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ईएमएस नामबोडिरीपैड व अवमानना के मामले में जस्टिस हिदायतुल्लाह द्वारा दिए गए फैसले को याद किया जाना

LiveLaw News Network
7 April 2017 11:51 AM GMT
ईएमएस नामबोडिरीपैड व अवमानना के मामले में जस्टिस हिदायतुल्लाह द्वारा दिए गए फैसले को याद किया जाना
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पिछले दिनों मेरी अपने एक दोस्त से बात हुई थी कि किस तरह जस्टिस हिदायतुल्लाह ने वर्ष 1970 में कोर्ट की अवमानना के मामले में एक पूर्व मुख्यमंत्री पर पचास रूपए जुर्माना लगा दिया था। उस समय किसी ने यह महसूस नहीं किया था कि यह महीना 108 वी राजनीतिक जन्म को सेलिब्रेट करेगा।

सबसे पहली कम्यूनिस्ट सरकार विश्व में केरला में वर्ष 1957 में बनी थी,उय समय शंकरनन नामबोडिरीपैड को पहला मुख्यमंत्री चुना गया था। शंकरनन वर्ष 1909 में एक प्रभावशाली ब्राहमण परिवार में जन्मे थे। उनका ब्राहमण देवी-देवताओं द्वारा बचाव किया गया था। शंकरनन को सभी कम्यूनिस्ट में काफी उंचा पद मिला था और उसने सत्ताधारियों के साथ अच्छे संबंध बनाए थे।

उन्होंने वर्ष 1940 में कम्यूनिस्ट पार्टी की सदस्यता ली और लेफट की तरफ उनका झुकाव बढ़ गया और शंकरनन ईएमएस नामबोडिरीपैड बनकर उभरे।

स्वतंत्रता के दस साल बाद वह वर्ष 1957 में केरला के पहले मुख्यमंत्री बने। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने उस समय एकदम से कम्यूनिस्ट के पाॅवर में आने के बारे में एकदम नहीं सोचा,परंतु बाद में उनको यह सब महसूस हुआ और दो साल औद्योगिक लाॅ व संकट की स्थिति के चलते वर्ष 1959 में केरला में राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया।

हालांकि ईएमएस ने अभित्रस्त होने से मना दिया ओर दस साल बाद फिर से दूसरा बार सत्ता में आए और जमीनी हकीकत को सच्चाई में बदल दिया।

पने मुख्यमंत्री काल के दौरान ईएमएस ने 9 नवम्बर 1967 को एक प्रेस कांफ्रेंस त्रिवेंनथपुरम में बुलाई और ’ज्यूडिशियरी एज एन इंस्ट्रमंट आॅफ अप्रेशन’ पर एक भाषण दिया जो मार्क एंड ईगल की टीचिंग पर आधारित थी।

ईएमएस ने कहा कि जजों को एक वर्ग विशेष से घृणा है,उनको एक वर्ग विशेष में अभिरूचि है और वर्ग विशेष को फायदा पहुंचाते है। ऐसे करते समय गरीबों की अनदेखी की जाती है और अमीरों को फायदा होता है। इस घटना का प्रकाशन इंडियन एक्सपे्रस में किया गया,जिसे आधार बनाते हुए केरला हाईकोर्ट के एक वकील ने कार्रवाई शुरू कर दी। ईएमएस ने एक हलफनामा दायर करते हुए बताया कि अपनी प्रेस कांफ्रेंस में उसने कानून का अपमान नहीं किया। न ही कोर्ट की प्रतिष्ठा को कोई ठेस पहुंचाई या न ही न्यायप्रणाली में किसी तरह की बाधां पहुंचाई। इतना ही नहीं उन्होंने दलील दी कि उसने जो कहा वह एक न्यायपालिका की एक उचित आलोचना थी,जो विचारों की आजादी के तहत आती है। वर्ष 1968 में हाईकोर्ट ने एक जजमेंट दिया,जिसमें दो जजों की एक राय थी और एक जज की राय अलग। इस फैसले में ईएमएस को कोर्ट की अवमानना का दोषी पाया गया।

जस्टिस मैथ्यू ने इसे अवमानना नहीं माना जबकि जस्टिस रमन नैयर व न्यायमूर्ति के.अययर ने ईएमएस को दोषी करार देते हुए उन पर एक हजार रूपए जुर्माना लगा दिया,जिसे न देने पर एक महीने की साधारण कैद काटनी होगी।

संविधान के अनुच्छेद 134 (1)(सी) के तहत मिले सर्टिफिकेट के तहत मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया। न्यायमूर्ति हिदायतुल्लाह,न्यायमूर्ति मित्तर व न्यायमूर्ति ए.एन रे ने वर्ष 1970 में एक काफी महत्वपूर्ण फैसले में माना कि ईएमएस की मार्क,ईगल व लेनिन के संबंध में जो समझ है,वह गलत है। उसने उनकी बातों को गलत तरीके से समझा है।

हालांकि न्यायमूर्ति हिदायतुल्लाह द्वारा लिखे इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने भी ईएमएस को दोषी करार दिया और उस पर पचास रूपए जुर्माना लगा दिया। मैं उस केस की मैरिट पर कोई टिप्पणी नहीं करना चाहता हूं,परंतु आज मैं उस फैसले में की गई कुछ टिप्पणियों पर जरूर विचार करना चाहूंगा। जो न्यायमूर्ति हिदायतुल्लाह ने एक राजनीतिक नेता को दोषी करार देते हुए इस मुद्दे पर अपनी समझ या विचारों के हिसाब से की थी।

मेरे दोस्त ने हमारी बातचीत के दौरान कहा कि जजों को किसी मामले में फैसला अपने विचारों के आधार पर नहीं लेना चाहिए।

असल में क्या हुआ था,वो इस प्रकार है- पैरा 15 ((1970)2एससीसी 325) न्यायमूर्ति हिदायतुल्लाह ने यह नहीं देखा कि ईएमएस ने जो कहा,वह कोर्ट की अवमानना था या नहीं,बल्कि मार्क,ईगल व लैनिन पर एक लेक्चर दे दिया। इसके बाद फैसले में न्यायमूर्ति हिदायतुल्लाह ने अगले 13 पैराग्राफ में इस विषय पर अपने विचार लिख दिए। पैरा 28 में निर्णय दिया गया कि या तो ईएमएस मार्क,ईगल व लैनिन की बातों को समझ नहीं पाया या फिर उसने उनके लिखे हुए को जानबूझकर अपने लाभ के लिए गलत तरीके से प्रयोग किया।

संस्थान के प्रति पूरे आदर भाव रखते हुए यह कहा जा सकता है कि अगर ईएमएस ने कम्यूनिस्ट टीचिंग को गलत तरीके से परिभाषित किया था तो न्यायमूर्ति हिदायतुल्लाह ने भी उनको दोषी देते समय अनुचित किया है।

इतना ही नहीं इस मामले में न्यायमूर्ति हिदायतुल्लाह ने जो विचार किसी वर्ग के संघर्ष,पूंजीपति व सत्ताधारी वर्ग द्वारा दमन करने के इतिहास की जो व्याख्या की है,उस पर वाद-विवाद जरूरी है। यह गलत था कि उन्होंने अपनी टिप्पणियां शामिल कर दी,इसके बजाय उनको इस मामले को विचारों की आजादी व कोर्ट की अवमानना के आधार पर देखना चाहिए था। ब्रिज के तले से काफी पानी बह चुका है और अब यह इतिहास में दर्ज हो गया है कि माॅस्स के एक सच्चे नेता को इसलिए दोषी करार दे दिया गया क्योंकि उसने अपने विचार प्रकट किए थे।

नमित सक्सेना,सुप्रीम कोर्ट में प्रैक्टिस करने वाले वकील है।

(इस लेख में दिए गए विचार लेखक के अपने है। इस लेख में दिए गए तथ्य लाइव लाॅ के अपने विचार नहीं है। न ही लेख में दिए गए तथ्यों या विचारों के लिए लाइव लाॅ कोई जिम्मेदारी नहीं लेता है।)

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