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महिला ने सुप्रीम कोर्ट से कहा, पोर्नोग्राफी पर बैन हो क्योंकि पति हो गया है इसका आदि, बर्बाद हो रही है शादीशुदा जिंदगी

LiveLaw News Network
4 April 2017 3:25 PM GMT
महिला ने सुप्रीम कोर्ट से कहा, पोर्नोग्राफी पर बैन हो क्योंकि पति हो गया है इसका आदि, बर्बाद हो रही है शादीशुदा जिंदगी
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मुम्बई से एक महिला ने सुप्रीम कोर्ट में गुहार लगाई है कि पाॅर्नग्राफिक वेबसाईट पर रोक लगाई जाए क्योंकि उसका पति इनका आदी हो गया है और उससे उनकी शादीशुदा जिदंगी तबाह हो रही है। सुप्रीम कोर्ट पहले से ही चाईल्ड पाॅर्नग्राफी के मामले की सुनवाई कर रही है और केंद्र सरकार को निर्देश दे रखा है कि चाईल्ड पाॅर्नग्राफिक वेबसाईट पर रोक लगाई जाए।

टाईम्स आॅफ इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार इस महिला ने सुप्रीम कोर्ट में याचिक दायर की है और कहा है कि उसका पति आॅनलाइन पाॅर्नग्राफी
देखने का आदी हो चुका है,जिससे उनका वैवाहिक जीवन तबाह हो रहा है। इसलिए ऐसी साईट पर तुरंत बैन लगा दिया जाए। महिला का कहना है कि अगर उसका पढ़ा-लिखा पति इसका आदी हो सकता है,जो अपनी उम्र के ढ़लते पड़ाव पर है तो इन साईट का युवाओं पर बहुत बुरा असर होगा। महिला ने टीओआई को दिए बयान में बताया है कि उसका पति इनका आदी हो चुका है और अपना महत्वपूर्ण समय इनको देखने में गुजारता है क्योंकि आजकल इस तरह की साईट आसानी से नेट पर उपलब्ध हैं। इस तरह वह इनका आदी होता जा रहा है,जो उसके दिमाग पर गलत असर ड़ाल रही है और इससे उनकी शादीशुदा जिंदगी प्रभावित हो रही है। याचिकाकर्ता एक सामाजिक कार्यकता है और उसने कोर्ट को बताया कि उनकी शादी को तीस साल हो चुके हैं। परंतु उनकी शादी में वर्ष 2015 से समस्याएं शुरू हो गई। उसका पति दो बच्चों का पिता है,परंतु वह प्रोनोग्राफी का आदी हो गया है। अपने पति की इस आदत के कारण मुझे व मेरे बच्चों को झेलना पड़ रहा है। पति की इस आदत के कारण घर में आए दिन झगड़े हो रहे हैं। इतना ही नहीं मैंने अपने सामाजिक काम-काज के दौरान भी पाया है कि इंटरनेट पर आसानी से उपलब्ध इन पाॅर्नग्राफिक साईट के कारण किस तरह लोगों का जीवन प्रभावित हो रहा है।

बैकग्राउंड

चाईल्ड पाॅर्नग्राफिक व आॅन लाइन बच्चों के साथ हो रहे बुरे व्यवहार पर सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद पिछले महीने केंद्र सरकार ने बताया था कि इस काम में इंटरपोल की सहायता लेनी होगी। पिछले साल 26 फरवरी को कोर्ट ने कहा था कि बच्चों के यौन शोषण संबंधी फोटो व विडियो इंटरनेट पर उपलब्ध हैं। वहीं चाईल्ड पाॅर्नग्राफी

में भी बढ़ोतरी हो रही है,इसलिए केंद्र को निर्देश दिया था कि तुरंत इस पर कार्यवाही की जाए।

इंटरपोल क्यों?

आईटी मंत्रालय ने एक औपचारिक अनुबंध को अनुमति दी है,जिसके तहत डिपार्टमेंट आॅफ टेलिकम्यूनिकेशन ने इंटरपोल द्वारा तैयार की गई एक सूची ली है,जिसमें ऐसी वेबसाईट के डोमेन है,जो बच्चों के यौन शोषण व अन्य संबंधित डाटा अपनी साईट पर ड़ालती है। जिसके बाद लाइसेंसी आईएसपी को निर्देश दिया गया है कि तुरंत इस तरह की सामग्री हो हटाया जाए और आईटी एक्ट का उल्लंघन करने वाली सामग्री को डिसेबल कर दें। वहीं इन डोमेन के संबंध में सीबीआई से भी सलाह-मशविरा किया जा रहा है। यह जानकारी आईटी मंत्रालय की तरफ से दायर एक हलफनामे में दी गई है। फरवरी माह में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से कहा था कि चाईल्ड पाॅर्नग्राफिक

रोकने के लिए क्या कदम उठाए जा सकते हैं,इसकी जानकारी उनको दी जाए। कोर्ट ने कहा कि विचारों की अभिव्यक्ति के नाम पर देश इस मामले में किसी तरह के एक्सपेरिमेंट को सहन नहीं कर सकता हैं।

सुप्रीम कोर्ट इस मामले में दायर जनहित याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा है,जो इंदौर के एक वकील कमलेश वासवानी और सुप्रीम कोर्ट वूमन लायर्स एसोसिएशन की तरफ से दायर की गई थी। जिनमें मांग की गई है कि केंद्र को निर्देश दिए जाए कि इस तरह की साईट पर बैन लगाने के लिए तुरंत व प्रभावी कदम उठाए। सरकार के साईबर लाॅ व ई-सिक्योरटी के संयोजक आरपी सक्सेना ने एक हलफनामा दायर करते हुए कोर्ट को बताया था कि इस मामले में एक बैठक की गई है और इस काम में इंटरनेट सर्विस प्रोवाईडर से भी सहयोग मांगा गया है। वहीं इंटरपोल के पास भी इस तरह की वेबसाईट की लिस्ट है। इंटरपो को वर्ष 2009 में यूएन जनरल असेंबली ने इस तरह की लिस्ट तैयार करने के लिए कहा था।जिसमें विश्वभर के यूआरएल की लिस्ट तैयार की गई है।

26 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने कहा था कि अभिव्यक्ति की आजादी पूर्ण अधिकार नहीं है। इसलिए केंद्र सरकार चाईल्ड पाॅर्नग्राफिक को रोकने के लिए तुरंत कदम उठाए। साथ ही उस याचिका को भी सुनवाई के लिए स्वीकार किया है,जिसमें कहा गया है सार्वजनिक स्थलों पर प्रोनोग्राफी सामग्री देखने को अपराध की श्रेणी में लाया जाए।

क्या आदेश था सुप्रीम कोर्ट का ?

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि सीनियर काउंसिल महालक्ष्मी पावनी ने इस मामले में मांग की है कि यह कोर्ट केंद्र सरकार को वह निर्देश देने के बारे में सोच सकती है,जिसके तहत सार्वजनिक स्थलों पर पाॅर्नग्राफिक सामग्री देखने पर रोक लगा दी जाए। जिस पर अडिशनल सॉलिसिटर जनरल पिंकी आनंद ने कहा था कि इस दिशा में केंद्र सरकार काम कर रही है,जिसके बाद उचित योजना लाई जाएगी ताकि इस दिशा में उचित निर्देश दिए जा सकें। ऐसे में याचिकाकर्ता अपने सुझाव एएसजी को दे सकती है ताकि वह उनको संबंधित अॅथारिटी के पास पहुंचा दें। वहीं केंद्र सरकार इस मामले में नेशनल कमीशन फाॅर वूमन से भी सुझाव मांग सकती है। वहीं एएसजी ने कहा था कि केंद्र सरकार सिर्फ पाॅर्नग्राफिक साईट को बैन करना चाहती है और नागरिकों के निजी जीवन में दखल नहीं देना चाहती है। जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि केंद्र सरकार ऐसा सिस्टम बनाए जिसके तहत सभी ऐसी साईट ब्लाॅक कर दी जाए। कोर्ट ने कहा कि सरकार पहले ही सफलतापूर्वक गूगल,याहू व माइक्रोसाफट को लिंग जांच संबंधी विज्ञापन दिखाने से रोक चुकी है।

वहीं सुप्रीम कोर्ट वूमन एसोसिएशन की तरफ से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि इस संबंध में निर्देश लेकर उनको सूचित किया जाए। इस याचिका में कहा गया था कि स्थिति इतनी खराब हो चुकी है कि स्कूल जाने वाले लड़के व लड़कियों के पास भी इस तरह की क्लीप पहुंच चुकी है। वहीं आसानी से उपलब्ध इन क्लीप के कारण स्कूल बसों के चालक व कंडेक्टर,कैब व टैक्सी चालक भी अपने मोबाइल ने इनको देखते हैं। वहीं यह आजकल बहुत आम हो गया है कि यह चालक,कंडेक्टर व क्लीनर मासूम बच्चों को फायदा उठाते है और उनको अपने मोबाइल में इस तरह पाॅर्न विडियो दिखाते हैं,जिसके बाद बच्चों का यौन शोषण किया जाता है।

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