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बोलने की आजादी,राष्ट्रीयता व राजद्रोहः जस्टिस एपी शाह (एम.एन.राॅय मैमोरियल लेक्चर)

LiveLaw News Network
31 May 2017 2:11 PM GMT
बोलने की आजादी,राष्ट्रीयता व राजद्रोहः जस्टिस एपी शाह (एम.एन.राॅय मैमोरियल लेक्चर)
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भूमिका

"संकीर्ण,स्वार्थी,छोटी सोची वाली राष्ट्रीयता विश्व के लिए बहुत बड़ी आफत व दुख का कारण बनती है। इसी राष्ट्रीयता की सनक की एक विक्षिप्त या उग्र व अतिशयोक्तिपूर्ण आकृति आज के समय में तेजी से फैल रहा है"।

यह बयान एम.एन राॅय ने वर्ष 1942 में दिया था,जो आज के समय से मिल रहा है,विशेषतौर पर उस समय से, जिसमें हम जी रहे है।

गुड ईवनिंग जस्टिस चलेमेश्वर,मिस्टर पंचोली व अन्य आदरणीय श्रोताओं। यह मेरे लिए बहुत ही सम्मान की बात है कि आज मैं यहा एम.एन राॅय मैमोरियल लेक्चर देने के लिए आया हूं।

एम.एन राॅय एक बुद्धिजीवी व विचारक थे और एक एक्टिविस्ट फिलाॅशपर भी,जो मानवतावादी आंदोलन में गहराई से शामिल थे। वह भारतीय राष्ट्रीयता के मूल सिद्धांतों व राष्ट्रीयता की आईडियोलाॅजी के आलोचक भी थे, विशेषतौर पर फासिस्टवाद व नाजीवाद के बढ़ने और दूसरा विश्वयुद्ध छिड़ने के कारण।

पहले विश्वयुद्ध के शुरूआती दौर में राॅय एक साहसी व जोशिले राष्ट्रवादी के तौर पर भारत से चले गए थे,परंतु गहन चिंतन व नए राजनीतिक अनुभव के उन्होंने अपने विचार बदल दिए। वर्ष 1919 में उन्होेने मैक्सिको में कम्यूनिस्ट पार्टी का गठन किया,जो रूस से बाहर बनी पहली कम्यूनिस्ट पार्टी थी।

सैकेंड वर्ल्ड कांग्रेस आॅफ कम्युनिस्ट इंटरनेशनल के दौरान राॅय ने नेशनल एंड कोलोनिया क्वेश्चन पर लेनिन द्वारा तैयार फेमस थीसिस में भी सहायता की। हालांकि वह कालोनियों में राष्ट्रवादी आंदोलन चलाने के लिए किए जा रहे नेतृत्व को लेकर लेनिन से सहमत नहीं थे। बाद में स्टालिन के साथ हुई असहमति के चलते दिसम्बर 1930 में राॅय भारत लौट आए।

हालांकि उनका लौटना छोटा ही रहा। जुलाई 1931 में राॅय को बोल्शईविक षड्यंत्र केस में देशद्रोह के आरोप में गिरफतार कर लिया गया और ओपन सुनवाई की बजाय कानपुर जेल में उसका केस चलाया गया। उन्हें बारह साल कैद की सजा दी गई है, परंतु 36 साल की उम्र में छह साल की सजा के बाद ही रिहा कर दिया गया। जिसके बाद राॅय ने कांग्रेस ज्वाइन कर ली। हालांकि जल्द ही उनका मोह इनसे भी टूट गया क्योंकि पार्टी ने दूसरे विश्व युद्ध के दौरान फासिस्टवाद का विरोध कर रहे ब्रिटिश का सहयोग देने में अनिच्छा दिखाई,जबकि राॅय फासिस्टवाद को बहुत बड़ा दैत्य मानते थे।

भारत के आजाद होने के बाद राॅय ’मूल मानवतावाद’ के मुख्य प्रस्तावक बने और उन्होंने ’नए मानवतावाद’ की व्याख्या की। उन्होेंने लगातार राष्ट्रीयता व उसके आर्थिक व राजनीतिक पहलुओं पर लिखा। वर्ष 1944 में राॅय ने ’स्वतंत्र भारत के संविधान’ का ड्राफट तैयार किया,जिसमें उन्होंने ’मौलिक अधिकारों की घोषणा’ नामक चैप्टर को भी शामिल किया।

आज की परिस्थिति

राॅय के विचारों के कई विषयों की रेंज को कवर किया,जिसमें भाषण व असहमति भी शामिल थे। असल में ही कारण है कि इस मैमोरियल लेक्चर के मौके पर मैंने राष्ट्रीयता,बोलने की आजादी व देशद्रोह पर अपने विचार रखने का मन बनाया।

आज हम ऐसे समाज में जी रहे है,जहां पर फिल्म थियेटर में राष्ट्रगान के समय खड़े होने के लिए दबाव ड़ाला जा रहा है। हमें बताया जा रहा है कि क्या खाना है और क्या नहीं। हम क्या देख सकते है और क्या नहीं,हम क्या बोल सकते है और क्या नहीं। यूनिवर्सिटी के अंदर हो रही असहमति को दबाया जा रहा है। नारेबाजी व झंडा फहराना राष्ट्रीयता का टेस्ट बन रहा है। एक 21 वर्षीय यूनिवर्सिटी की छात्रा को आॅन लाइन इसलिए गाली-गलौच व धमकियों का सामना करना पड़ रहा है क्योंकि उसने अपने विचार प्रकट करने की हिम्मत की थी।किसी भी समाज में किसी भी समय ऐसा हो सकता है कि लोग अपने अलग-अलग विचार प्रकट करें। इस तरह के विचार एक स्वस्थ्य लोकतंत्र के लिए जरूरी भी है।

इसी तरह की बातें बाॅम्बे हाईकोर्ट ने अपने एक फैसले में कही है। एफ.ए पिक्चर इंटरनेशनल बनाम सीबीएफसी के मामले में कोर्ट ने कहा था कि इतिहास हमें बताता है कि जीवन के हर पहलू में असहमति ही किसी भी समाज के विकास में सहायक होती है। समाज के बिना सवालों के अनुमानों पर सवाल खड़े करने वाले ही समाज के नियमों में बदलाव करवाते है। इसी उत्साह का आदर करने के लिए लोकतंत्र का गठन हुआ है। जब भी कोई स्वतंत्र विचारों को दबाने की कोशिश करता है तो उसे त्योरी चढ़ाकर ही देखा जाता है।

दुर्भाग्यवश,आज हमारे सीखने के संस्थान भी खतरे में है और किसी भी स्वतंत्र विचार को खत्म करने की कोशिश की जा रही है।

मैं इस देश को प्यार करता हूं,परंतु आज के समय में यह दुखदायी स्थिति बन गई है कि अगर कोई व्यक्ति ऐसे विचार प्रकट करता है तो सरकार से अलग है तो उसे देशद्रोही करार दे दिया जाता है। इस देशद्रोही मार्कर का प्रयोग अब उन लोगों की आवाज दबाने के लिए किया जा रहा है,जिनके विचार अलग है या जो आलोचक है। सबसे चिंताजनक बात ये है कि उन पर देशद्रोह का केस तक दर्ज करा दिया जाता है।

इन्हीं सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए मैंने आज का विषय चुना है ताकि इस पर आगे बातचीत व वाद-विवाद किया जा सके। मुझे लगता है कि यह काफी महत्वपूर्ण है कि राष्ट्रीयता पर विचार प्रकट करते हुए बात की जाए।

क्या है राष्ट्रीयता?

इस मौके पर मैं एक सेलिब्रेटिड नाइजीरियन आॅथर चिमामानंदा आदिचि की टर्म ’ डेंजर आॅफ ए सिंगल स्टोरी’ का जिक्र करना चाहूंगा। जिसमें बताया गया है कि किसी विचार को एक ही व्यक्ति के नजरिये से समझने और अन्य मौजूद विचारों की अनदेखी करने का खतरा। मृदुला मुखर्जी ने भी राष्ट्रीयता शब्द के सूक्ष्म-भेद या बारीकी की तरफ इशारा किया था कि किस तरह यह प्रगतिशील राष्ट्रीयता के विचार को घेर लेता है।

हिटलर की राष्ट्रीयता हर तरीके से गांधी व नेहरू की राष्ट्रीयता से अलग थी। यूरोप की राष्ट्रीयता की अवधारणा वेस्टफालिया की ट्रीटी के दिन से विकसित हुई थी और इम्पैरिएलिस्ट एक्सपेंशन के समय यहूदी या विरोध करने वालों के साथ दुश्मनी पर ही आधारित थी। इसके विपरीत भारत की राष्ट्रीयता की अवधारणा ब्रिटिश शासन के विरोध में विकसित हुई,जिसके तहत अंग्रेजों के खिलाफ लोगों को एकत्रित करना था। यह ऐसी राष्ट्रीयता थी,जिसमें प्राथमिक तौर किसी भारतीय की पहचान उसके धर्म,जाति या भाषा से नहीं की जाती थी बल्कि आजादी की लड़ाई में उसकी एकता से होती थी।

उस समय एम.एन राॅय ने राष्ट्रीयता को कैसे समझा? राॅय के विचार से राष्ट्रीयता एक इलाके में रहने वाले ग्रुप के लोगों की इच्छाओं व महत्वकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व है,जो अपनी जाति के आधार पर एकत्रित हो जाते है। ऐसे में राष्ट्रीयता एक देश की इच्छाओं को बाकी देश की इच्छाओं पर थोपती या दबाव ड़ालती है। 19वें दशक में एक समय था,जब देश एक दूसरे से दूर थे, उस समय राष्ट्रीयता की जरूरत थी ताकि लोग एक साथ आए और मानवतावाद का विकास हो। हालांकि उनका मानना था कि बाद के समय में यह भावना स्वार्थी व छोटे विचारों वाली बन गई है। इस समय विश्व को अंतर-राष्ट्रीयता व अंतर्राष्ट्रीय सहयोग की तरफ बढ़ना चाहिए था। हर देश की महत्वकांक्षा एक दूसरे से अलग होती गई,जिस कारण विरोधाभास बढ़ता रहा,जिसने राष्ट्रीयता की एक अलग की आकृति को तैयार कर दिया। इसी ने फासिज्म व नाजिज्म को जन्म दिया और दूसरा विश्व युद्ध हुआ। उस समय राॅय की नजरों में राष्ट्रीयता पुनरूत्थानवाद के पर्यायवाची हो गई।

भारतीय राष्ट्रगान के कंपोजर रबींद्रनाथ टैगोर के विचार भी राष्ट्रीयता को लेकर काफी उग्र थे। उनका मानना था कि किसी देश के प्रति ज्यादा प्यार उस देश की श्रेष्ठता व कल्चरल हैरिटेज की प्रशंसा को दर्शाता है और बाद में इसी छोटी सोच के देशहित को साबित करने में प्रयोग किया जाता है।

दूसरी तरफ धार्मिक पुनरूत्थानवादियों ने प्राचीन भारत की प्रशंसा पर फोकस किया,जिन्होंने भारतीय सभ्यता को जानने के लिए आर्यन काल को देखा। जिसने सांस्कृतिक राष्ट्रीयता के ऐसे आकार को बनाया,जहां पर वेस्टर्न फैस्टिवल ’वेलेनटाइन डे’ को मनाने वालों पर हमले किए जाते है।

जहां तक धार्मिक राष्ट्रीयता की बात है तो यह टवोनेशन थ्योरी देता है,जिसके अनुसार हिंदू रूल के तहत एक नेशन है,अखंड भारत में एक हिंदू राष्ट्र(यूनाईटेड इंडिया)।

यह इस धारणा पर आधारित है कि सिर्फ एक हिंदू ही ब्रिटिश इंडिया के क्षेत्र पर अपने पूर्वजों की जमीन व अपने धर्म की जमीन ’पुन्यभूमि’ के तौर पर दावा कर सकता है। वहीं विनायक डी. सर्वाकार के अनुसार ’’हिंदू राष्ट्र(स्टेट),हिंदू जाति (रेश) व हिंदू संस्कृति(कल्चर)’’। मुस्लिम व क्रिश्चियन को उन फाॅरनर की तरह देखा जाता है,जो भारतीय टैरिटरी के नहीं है और जिनका धर्म अलग पवित्र जमीन पर उत्पन्न हुआ है।

इस बात पर मैं अपनी व्यक्तिगत बैकग्राउंड के बारे में भी बताना चाहता हूं। मेरे नाना वर्ष 1940 में हिंदू महासभा के अध्यक्ष थे और मैंने अपने स्कूल के दिनों में पहला लिटरेचर सरवाकर द्वारा लिखा हुआ पढ़ा था। वर्ष 1938 में जब हिटलर अपने राइज पर था,सरवाकर ने यहूदी और उनकी मातृभूमि से उनको हटाने के संबंध हिटलर की नीतियों को जस्टिफाईड किया। उन्होंने कहा कि एक राष्ट्र का निर्माण वहां पर बहुमत में रह रहे लोगों से बनता है। यहूदी जर्मनी में क्या कर रहे है? वह अल्पसंख्यक थे,इसलिए उनको जर्मनी से निकाल दिया गया। मुझे नहीं पता कि दूसरे विश्व युद्ध के बाद उनके विचार बदले या नहीं। सरवाकर का यह भी मानना है कि अल्पसंख्यक ग्रुप को अगर भारत में रहना है तो उनको अपनी अलग पहचान व उपस्थिति को छोड़ना होगा।

राॅय बिना किसी अचंभे के इन विचारों के आलोचक थे। हिंदू महासभा के अध्यक्ष द्वारा की गई घोषणा-बहुसंख्यक ही राष्ट्र है। राॅय ने कहा कि सुनने में यह औपचारिक लोकतंत्र जैसा लग रहा है,परंतु असलियत अलग है। भारतीय राजनीति के वातावरण में इसका मतलब ऐसा लग रहा है,जैसे देश की एक तिहाई आबादी वाले मुसलमानों को कोई आजादी नहीं होगी। इसलिए वह बादशाही शासन काल को खत्म करने व उसकी जगह राष्ट्रवादी शासन लागू करने के खिलाफ थे। क्योंकि इस शासन काल में अधिक्तर भारतीयों को असली आजादी नहीं मिलने वाली थी। यह याद रखना महत्वपूर्ण है कि टैगोर व राॅय,दोनों ने ही पहले व दूसरे विश्व यु़द्ध के बारे में लिखा था। वह दोनों इस बात के गवाह थे कि किसी राष्ट्र की महत्वकांक्षा ने कैसे युद्ध करवा दिया और लिबर्टी,एकसमानता और फ्रेंच आंदोलन के भाईचारे को खत्म कर दिया। आज के स्वतंत्र भारत में इस तरह के विचारों को धर्मद्रोही व शायद देशद्रोही माना जाता है।

भारत में विभ्न्नि तरह के लोग रहते है और शायद राष्ट्रवाद के मामले में उनके अलग-अलग विचार है। इसलिए हमें उनका आदर करना चाहिए,न कि ऐसे लोगों को चुप करा दिया जाए जो राष्ट्रवाद के मामले में अलग विचार रखते है। दिन के अंत में यह महत्वपूर्ण सवाल है कि राष्ट्र की व्याख्या करने वाली विशेषताएं क्या है-क्या यह क्षेत्रीय सीमाएं है या फिर लोगों का समूह। हमारा संविधान एक घोषणा के साथ शुरू होता है- हम भारत के लोग है। इस संदर्भ में क्या देशद्रोही सरकार के खिलाफ बोलने वाले के समान है या फिर वो देशद्रोही है जो लोगों के हित के खिलाफ है,विशेषतौर पर अल्पसख्ंयकों व डिप्रेस्ट क्लास? क्या एक विश्वविद्यालय और उसके पूरे छात्रसंघ को देशद्रोही कहा जा सकता है?

इस समय हमारे देश की स्थिति दुखदायी है,विशेषतौर पर तब जब हम इस बात को सोचते है कि एक लंबी लड़ाई के बाद हमें यह देश व संविधान मिला है। हमारा संविधान मूलरूप से लोकतंत्र,बोलने की आजादी,सिविल लिबर्टीज व धर्म निरपेक्षता के आइडिया पर बना है।

पाकिस्तान की तरह हमारा देश का निर्माण किसी धर्म पर आधारित नहीं है। विचारों की आजादी का हमारा यह अधिकार हमें सरकार से मिला कोई गिफट नहीं बल्कि यह ऐसा अधिकार है,जिसकी गांरटी हमारे संविधान में हमें दी गई है। जिसको पाने के लिए कई दशक तक संघर्ष किया गया है और बहुत से लोगों ने अपने प्राणों की आहुति दी है।

1.बोलने की आजादी

बोलने की आजादी व संविधान

वर्ष 1922 में यंग इंडिया में लिखते समय गांधी ने कहा था कि हमे अपने उद्देश्यों को पाने के लिए आगे बढ़ने से पहले फ्री स्पीच व फ्री एसोसिएशन के अधिकार को अच्छा बनाना होगा। हमें अपने जीवन में इन अधिकारों की रक्षा करनी होगी। गांधी का मानना था कि लिबर्टी आॅफ स्पीच से किसी तरह की छेड़छाड़ नहीं होनी चाहिए,चाहे इस स्पीच से किसी परेशानी हुई हो और फ्रीडम आॅफ एसोसिएशन का भी पूरी तरह आदर किया जाना चाहिए,भले ही लोग किसी आंदोलनकारी प्रोजेक्ट पर बातचीत करने के लिए एकत्रित हुए हो। इस तरह के विचार रखने वाले गांधी अकेले नहीं थे। हमारे कई राष्ट्रीय नेता-राजा राम मोहन राॅय से लेकर बाल गंगाधर तिलक ने भी उन साधारण भारतीयों को सिविल लिबर्टी दी थी,जो राष्ट्रीय आंदोलन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा थे। इन सब विचारों को संविधान का निर्माण करने वालों ने संविधान के ड्राफ्ट में शामिल किया। उन्होंने समझ लिया था कि जब पूजा करने की आजादी लोकतंत्र का हिस्सा है और मूलभूत अधिकार है तो आधुनिक लोकतंत्र में विचारों की आजादी होनी चाहिए। हमारे संविधान को पाॅलिजिव,आगे की तरफ देखने वाले व सभी भारतीयों को एक साथ जोड़ने वाले के तौर पर तैयार किया गया था। जिसमें धर्मनिरपेक्षता,आजादी,न्याय,एक समानता,अखंडता आदि का पूरा ध्यान रखा गया है। यह अचीवमेंट और ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाती है,अगर हम फली नरीमन द्वारा पिछले दिनों किए गए एक इशारे पर ध्यान दे,जिसमें बताया गया है कि संवैधानिक असेंबली में कुल 299 सदस्य थे,जिसमें से 85 प्रतिशत यानि 255 सदस्य हिंदू थे। इसके बावजूद भी संविधान बनाने वालों ने अल्पसंख्यकों व दलित और शोषित लोगों के अधिकारों की रक्षा करने के लिए कदम उठाए। संविधान में दिए गए अधिकारों की रक्षा करना अब सुप्रीम कोर्ट की जिम्मेदारी,विशेषतौर पर बोलने व विचारों की आजादी के अधिकार की।

बोलने की आजादी व कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट बार-बार बोलने की आजादी के मूल्य पर जोर दे चुकी है,साथ ही कहा है कि बोलने व विचारों को प्रकट करने की आजादी किसी भी लोकतांत्रिक संगठन का आधार है। लोगों को जितनी राजनीति वाद-विवाद में बोलने की आजादी होगी,उतना ही सरकार की कार्य-व्यवस्था सुधरेगी। कोर्ट ने बोलने की आजादी पर जोर दिया है ताकि सत्य को बनाया रखा जा सके और वाॅच डाग का काम कर सके।

अब्रामस बनाम यूनाईटेड स्टेट नामक मामले में वर्ष 1999 में जस्टिस होलमस द्वारा की गई एक टिप्पणी का जिक्र करते हुए भी बोलने की आजादी को मान्यता दी है। बोलने की आजादी का मूल्य स्वभाविक व दस्तावेज,दोनों में शामिल है और लोकतंत्र आदर्श से संबंधित हैै।

उदाहरण के तौर पर ’मी नत्थूराम गोड़से बालटाॅय नाटक जिसमें महात्मा गांधी का आलोचना की गई थी,पर लगाई सेंशरसीप की अनुमति बाॅम्बे हाईकोर्ट ने नहीं दी थी।

आनंद चिंतामणी दिघे बनाम स्टेट आॅफ महाराष्ट्र नामक केस में कोर्ट ने अलग-अलग विचारों के प्रति आदर व सहनशीलता पर जोर दिया था क्योंकि यह एक लोकतांत्रित समाज व सरकार के लिए जरूरी हैै।

वहीं डायरेक्टर जनरल,दूरदर्शन बनाम आनंद पटवारधान नामक केस में वर्ष 2006 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि राज्य सरकार किसी भी ओपन वाद-विवाद पर रोक नहीं लगा सकती है,भले ही वह राज्य की नीतियों की आलोचना संबंधी ही क्यों न हो। मतभेद का महत्व सबसे अच्छे तरीके से सुप्रीम कोर्ट द्वारा एस.रंगाराजन बनाम पी. जगजीवन राम मामले में दिए गए विचार से समझा जा सकता है। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि लोकतंत्र में यह जरूरी नहीं है कि हर इंसान एक जैसा ही गाना गाए।

बोलने की आजादी हालांकि हमलों के साये में है। श्रेया सिंघल मामले में आईटी एक्ट की धारा 66ए को खत्म करने का खुशी जल्द ही उस समय खत्म हो गई,जब सुप्रीम कोर्ट ने सुब्रह्मण्यम स्वामी बनाम केंद्र सरकार मामले में आपराधिक मानहानि की संवैधानिकता को ठीक ठहरा दिया। साथ ही आदेश दिया कि देश के सभी सिनेमाघरों को निर्देश दिया कि फिल्म शुरू होने से पहने राष्ट्रगान बजाए और सिनेमाघर में मौजूद दर्शकों को इस दौरान खड़ा होना होगा। राष्ट्रगान संबंधी इस आदेश के संबंध में विस्तार से अपनी स्पीच के दौरान बाद में बात करना चाहूंगा।

पिछले महीने ही बुलंदशहर में हुए सामूहिक दुष्कर्म के मामले में आजम खान द्वारा की गई टिप्पणी के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सवाल किया था कि क्या अनुच्छेद 19 (1) (ए) के तहत मिली बोलने की आजादी को अनुच्छेद 19 (2) के तहत भाषा से नियंत्रित किया जाना चाहिए या फिर संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले राईट टू लाइफ एंड पर्सनल लिबर्टी की तरह यह भी विस्तृत तौर पर प्रभावित होगा। इस सवाल का जवाब अनुच्छेद 19 (1) (ए) की व्यापकता पर रोक लगाएगा और हमें मिले संवैधानिक अधिकारों के प्रभाव को कम करेगा। हालांकि बाॅम्बे हाईकोर्ट,जिसके फैसले का मैं पहले जिक्र कर चुका हूं,कई बार बोलने की आजादी के अधिकार की रक्षा करने में नाकाम रही है। कुछ समय पहले कोर्ट ने एक तीन सदस्यीय कमेटी का गठन किया था,जिसमें दो वकील थे। इस कमेटी को जाॅली एलएलबी-2 के कुछ सीन के संबंध में अपनी रिपोर्ट देनी थी। चूंकि प्रथम दृष्टया कोर्ट का विचार था कि फिल्म के कुछ सीन व डाॅयलाग ज्यूडिशियरी व लीगल प्रोफेशन की अवमानना करने वाले थे। जबकि इस फिल्म को सीबीएफसी,सेंशर बोर्ड रिलीज करने के लिए जरूरी सर्टिफिकेट दे चुका था। इतना ही नहीं हाईकोर्ट ने उस याचिका पर भी सुनवाई की जो फिल्म के दो टेªलर व कुछ फोटोग्राफ पर आधारित थी,बाद में इस याचिका को जनहित याचिका में तब्दील कर दिया गया था।

जाॅली एलएलबी-1 जब रिलीज हुई उस समय जस्टिस लोढ़ा ने इसी तरह की याचिका को खारिज कर दिया था और कहा था कि अगर याचिकाकर्ता फिल्म को नहीं देखना चाहते है तो न देखे,कोई उन पर फिल्म को देखने का दबाव नहीं बना रहा है। वहीं बाॅम्बे हाईकोर्ट ने इस मामले में एक कमेटी का गठन कर दिया और जबकि फिल्म की रिलीज की तारीख नजदीक थी। जिस कारण फिल्म के निर्माता व निर्देशक को फिल्म में कुछ बदलाव करने पड़े और कुछ सीन हटाने पड़े। हालांकि बोलने की आजादी को संस्थागत तरीके से सुरक्षित किया गया है-जो कोर्ट ही नहीं,बल्कि वैधानिक संस्थान व मीडिया द्वारा भी सुरक्षित है।

दुर्भाग्यवश हमने कुछ रिपोर्ट पढ़ी है,जिनमें सीबीएफसी,हमारे सेंशर बार्ड ने ’लिपिस्टक अंडर माई बुर्का’जैसी फिल्मों को सर्टिफाई करने से इंकार कर दिया था क्योंकि यह महिलाओं पर आधारित फिल्म थी,जिसमें सैक्सुअल सीन,गाली-गलौच,ओडियो प्रोनोग्राफी आदि थी। वहीं एक आने वाली फिल्म ’समीर’ से मन की बात लाइन को हटा दिया गया क्योंकि यह प्रधानमंत्री के रेडियो पर आने वाले शो का नाम है। वहीं फिल्लौअरी नामक फिल्म के एक सीन में हनुमान चालीसा को मयूट करने की मांग हुई थी क्योंकि यह भूत को नहीं भगा पाई थी। वहीं आप ’उड़ता पंजाब’ नामक एक अडल्ट सर्टिफाईड फिल्म को कैसे भूल सकते है,जिसमें सेंशर बोर्ड ने 94 सीन हटाने की मांग की थी। जिसमें पंजाब नाम को भी हटाने के लिए कहा गया था। वहीं कुछ गाली,इलेक्शन,एमपी व पार्ट वर्कर आदि शब्दों को भी हटाने की बात कही गई थी। अगर यह विचारों को प्रकट करने व बोलने की आजादी पर हमला नहीं है तो मुझे नहीं पता कि यह सब फिर क्या था?

प्रेस को मिली आजादी भी अनुच्छेद 19 (1) (ए) के मिली अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का एक हिस्सा है। ऐसा इसलिए किया गया है क्योंकि विभिन्न विचारों को दिखाने या प्रकाशित व लोकतंत्र को प्रमोट करने के लिए फ्री प्रेस जरूरी है।

सबसे महत्वपूर्ण यह है कि आज के समय में जनसंचार व डिजिटल मीडिया बहुत प्रबल हो गए है। इस समय आशा की जा रही है कि मीडिया विपक्ष व तथ्यों को चेक करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। पब्लिक के ओपिनियन को मीडिया से ज्यादा कोई संस्थान प्रभावित नहीं कर रहा है। हालांकि पिछले कुछ समय से मीडिया का एक हिस्सा भेदभाव या एक तरफ रिपोर्टिंग कर रहा है,जो अभिव्यक्ति की आजादी पर रोक लगा रहा है। एक न्यूज चैनल ने फर्जी व छेड़छाड़ की हुई फुटेज को दिखाया,वहीं अन्य ने राष्ट्र विरोधी व देशप्रेम पर हुए वाद-विवाद को खुले तौर पर भड़काया। यह दुर्भाग्य है कि मीडिया,जिसमें एमरजेंसी के दौरान अभिव्यक्ति की आजादी को पाने के लिए आलोचक का काम किया था,अब वहीं ऐसा संस्थान बन गया है,जो उसी अभिव्यक्ति की आजादी से समझौता करके उसे चुनौती दे रहा है।

हमारे पास सोशल मीडिया भी है,जहां पर आॅन लाइन उन लोगों पर टिप्पणी व दुष्कर्म करने या हत्या करने की धमकी दे दी जाती है,जिन्होंने कोई ऐसा बयान दे दिया हो,जो देश-विरोधी लगता है। मैं जानना चाहता हूं कि भारतीय संस्कृति का कौन सा हिस्सा इस तरह की अनुमति देता है कि एक लड़की को सरेआम दुष्कर्म करने या हत्या करने की धमकी दे दी जाती है। ट्वीटर व अन्य सोशल मीडिया पर इस तरह की धमकी देने वाले यह लोग कौन है,जो अपनी सहनशीलता व सोच के अनुसार इस तरह की सरेआम धमकी दे देते है।

राष्ट्रीयता के अर्थ व अभिव्यक्ति की आजादी के महत्व के बारे में विस्तार से बात करने से पहले यह उचित होगा कि उन घटनाओं के बारे में बात की जाए,जो राष्ट्रवादी लोगों द्वारा उठाई गई है,जैसे क्या है देशद्रोह, राष्ट्रगान,यूनिवर्सिटी पर हमले व गायों के बूचड़खाने। इन सभी विषयों को एक ही थीम जोड़ रही है,वह है ’कल्चरल राष्ट्रीयता’। इसी कल्चरल राष्ट्रीयता को पूरे देश पर थोपा जा रहा है,जिसके लिए लोगों की इच्छाए,उनके मूल्य या क्षेत्रीय विभिन्नताओं को ध्यान में नहीं रखा जा रहा है।

राष्ट्रीयता व देशद्रोह

पिछले साल जेएनयू में हुई घटनाओं के कारण आज भारत में सबने देशद्रोह शब्द को सुन लिया गया। ऐतिहासिक तौर पर देशद्रोह शब्द के आस-पास हमारा संवाद अंग्रेजों द्वारा किए गए अन्याय पर केंद्रित था,जिन्होने तिलक व गांधी को कथित तौर पर कुछ देशद्रोही सामग्री प्रकाशित करने के मामले में दोषी करार देते हुए सजा दी थी। वर्ष 1908 में अपनी गिरफतारी से पहले तिलक ने एक पुलिस अधिकारी से कहा था कि सरकार को पूरे देश को ही जेल में तब्दील कर दिया है और यहां हम सभी कैदी है। जेल जाने का मतलब बस इतना है कि बड़ी सेल की बजाय किसी छोटी सेल में रख दिया जाना। वर्ष 1922 में गांधी ने उन पर लगे देशद्रोह के आरोपों को स्वीकार कर लिया और कहा कि उनको गर्व है कि उन्होंने ऐसी सरकार का विरोध किया है। यह कहानी बता रही है कि किस तरह अंग्रेजों ने कानून का दुरूपयोग किया था और किस गर्व से हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने उसका विरोध किया था। लगभग 90 साल बाद हम देख रहे है कि वही देशद्रोह का आरोप बीस के ग्रुप पर लगाया गया है जिनमें यूनिवर्सिटी के छात्र है। यह छात्र वहीं कर रहे थे,जो छात्र अक्सर कैंपस में करते है,जैसे की नारेबाजी,वाद-विवाद,असहमति और एक दूसरे को आज के राजनीतिक मुद्दों पर चुनौती देना।

देशद्रोह कानून को 17वीं शताब्दी में इंग्लैंड में बनाया गया था ताकि क्राउन व राज्यों को किसी भी विद्रोह से सुरक्षित किया जा सके। इसका मकसद यह था कि लोग सरकार के प्रति अच्छे विचार ही रखे क्योंकि खराब विचार रखने से सरकार की कार्यप्रणाली प्रभावित होगी। बाद में इस कानून को वर्ष 1870 में भारतीय दंड संहिता में शामिल कर लिया गया। देशद्रोह का पहला बड़ा मामला वर्ष 1870 में उस समय सामने आया,जब बाल गंगाधर तिलक पर द्रेशद्रोह का केस चलाया गया। यह केस उन पर शिवाजी कोरोनेशन सेरेमनी में उनके लेक्चर व एक गाने के लिए चलाया गया था। हालांकि इन भाषण व गाने में कहीं सरकार की अवमानना नहीं की गई थी,परंतु कोर्ट ने देशद्रोह की परिभाषा को बढ़ा दिया,जिसमें दुश्मनी,भड़काने वाला भाषण,अवमानना और सरकार के प्रति किसी भी तरह की दुर्भावना को भी इसमें शामिल कर दिया। यह व्याख्या लीगल टैक्सट का उस समय हिस्सा बन गई,जब धारा 124ए को संशोधित किया गया। वर्ष 1908 में फिर से तिलक पर देशद्रोह का आरोप लगाया गया क्योंकि उन्होंने अपनी मैग्जीन केसरी में एक आलोचक लेख छापा था। बाॅॅम्बे हाईकोर्ट ने उनको दोषी करार देते हुए छह साल कैद की सजा सुनाई थी। साथ ही कहा था कि किसी को भी इस बात की अनुमति नहीं दी जा सकती है कि वह सरकार के प्रति कोई अनैतिक भावना रखे।

आजादी से पहले देशद्रोह का एक अन्य बड़ा मामला गांधी के खिलाफ हुआ था। यंग इंडिया मैग्जीन में लिखे एक लेख के लिए उनके खिलाफ देशद्रोह का आरोप लगाया गया था। मामले की सुनवाई अपने आप में यादगार थी क्योंकि उन्होंने उन पर लगे आरोपों को स्वीकार कर लिया था और जस्टिस ब्रूमफिल्ड ने उनको सजा देने में अरूचि दिखाई क्योंकि वह इस बात पर विश्वास नहीं कर रहे थे कि गांधी पर पहली नजर में देशद्रोह का केस बनाया जाना चाहिए था।

मजेदार बात ये है कि संविधान असेंबली के वाद-विवाद के दौरान दो बार इस बात का प्रयास किया गया कि अभिव्यक्ति की आजादी पर प्रतिबंध लगाने के लिए देशद्रोह को एक आधार बनाया जाए। परंतु असेंबली के अन्य सदस्यों के विरोध और उनको डर था कि देशद्रोह को फिर राजनीतिक असहमति को कुचलने के लिए प्रयोग किया जा सकता है,इसको संविधान के अनुच्छेद 19(2) से हटा दिया गया। वर्ष 1950 में संविधान बनाने वालों के इन एक्शन को खुद सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया। यह बातें सुप्रीम कोर्ट ने बृज भूषण एंड रोमेश थापर के केस में कही थी। इस फैसले के कारण ही संविधान में पहले संशोधन को बढ़ावा मिला और अनुच्छेद 19(2) को संशोधित किया गया। जिसके तहत ’अंडरमाईनिंग दाॅ सिक्योरटी आॅफ दाॅ स्टेट’ की जगह ’ इन दाॅ इंटरेस्ट आॅफ पब्लिक आर्डर’ को शामिल किया गया। हालांकि संसद में बोलते समय नेहरू ने साफ किया कि जहां तक भारतीय दंड संहिता की धारा 124ए की बात है तो जहां तक मेरा मानना है कि यह धारा काफी आपत्तिजनक है और न तो इसका प्रैक्टिकल व न ही ऐतिहासिक तौर पर कोई स्थान होना चाहिए। अगर आप पसंद करे तो हम इस संबंध में निर्णय ले सकते है। जितना जल्दी हम इससे छुटकारा पा लेंगे,उतना अच्छा होगा।

अंत में वर्ष 1962 में सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक बेंच को भारतीय दंड संहिता की धारा 124ए की वैधानिकता पर केदारनाथ सिंह बनाम स्टेट आॅफ बिहार मामले में निर्णय करने का मौका मिला। अनुच्छेद 19(2) के तहत लगे प्रतिबंध ’पब्लिक आर्डर’ के संबंध में यह निर्णय किया जाना था। देशद्रोह की वैधानिकता पर पंजाब व पटना हाईकोर्ट द्वारा दिए गए फैसलों के कारण मामला उलझ गया था। सुप्रीम कोर्ट ने देशद्रोह की वैधानिकता को सही माना,परंतु इसको लागू करने के दायरे को सीमित कर दिया। अंतिम केस जिसका मैं जिक्र करना चाहूंगा वो वर्ष 1995 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा बलवंत सिंह बनाम स्टेट आॅफ पंजाब के मामले में दिया गया फैसला है। इस मामले में इंदिरा गांधी पर हुए हमले के कुछ घंटे बाद एक सिनेमा हाल के बाहर चिल्ला रहा था कि ’खालिस्तान जिंदाबाद,राज करेगा खालसा’। इस व्यक्ति पर देशद्रोह का केस बनाया था,परंतु कोर्ट ने इसे बरी कर दिया था।इस मामले में कोर्ट ने पब्लिक डिस्आर्डर करने वाले शब्दों की ’टेंडेंसी’ को न देखते कहा कि कई बार नारे लगाना,जिनसे किसी को न परेशानी हुई हो और न ही पब्लिक की तरफ से कोई जवाब मिला हो,वह देशद्रोह के दायरे में नहीं आते है। कोर्ट ने इस तथ्य को भी ध्यान में रखा कि आरोपी का लोगों को उकसाने का कोई इरादा नहीं था और न ही इस नारेबाजी से किसी तरह की कानून व्यवस्था की कोई समस्या पैदा हुई थी। इसलिए हर किसी को इस चश्मे से जेएनयू की घटना को जरूर देखना चाहिए। इस फैसले से साफ जाहिर है कि सरकार की कड़ी आलोचना करने व उपद्रव को भड़काने में काफी अंतर है और सिर्फ उपद्रव को भड़काने के मामला ही देशद्रोह से संबंधित है। जेएनयू में छात्रों द्वारा लगाए गए नारे भले ही देश विरोधी थे,घृणा से भरे थे या सरकार के खिलाफ थे,परंतु उनकी वजह से कोई हिंसा नहीं हुई,इसलिए वह देशद्रोह के दायरे में नहीं आते है। हमें उपेंद्रा बक्शी ने याद दिलाया था कि हमें संवैधानिक देश प्रेम व सांख्यिकीविद देश प्रेम में अंतर समझना चाहिए। इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए मैं दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश उस भाषा पर अपना गुस्सा जाहिर करना चाहता हूं,जो जमानत के आदेश में प्रयोग की गई थी और बिना मतलब के देश प्रेम व राष्ट्रीयता को आमंत्रण दे दिया गया। गांधी ने कहा था कि लगाव का न तो उत्पादन किया जा सकता है और न ही कानून से बांधा जा सकता है। हर इंसान को अपने विचार रखने का अधिकार होना चाहिए बशर्ते उससे किसी तरह के उपद्रव को बढ़ावा ने मिले।

दुर्भाग्य की बात ये है कि धारा 124ए के बड़े दायरे को सरकार अक्सर तब प्रयोग कर लेती है,जब भी कोई उनकी पाॅवर को चुनौती देता है। चाहे यह जेएनयू के छात्रों का मामला हो या हार्टिक पटेल का या बिनायक सेन का या फिर लेखक अरूधंति राॅय हो या कार्टूनिस्ट असीम द्विवेदी या तमिलनाडू के एक गांव के लोगों द्वाा कुडानकुलम न्यूक्लियर पाॅवर प्लांट का विरोध करना। यह उदाहरण बताते है कि कानून का दुरूपयोग हुआ हैै। कानून साफ है कि सिर्फ नारेबाजी करना ही पर्याप्त नहीं है,उसके साथ उपद्रव को भड़काने का प्रयास भी होना चाहिए।

हालांकि केस दर्ज करते व आपराधिक कार्रवाई शुरू करते समय इस धारा की व्याख्या सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार करने का सवाल पैदा नहीं होता है। इसलिए आसानी से देशद्रोह के आरोप लगा दिए जाते है,कभी यह कड़े भी होते है,परंतु इस प्रकिया में काफी प्रताड़ना होती है। अगर किसी को देशद्रोह के केस में बाद में बरी कर भी दिया जाता है तो भी मामले की चली सुनवाई अपने आप में सजा होती है। किसी पर देशद्रोह लगाना या धमकी देना अपने आप में मूलभूत अधिकार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के प्रयोग को प्रभावित करता है। इसलिए इन कानून का खंडन या भंग करना होगा। परंतु इसका अर्थ यह नहीं है कि किसी सरकार को यह पाॅवर दे दी जाए और इसको कोर्ट पर छोड़ दिया जाए ताकि वह देशद्रोह की वैधानिकता पर फिर से विचार कर सके। यह पर्याप्त नहीं होगा कि चार से पांच साल केस चलने के बाद कोर्ट किसी �

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