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31 मार्च तक भर दिए जाए जेल अधिकारियों के खाली पद,सुप्रीम कोर्ट ने दिया सभी राज्यों को निर्देश

LiveLaw News Network
5 April 2017 11:25 AM GMT
31 मार्च तक भर दिए जाए जेल अधिकारियों के खाली पद,सुप्रीम कोर्ट ने दिया सभी राज्यों को निर्देश
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देशभर में जेल अधिकारियों की कमी के मामले को गंभीरता से लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्य सरकारों को निर्देश दिया है कि 31 मार्च तक इन पदों को भरने के लिए उचित कदम उठाए जाए।

जेल कर्मियों को दिए जाने वाले प्रशिक्षण में पाई गई कमियों पर नाराजगी जाहिर करते हुए कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि वह जेल अधिकारी व विभिन्न कैटेगरी के कर्मियों के प्रशिक्षण मैन्युअल तैयार करें।

जेलों की कड़ी निगरानी रखने के लिए कोर्ट ने कहा है कि बोर्ड आॅफ विजिटर्स का गठन करने पर बल दिया है और केंद्र से इस संबंध में रिपोर्ट मांगी है।

कोर्ट सलाहकार (एमिकस क्यूरी) गौरव अग्रवाल ने न्यायमूर्ति मदन.बी.लोकुर की अध्यक्षता वाली खंडपीठ के समक्ष वह आकड़े पेश किए जो सरकार ने लोकसभा के समक्ष रखे थे। इन आकड़ों के अनुसार दिसम्बर 2014 में कुल 77,988 जेल अधिकारी होने चाहिए थी,परंतु सिर्फ 52,666 जेल अधिकारी ही काम कर रहे हैं। लोकसभा में एक सवाल के संबंध सरकार की तरफ से दिए गए जवाब का हवाला देते हुए खंडपीठ ने कहा कि इस समय 27000 कर्मियों की कमी है।

खंडपीठ ने कहा कि हम सभी राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों की सरकार को निर्देश दे रहे हैं कि इन पदों को भरने के लिए तुरंत कदम उठाए। यह कदम 31 मार्च तक उठा लिए जाए। हर राज्य सरकार या केंद्र शासित प्रदेश इस संबंध में उठाए गए कदमों के बारे में गृह मंत्रालय को सूचित करें।

वर्ष 2013 में कोर्ट ने एक मीडिया रिपोर्ट पर स्वत संज्ञान लिया था। जिसमें देशभर की जेलों की अमानवीय स्थिति के बारे में बताया गया था। कोर्ट सलाहकार की दलीलों को स्वीकारते हुए कोर्ट ने कहा कि ऐसा लग रहा है कि काफी सालों से मात्र 7800 कर्मियों को कुछ प्रशिक्षण दिया गया है,जिनमें अधिक्तर रिफ्रेशर ट्रेनिंग शामिल है। यह बहुत दुखदायी स्थिति है क्योंकि कर्मियों की संख्या एक क्षेत्र में लगभग पचास हजार है।

कोर्ट ने निर्देश दिया है कि केंद्र सरकार राज्य सरकारों के साथ विचार-विमर्श करें और 31 मार्च तक प्रशिक्षण या टेªनिंग मैन्युअल तैयार करे।

कोर्ट ने हर राज्य में प्रत्येक कैदी पर प्रतिवर्ष होने वाले खर्च के अंतर को भी संज्ञान में लिया। इस मामले में कोर्ट ने गृह मंत्रालय को निर्देश दिया है कि वह एक योजना बनाए और कंट्रोलर एंड आॅडिटर जनरल(कैग) की सहायता से इन सभी खातों की आॅडिटिंग करवाए।

वित्तिय वर्ष 2015-2016 के दौरान बिहार सरकार ने प्रति कैदी पर प्रतिवर्ष का खर्च 83,692 रूपए दिखाया है जबकि राजस्थान में यह खर्च मात्र तीन हजार रूपए दिखाया गया है। नागालैंड के आकड़ों के अनुसार यह खर्च 65,468 रूपए और पंजाब में 16,669 रूपए है।

साथ ही कहा है कि बोर्ड आॅफ विजिटर्स का गठन किया जाए और गृह मंत्रालय इस मामले में स्टे्टस रिपोर्ट दायर करें।

ए.एस.जी एन.के.कौल ने कोर्ट को बताया कि नाबालिगों के लिए मैन्युअल बनाया जा रहा है,जो मार्च के अंत तक तैयार हो जाएगा।

कोर्ट ने सभी राज्य सरकारों व केंद्र शासित प्रदेशों को चेतावनी दी है कि अगर उन्होंने केंद्र सरकार को जरूरी आकड़े उपलब्ध नहीं कराए तो उन पर भारी हर्जाना लगाया जा सकता है। इस मामले में अब अगली सुनवाई 12 अप्रैल को होगी।

कोर्ट के इस आदेश पर काॅमनवेल्थ ह्यूमैन राईट इनिशटिव ने कहा कि हम कोर्ट के निर्देशों से खुश है। प्रभावी बोर्ड जेल के प्रशासन को सुधारने में उचित साबित होंगे।परंतु जब तक योग्य व प्रशिक्षण प्राप्त लोगों को काम पर नहीं लगाया जाएगा,तब तक जमीनी धरातल पर कुछ नहीं बदलेगा। कोर्ट को गृह मंत्रालय की वर्ष 2011 में जारी के अनुसार इस मामले में बोर्ड की नियुक्ति व कार्यप्रणाली की लगातार निगरानी करनी चाहिए।

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