तहत वह तीन तलाक की बात के लिए हां या ना कह सके? क्या सभी काजियों के लिए इस तरह का कोई रिज्योलूशन पास किया जा सकता है,जिसमें इस तरह की शर्त निकाहनामा में शामिल हो(जिसमें महिलाओं को तीन तलाक को ना कहने का अधिकार मिल जाए)?

जिसके बाद सिब्बल ने कहा था कि यह बहुत अच्छा विचार है,वह इस बारे में बोर्ड को सूचित कर देगा।दलीलों का खंडन पेश करते समय जस्टिस कुरियन जोसेफ ने सिब्बल से पूछा कि तीन तलाक क्या धर्मशास्त्र के अनुसार बुरा व पाप नहीं था? जिस पर सिब्बल ने कहा कि समाज में काफी पाप मानी जाने वाली बातंे होती है,जिनको रीति-रिवाजों के द्वारा संरक्षण मिला हुआ है।

जब सिब्बल ने दलील दी कि हो सकता है कि यह बुरा हो,हो सकता है कि यह पाप हो,परंतु महिलाओं ने इसे स्वीकार किया है। तभी कोर्ट में मौजूद महिला याचिकाकर्ताओं की तरफ से पेश होने वाली महिला वकीलों ने चिल्लाते हुए कहा,नहीं-नहीं ऐसा नहीं है।

सिब्बल ने यह भी दलील दी कि कोर्ट का यह काम नहीं है कि वह एक संवैधानिक खंडपीठ बैठाए और इस बात का निर्णय करे कि समाज में क्या पाप है। कोर्ट इस मामले में एक फिसलने वाले ढ़लाव पर बैठी है क्योंकि अगर इस मामले को कोर्ट ने अपनी अनुमति दे दी तो समाज की कई प्रैक्टिस को बैन करने की मांग उठ जाएगी। वह सभी कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में नहीं है,इसलिए इस मामले में हस्तक्षेप न किया जाए।

तभी वकील इंद्रा जयसिंह ने मामले में हस्तक्षेप करते हुए कहा कि यह कोई फिसलने वाला ढ़लान नहीं है,परंतु हां कोर्ट को इस मामले में  उस्तरे की धार पर चलना होगा,जो न्यायपालिका के लिए एक चुनौती है।

तीन तलाक के पक्ष में बोलने वाले एआईएमपीएलबी व अन्य सभी की दलीलों का खंडन पेश करते हुए केंद्र की तरफ से अॅटार्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने कहा कि इस मामले को बहुसंख्यक बनाम अल्पसंख्यक के तौर पर पेश किया जा रहा है,जबकि यह मामला पुरूष बनाम महिला का है।

रोहतगी ने कहा कि केंद्र इस मामले में आगे बढ़कर कानून लाने के लिए तैयार है। यह मामला बहुसंख्यक बनाम अल्संख्यक नहीं है। यह एक धर्म के अंदर ही महिलाओं के अधिकार का मामला है। यह 1400 साल पुराने रिवाजों की बात नहीं है बल्कि 1400 सालों से अपने अधिकार से वंचित रहने का मामला है। इससे पूर्व एआईएमपीएलबी के वकील सिब्बल ने सवाल उठाया था कि कैसे एक 1400 साल पुरानी प्रैक्टिस को असंवैधानिक करार दिया जा सकता है। इसी दलील का जवाब देते हुए रोहतगी ने यह बातें कही।

एजी ने कहा कि इस्लाम उन इस्लामिक देशों में भी फल-फूल रहा है,जिन्होंने तीन तलाक को खत्म कर दिया है। ऐसे में क्या किसी धर्म के लिए कोई प्रैक्टिस महत्वपूर्ण है? हमारा एक धर्मनिरपेक्ष संविधान है। बंटवारे के कड़े अनुभवों के बाद भी हमारे फादर्स ने सभी धर्मो को मूल में रखा,परंतु इसके लिए मौलिक अधिकारों का ध्यान में रखा जाना जरूरी है।

 वहीं एजी ने कहा कि देश पहले भी कई आपत्तिजनक प्रथाओं से छुटकारा पा चुका है,जिनमें सतीप्रथा,देवदासी व शिशुहत्या आदि शामिल है,जो हिंदुओं में प्रचलित थी। जिस पर मुख्य न्यायाधीश केहर ने उनको याद दिलाते हुए कहा कि इन प्रथाओं को खत्म करने के लिए कोर्ट ने कुछ नहीं किया,बल्कि उनको विधान के जरिए खत्म किया गया है।

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