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सुप्रीम कोर्ट ने यमुना क्लिनिंग मामला एनजीटी को भेजा

LiveLaw News Network
31 May 2017 2:30 PM GMT
सुप्रीम कोर्ट ने यमुना क्लिनिंग मामला एनजीटी को भेजा
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सुप्रीम कोर्ट ने यमुना सफाई मामला एनजीटी के हवाले कर दिया है। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट में 23 साल ये मामला चला था।

लगभग दो दशक सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने उस जनहित याचिका को सुनवाई के लिए नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल(एनजीटी) के पास ट्रांसफर दिया है,जिसमें यमुना को प्रदूषण रहित करने व पूरी तरह साफ करने की मांग की गई थी।

मुख्य न्यायाधीश जे एस खेहर व न्यायमूर्ति डी वाई चंद्राचूड़ की बेंच ने कहा कि एक ही मुद्दे पर दो समानांतर सुनवाई नहीं की जा सकती है।

इससे पूर्व सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने उस जनहित याचिका को भी सुनवाई के लिए एनजीटी के पास भेज दिया था जो गंगा सफाई से संबंधित था।

र्यावरणविद् एम सी मेहता ने इस मामले में दायर की थी और गंगा को साफ करने करने की मांग की थी। इस याचिका पर प्रतिदिन सुनवाई करने का आदेश दिया गया था।

यह ट्रांसफर काफी अचंभित करने वाला था क्योंकि बीस फरवरी को कोर्ट ने इस मामले को सुनने में अपनी इच्छा जाहिर की थी। सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली जल बोर्ड से कहा था कि वह एक हलफनामा दायर करके बताए दिल्ली में यमुना में बिना ट्रीटमेंट के छोड़े जा रहे पानी पर रोक लगाने के लिए कितने सीवरेज प्लांट काम कर रहे है और कितनों का निर्माण कार्य चल रहा है।

शीर्ष कोर्ट ने दिल्ली जल बोर्ड के चीफ इंजीनियर(जो दिल्ली में सीवरेज ट्रीटमेंट के मामले देखते है) से भी कहा था कि वह विभाग के हेड बीके गुप्ता से अप्रूवल लेने के बाद इंटरसेप्टर सीवेज सिस्टम के मामले में अपनी स्टे्टस रिपोर्ट दायर करें। खंडपीठ ने दिल्ली जल बोर्ड से पूरे प्रोजेक्ट का विवरण भी मांगा था। साथ ही पूछा था कि यह बताए कि अब तक यमुना में अनट्रीटिड वेस्टेज न ड़ालने के लिए क्या प्रोग्रेस की गई है।

वर्ष 1994 में सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में एक समाचार पत्र में छपी खबर ’एंड क्वीट फलो मैली यमुना’ पर स्वत संज्ञान लिया था और इसे साफ करने के लिए कार्रवाई शुरू की थी। वर्ष 2012 में इस बात पर भी चिंता जताई थी कि दो दशक में जीरो रिजेल्ट आए है। साथ ही कहा था कि एक हजार करोड़ रूपए खर्च करने के बाद भी नदी पहले से ज्यादा गंदी हो गई हैै।

उस समय के केंद्रीय अर्बन डेवलपमेंट सेक्रेटरी और दिल्ली,हरियाणा व उत्तर प्रदेश के चीफ सेक्रेटरीज से कहा था कि वह व्यक्तिगत तौर पर हलफनामा दायर करके बताए कि यमुना एक्शन प्लान के फेज-1 व 2 पर कितना पैसा खर्च किया गया है। साथ ही राज्यों से कहा था कि कुछ नाम बताए ताकि हाई-लेवल कमेटी का गठन किया जा सके। यह कमेटी प्रदूषण रोकने व नदी के पानी की गुणवत्ता को बढ़ाने के लिए एक विस्तृत प्लान बना सके।

खंडपीठ ने कहा था कि दुर्भाग्यवश, काफी बड़ी मात्रा में पैसा खर्च कर दिया गया,परंतु पानी की गुणवत्ता को सुधारने में कोई सफलता नहीं मिली। इसलिए सभी सरकारों को संयुक्त प्रयास करने चाहिए ताकि उघोगों व घरेलू वेस्टेज को सीधा नदी मेें न बहाया जा सके। यह बहुत की दुखदायी है कि सब एक दूसरे पर अपनी जिम्मेदारी टाल रहे है।

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