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क्या सुप्रीम कोर्ट ने नाॅन वेलफेयर स्कीम में आधार कार्ड को जरूरी बनाए जाने के मामले का समर्थन किया था?

LiveLaw News Network
31 May 2017 11:46 AM GMT
क्या सुप्रीम कोर्ट ने नाॅन वेलफेयर स्कीम में आधार कार्ड को जरूरी बनाए जाने के मामले का समर्थन किया था?
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सुप्रीम कोर्ट में 27 मार्च को मुख्य न्यायाधीश जे.एस.केहर की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय खंडपीठ के सामने 12 डिजिट बाॅयोमैट्रिक यूनिक आईडेंटिकेशन (यू.आई.डी)/आधार कार्ड के मामले को उठाया गया था। इस मामले को सुनने के बाद खंडपीठ ने कोई आदेश नहीं दिया। इस खंडपीठ में न्यायमूर्ति डी.वाई चंद्रचूड व न्यायमूर्ति एस.के कौल भी शामिल थे।

याचिकाकर्ता की तरफ से वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान ने कोर्ट को पूर्व के आदेशों से अवगत कराया और बताया कि पूर्व मुख्य न्यायाधीश एच.एल दत्तू की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संवैधानिक खंडपीठ ने आधार कार्ड के मामले पर तुरंत निर्णय लेने की बात कही थी। सोमवार को ही खंडपीठ को 15 अक्टूबर 2015 के आदेश के पैराग्राफ पांच के बारे में भी बताया गया। अब इस मामले में अगली सुनवाई तीन अप्रैल को होने की संभावना है।

संवैधानिक खंडपीठ का आदेश इस प्रकार था

हम यह साफ कर देंगे कि आधार कार्ड योजना पूरी तरह स्वेच्छिक है और आधार कार्ड को तब तक जरूरी नहीं बनाया जा सकता है,जब तक यह मामला कोर्ट में लंबित है और कोर्ट इसे निपटा नहीं देती है। ऐसे में अगर 27 मार्च को तीन सदस्यीय खंडपीठ कोई आदेश देने या पूर्व में आदेश में संशोधन करने के लिए मना भी लिया जाता तो भी खंडपीठ ऐसा नहीं कर पाती क्योंकि तीन सदस्यीय खंडपीठ को यह अधिकार नहीं है कि वह पांच सदस्यीय खंडपीठ के आदेश में संशोधन करें।

मीडिया अपनी रिपोर्ट में कोर्ट के उस निर्देश को रिपोर्ट करना भूल गया,जिसमें कहा गया है कि यूनियन आॅफ इंडिया को टीवी व रेडियो सहित इलैक्ट्रानिक व प्रिंट मीडिया में इस बात का प्रकाशन करना चाहिए कि किसी नागरिक के लिए यह जरूरी नहीं है कि वह आधार कार्ड प्राप्त करें और किसी योजना का लाभ उठाने के लिए उसे आधार कार्ड दिखाना जरूरी नहीं है।

इस मामले में गलत रिपोर्ट की गई है,जिसमें बताया आधार कार्ड पर राज्यसभा में भी डिबेट होनी है और आशंका जाहिर की गई थी कि सुप्रीम कोर्ट सोमवार को कोई आदेश दे देगी।

सोमवार को सीपीआई(एम) सीताराम येचुरी और टीएमसी के सुखेंदू शेखर राॅय ने इसी आशंका पर राज्यसभा में बोला कि आधार कार्ड के मामले में सुप्रीम कोर्ट कोई आदेश देने वाली है। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि इस मामले में मीडिया ने गलत रिपोर्ट दी थी और दोनों नेताओं ने आधार कार्ड पर सरकार की आलोचना की। यह पहली बार नहीं हुआ है कि जब टीएमसी और सीपीआईएम ने मिलकर आम जनहित में इसकी आलोचना की हो। दोनों ने पश्चिम बंगाल विधानसभा में मिलकर आधार कार्ड के खिलाफ प्रस्ताव पास किया था ताकि कोर्ट के आदेश का पालन किया जा सके। इतना ही नहीं बीएसपी के सतीश चंद्रा मिश्रा ने उस बात का समर्थन किया जो टीएमसी सांसद ने कही थी।

इस समय आधार कार्ड के खिलाफ 13 केस दायर हो चुके है,जिनको एक साथ जोड़ दिया गया है। इसके अलावा आधार एक्ट पर आए मनी बिल के खिलाफ भी एक केस अलग से दायर किया गया है। संभावना है कि इस केस को अगले कुछ दिनों में फिर से कोर्ट के समक्ष रखा जाए। लोकनीति फाउंडेशन बनाम यूनियन आॅफ इंडिया मामले में छह फरवरी को सुप्रीम कोर्ट के समक्ष अपना काउंटर हलफनामा दायर करते हुए केंद्र सरकार की तरफ से अॅटार्नी जनरल ने कहा था कि बाॅयोमैट्रिक यू.आई.डी स्वेच्छिक है। सरकार की इस दलील को मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने अपने आदेश में लिखा था। इस खंडपीठ में न्यायमूर्ति एन.वी रमाना भी शामिल थे। खंडपीठ ने कहा था कि आधार कार्ड या बाॅयोमैट्रिक सत्यापन, फोन का कोई नया कनेक्शन लेने के लिए जरूरी नहीं है।

अपनी याचिका में लोकनीति फाउंडेशन ने मांग की थी कि आधार कार्ड या बाॅयोमैट्रिक सत्यापन को मोबाइल फोन के सत्यापन करने और उसे लेने के लिए जरूरी बनाया जा सकता है,जिससे मोबाइल फोन की सौ प्रतिशत सत्यता प्रमाणित हो जाएगी। परंतु अॅटार्नी जनरल की दलीलों को देखने के बाद जाहिर हो रहा है कि खंडपीठ ने भी यह मान लिया है कि वह संवैधानिक खंडपीठ के आदेश का ही पालन करेंगे,जिसमें आधार कार्ड को स्वेच्छिक बताया गया है।

संचार मंत्रालय के दूरसंचार विभाग ने भी इस मामले में एक लेटर जारी करते हुए कहा था कि इस समय उपभोक्ताओं के सौ प्रतिशत ई-केवाईसी पर आधारित पुन-सत्यापन में सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन किया जाए।इस लेटर में छह फरवरी के आदेश का भी आंशिक उल्लेख किया गया था।
पैराग्राफ पांच में कोर्ट ने जो टिप्पणी की है,वो इस प्रकार है-मामले की सुनवाई के दौरान हमारे समक्ष जो तथ्य पेश किए गए है,हम उनको देखने के बाद इस बात से संतुष्ट है कि रिट पैटिशन में जो मांग की गई है,उन पर विचार कर लिया गया है और पहचान सत्यापन के लिए प्रभावित प्रकिया विकसित कर ली गई है। साथ ही नया मोबाइल फोन लेने वालों के पतों का भी सत्यापन हो जाएगा। इतना ही नहीं आज से एक साल के अंदर इस समय मौजूद सभी उपभोक्ताओं के सत्यापन का काम पूरा कर लिया जाएगा।

संचार मंत्रालय को इस बात पर विश्वास है कि दो सदस्यीय खंडपीठ का आदेश पांच सदस्यीय संवैधानिक पीठ के आदेश का ही प्रचलित कर रहा है।

इतना ही नहीं सोमवार को मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि संवैधानिक खंडपीठ के गठन के लिए कोई जल्दबाजी करने की जरूरत नहीं है क्योंकि इस बारे में कोर्ट के औपचारिक आदेश में कुछ नहीं कहा गया है।

इतना ही नहीं पूर्व मुख्य न्यायाधीश दत्तू की अध्यक्षता वाली संवैधानिक खंडपीठ ने माना था कि इस मामले में तुरंत सुनवाई की जरूरत है,इसलिए हम भारत के मुख्य न्यायाधीश से आग्रह करते है कि इस मामले की अंतिम सुनवाई के लिए खंडपीठ का जल्द से जल्द गठन करे। एक साल व तीन महीने से ज्यादा समय बीत चुका है,परंतु अभी तक संवैधानिक बेंच के आदेश का पालन नहीं हुआ है। उस आदेश में यह भी कहा गया था कि इस बेंच का गठन सिर्फ केंद्र सरकार की उस अर्जी का निपटारा करने के लिए हुआ था,जिसमें तीन सदस्यीय खंडपीठ द्वारा 11 अगस्त 2015 को दिए गए आदेश में स्पष्टीकरण या संशोधन की मांग की गई थी। इसलिए ऐसा लग रहा है कि सोमवार को मुख्य न्यायाधीश द्वारा की गई टिप्पणी तीन सदस्यीय खंडपीठ को दी गई अखंडता व ज्यूडिशियल अनुशासन के विरोधाभासी है क्योंकि मुख्य न्यायाधीश उपयुक्त बल वाली खंडपीठ का हिस्सा नहीं है।

न्यायमूर्ति चेलमेश्वर,न्यायमूर्ति एस.ए बोबड़े और न्यायमूर्ति सी.नागाप्पन की खंडपीठ ने अपने आदेश में कहा था कि हमारा मानना है कि संस्थागत अखंडता व ज्यूडिशियल अनुशासन को इस बात की जरूरत है कि बड़ी खंडपीठ द्वारा दिए गए किसी आदेश को बिना उचित कारण दिए या उसका निरीक्षण किए कोई छोटी बेंच अनदेखा न करे। ऐसा करते समय छोटी बेंच को बताना होगा कि बड़ी बेंच ने किन तथ्यों की अनदेखी की है,जिस कारण उनके आदेश का पालन नहीं किया जा रहा है। साथ ही कहा था कि सही आदेश के लिए इस मामले को उचित खंडपीठ के पास रेफर किया जा रहा है।

5 अक्टूबर 2015 को सुप्रीम कोर्ट की उचित संख्या वाली खंडपीठ ने आधार कार्ड के मामले एक आदेश दिया था,इस पांच सदस्यीय खंडपीठ की अध्यक्षता मुख्य न्यायाधीश ने की थी,जो इस प्रकार है-4. हम केंद्र सरकार पर इस बात पर मोहर लगाते हैं कि 23 सितम्बर 2013 को पूर्व में कोर्ट द्वारा दिए गए आदेश का पूरी कड़ाई से पालन किया जाएगा।

5.हम यह भी साफ कर रहे हैं कि आधार कार्ड योजना स्वेच्छिक है और इसको तब तक जरूरी नहीं बनाया जा सकता है जब तक इस मामले में दायर केस का निपटारा नहीं हो जाता है।

इससे पहले भी एस.एल.पी (सी.आर.एल)2524/2014 यू.आई.डी.ए.आई बनाम सी.बी.आई केस में 24 मार्च 2014 को दिए गए आदेश में भी साफ कहा था कि किसी भी व्यक्ति को इस आधार पर किसी सेवा से वंचित न किया जाए कि उसके पास आधार कार्ड नहीं है,बशर्ते वह उस सेवा को पाने की बाकी शर्ते पूरी करता हो। इसलिए सभी अॅथारिटी को निर्देश दिया जाता है कि फाॅर्म या सर्कुलर आदि में संशोधन कर दे कि इस कोर्ट के अंतरिम आदेश के अनुसार आधार कार्ड जरूरी नहीं है। साथ ही कहा था कि इस कोर्ट द्वारा पूर्व में भी इस मामले में दिए गए आदेशों का कड़ाई से पालन किया जाए।

दाॅ आधार (टारगेटिड डिलिवरी आॅफ फाइनेंसियल एंड अदर सब्सिडिज,बेनिफिट एंड सर्विस) एक्ट 2016 पास होने के बाद कोर्ट ने फिर से 14 सितम्बर 2016 को अपने पुराने आदेश को दोहराया था और कहा था कि सुप्रीम कोर्ट का पुराना आदेश यहां का कानून है। अगर कोई भी भारतीय या एजेंसी आधार कार्ड को जरूरी बनाए जाने के कारण किसी तरह की समस्या महसूस कर रही है,वह किसी भी तरह की असंवैधानिक निर्देश या सर्कुलर से अपने आप को बचाने के लिए कोर्ट के आदेश को प्रयोग कर सकती है। इसलिए कोर्ट के आदेश के अनुसार इस समय मौजूद कानूनी प्रावधान व आधार एक्ट 2016 किसी भी तरह से किसी योजना या प्रोजेक्ट में आधार कार्ड को बढ़ावा नहीं दे रहे है। परंतु सोमवार को तीन सदस्यीय खंडपीठ प्रयोग अरजेंसी या जल्दबाजी शब्द के कारण एक अस्वास्थ्यकारी उदाहरण पेश कर दिया है क्योंकि इस शब्द का प्रयोग अब अन्य खंडपीठ भी लापरवाही से कर सकती है।

नोट-अनजाने में पूर्व में दी गई खबर की हेडलाइन के लिए हमें खेद है।

डाक्टर गोपाल कृष्णा सिटिजन फोरम फाॅर सिविल लिबर्टिज के सदस्य है। आधार बिल,2010 को जांचने व उसे खत्म करने वाली पालिर्यामेंट स्टैंडिंग,फाइनेंस के समक्ष भी वह पेश हुए थे। वह पब्लिक पाॅलिसी व लाॅ रिसर्चर भी है और डब्ल्यू.डब्ल्यू.डब्ल्यू.टीओएक् सआईसीएसडब्ल्यूएटीसीएच डाॅट ओआरजी के एडीटर भी है।

(इस लेख में दिए गए विचार लेखक के अपने है। इस लेख में दिए गए तथ्य लाइव लाॅ के अपने विचार नहीं है। न ही लेख में दिए गए तथ्यों या विचारों के लिए लाइव लाॅ कोई जिम्मेदारी नहीं लेता है।)

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