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सैनिक की 79 साल की विधवा को दी जाए पेंशन-बाॅम्बे हाईकोर्ट

LiveLaw News Network
31 May 2017 2:50 PM GMT
सैनिक की 79 साल की विधवा को दी जाए पेंशन-बाॅम्बे हाईकोर्ट
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बॉम्बे हाई कोर्ट से 79 साल की विधवा को राहत मिली है। हाई कोर्ट ने निर्देश दिया है कि सैनिक की विधवा का पेंशन शुरू किया जाए। तुलसीबाई अपनी पेंशन पाने के लिए पिछले आठ साल से प्रयास कर रही है।

एक सैनिक की 79 साल की विधवा को राहत देते हुए बाॅम्बे हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के सैनिक वेल्फेयर डिपार्टमेंट को निर्देश दिया है कि एक बार बुजुर्ग महिला की तरफ से सभी जरूरी कागजात पेश कर दिए जाने के बाद उसकी पेंशन शुरू कर दी जाए।

न्यायमूर्ति अनूप मोहता व न्यायमूर्ति आरवी घुगे की खंडपीठ ने इस मामले में 17 अप्रैल को एक आदेश दिया था,जिसमें कहा गया था कि तुलसीबाई द्वारा जरूरी कागजात पेश किए जाने के बाद उसकी पेंशन शुरू कर दी जाए।

तुलसीबाई के पति गणपति सूर्यावंशी ने दूसरे विश्व युद्ध के समय अपनी सेवाएं दी थी और वर्ष 1947 में रिटायर हुए थे। न तो उसको कभी पेंशन मिली और न ही उसके किसी परिजन को। वह अपने मरने तक अपने परिजनों के साथ अपने पैतृक राज्य कर्नाटक में रहे। उसके बाद उनकी पत्नी तुलसीबाई महाराष्ट्र में शिफट हो गई।

29 दिसम्बर 1989 को सरकार द्वारा पास रिज्योलूशन के अनुसार दूसरे विश्व युद्ध के समय अपनी सेवाएं देने वाले पूर्व सर्विसमैन की विधवाओं को वित्तिय लाभ देने की बात कही गई थी। इस स्कीम का लाभ उन विधवाओं को दिया जाना था,जिनका डोमिसाइल महाराष्ट्र का था।
इस जीआर के बारे में पता चलने के बाद तुलसीबाई ने भी पेंशन के लिए अप्लाई किया था,परंतु उसे बताया गया कि वह इस पेंशन को पाने की हकदार नहीं है क्योंकि वह महाराष्ट्र की रहने वाली नहीं है।

तुलसीबाई के वकील धेरशील सुतर ने दलील दी कि तुलसीबाई के डोमिसाइल के अलावा बाकी सारे कागजात पेश कर दिए गए है। वहीं उसका डोमिसाइल भी संबंधित अधिकारियों के पास तीन दिन के अंदर भेज दिया जाएगा।

तीन मई को दोनों पक्षों को सुनने के बाद कोर्ट ने स्टेट अॅथारिटी से कहा कि वह कोर्ट के 17 अप्रैल के आदेश का पालन करे।
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स्कूल व शिक्षण संस्थान शुरूआती स्तर पर ही पता करें बच्चों की लर्निंग डिसबिलिटी के बारे में -बाॅम्बे हाईकोर्ट
लाइव लाॅ, न्यूज नेटवर्क,15(मई) 2017। बाॅम्बे हाईकोर्ट ने सभी स्कूल,बोर्ड व शिक्षण संस्थानों को निर्देश दिया है कि वह शुरूआती स्तर पर ही बच्चों में स्पेशिफिक लर्निंग डिसबिलटी के बारे में पता करने के लिए कदम उठाए,विशेषतौर पर जब बच्चे प्राइमरी स्कूल में हो या जब उन्होंने नौ साल की उम्र पूरी कर ली हो।
न्यायमूर्ति वीएम कनाडे व न्यायमूर्ति एके मैनन की खंडपीठ ने कहा कि शिक्षण संस्थान इस काम की जिम्मेदारी शिक्षकों व अन्य चुने हुए लोगों को सौंप सकते है,जो इस तरह की लर्निंग डिसबिलिटीज के बारे में पता लगा सके।
इसके अलावा कोर्ट ने यह भी कहा है कि सभी छात्रों का राईट आॅफ पर्सन विद डिसबिलिटीज एक्ट 2016 के तहत निर्धारित टेस्ट कराया जाए ताकि उनमें स्पेशिफिक लर्निंग डिसबिलिटीज के बारे में पता लगाया जा सके।
कोर्ट ने यह निर्देश एक स्वत संज्ञान जनहित याचिका व एक रिट पैटिशन पर सुनवाई करते हुए दिए है। इसके साथ ही कोर्ट ने इस मामले में कोर्ट मित्र मनोचिकित्सक डाक्टर हरीश सेठी को भी सुना था।
डाक्टर सेठी ने खंडपीठ के समक्ष बताया था कि इस एक्ट की धारा 16 के तहत सभी शिक्षण संस्थानों के लिए यह जरूरी है कि वह शुरूआती स्तर पर ही बच्चों में स्पेशिफिक लर्निंग डिसबिलिटीज के बारे में पता लगाए और इस पर काबू पाने के लिए अध्यापक संबंधी व अन्य जरूरी कदम उठाए। इसके बाद ही ऐसे बच्चों की सहभागिता व उसकी प्रोग्रेस की निगरानी करे।
एक्ट की धारा 16 के तहत शैक्षणिक संस्थानों को कुछ टाॅस्क करने जरूरी होते है और धारा 17 के तहत उचित सरकार व स्थानीय अधिकारियों की यह ड्यूटी बनती है कि वह एक्ट की धारा 15 को लागू करवाने के लिए उचित कदम उठाए।
डाक्टर सेठी ने यह भी दलील दी थी कि सीबीएसई व अन्य बोर्ड इस तरह की लर्निंग डिसबिलिटीज के बारे में पता कराने के लिए टाॅस्क करते है,परंतु ऐसा तब किया जाता है,जब बच्चा नौंवी कक्षा में पहुंच जाता है। परंतु उस समय तक बच्चे की इस तरह की लर्निंग डिसबिलिटी पता न होने के कारण उसको ट्रामा व मनोचिकित्सक परेशानी झेलनी पड़ जाती है। इस तरह की लर्निंग डिसबिलिटी वाले बच्चों के अच्छे नंबर नहीं आते है और इस कारण उनको माता-पिता व शिक्षक,दोनों से सजा मिलती है। जो उनके दिमाग में एक स्थाई ट्रामा पैदा कर देता है।
खंडपीठ ने कहा कि सभी छात्रों में लर्निंग डिसबिलिटीज है या नहीं,इसके बारे में पता करने के लिए उनका मेडिकल टेस्ट तो किया ही जाना चाहिए,इसके अलावा स्कूल चाहे तो एक तरीका और भी अपना सकते है,जिसमें इन छात्रों की पिछले कुछ सालों में पढ़ाई में किए गए प्रदर्शन का भी निरीक्षण किया जा सकता है ताकि यह पता चल जाए कि कौन छात्र पढ़ाई में पहले अच्छा रहा है और पिछले कुछ सालों में उसके नंबर कम आए है।
खंडपीठ ने कहा कि यह तरीका स्कूलों पर कम भार ड़ालेगा और इस कैटेगरी के छात्रों की पहचान करने में भी उनको आसानी होगी। साथ ही यह भी स्पष्ट किया है कि इस तरह की पहचान के काम को पूरी तरह गोपनीय रखा जाएगा,अगर किसी बच्चे में कोई लर्निंग डिसबिलिटी है या उसके स्कूल परिणाम के बारे में कोई भी सूचना पब्लिक के समक्ष पेश नहीं की जाएगी।
स्वास्थ्य सेवाओं के निदेशालय को भी निर्देश दिया गया है कि वह बताए कि महाराष्ट्र में कितने ट्रामा सेंटर है और इनमें से कितने कार्यरत है।
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