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फिल्म में बजे राष्ट्रगान तो खड़े होने की बाध्यता नहीं है-सुप्रीम कोर्ट

LiveLaw News Network
4 April 2017 3:23 PM GMT
फिल्म में बजे  राष्ट्रगान तो खड़े होने की बाध्यता नहीं है-सुप्रीम कोर्ट
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सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि किसी फिल्म या डाक्यूमेंट्री के दौरान अगर राष्ट्रगान बजता है तो किसी को खड़े होने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। इस मामले को लेकर दायर जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा ने कहा कि उनके द्वारा पूछे गए सवाल पर खुद अटार्नी जनरल ने माना है कि न्यायालय का अंतरिम आदेश इस तरह की स्थिति पर लागू नहीं होता है।

इस मामले की एक पक्षकार कोंडुनगल्लर फिल्म सोसायटी की तरफ से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता चंद्र उदय सिंह व वकील पीवी दिनेश ने राष्ट्रगान के दौरान जरूरी खड़े होने के आदेश को वापिस लेने की मांग करते हुए कई घटनाओं को जिक्र किया,जिसमें बताया गया कि उन लोगों पर हमले किए जा रहे हैं जो राष्ट्रगान का सम्मान नहीं करते हैं। देशभर में कई ऐेसे मामले सामने आए हैं,जिनमें राष्ट्रगान के दौरान खड़े न होने वाले लोगों से मारपीट की गई और इस संबंध में कई राज्यों में शिकायत दर्ज हुई हैं। पिछले साल अक्टूबर में अवार्ड विजेता राईटर सलिल चतुर्वेदी पर पणजी के एक मल्टीप्लेक्स में हमला कर दिया गया था क्योंकि वह फिल्म के दौरान बजे राष्ट्रगान के दौरान खड़े नहीं हुए थे। इस कारण उनको स्पाईनल इंर्जी हुई थी।

अटार्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने कोर्ट के समक्ष बताया कि गृह मंत्रालय ने कोर्ट के निर्देश पर दिशा-निर्देश जारी कर दिए है,जिनमें बताया गया है कि कोई शारीरिक तौर पर अक्षम व्यक्ति फिल्म,सार्वजनिक कार्यक्रम व हाॅल के दौरान बजने वाले राष्ट्रगान के दौरान आदर दर्शा सकता है। ऐसे लोगों को हिलने की जरूरत नहीं है और वह अपने आप को फिजिकली अलर्ट स्थिति में रख सकते हैं।

वहीं कोर्ट सलाहकार (एमिकस क्यूरी) सिद्धार्थ लूथरा ने बताया कि इस बारे में कुछ भी स्पष्ट नहीं है कि शारीरिक तौर पर अक्षम के लिए जारी दिशा-निर्देश किस तरह लागू होंगे। जिस पर अटार्नी जनरल ने कहा कि इस दिशा में काम किया जा रहा है और दिशा-निर्देश को ज्यादा स्पष्ट बनाने के लिए काम चल रहा है। लूथरा व अटार्नी के कहने पर न्यायालय इस मामले में दायर सभी याचिकाओं को एक साथ सुनने के लिए तैयार हो गया है। इस मामले में दायर सभी अर्जियों पर एक साथ 18 अप्रैल को सुनवाई की जाएगी।

रोहतगी ने दलील दी कि राष्ट्रगान को स्कूलों में गाना अनिवार्य कर दिया जाना चाहिए और इसके लिए कानून को दोबारा विचार करना चाहिए। जब हमारे पास अपना राष्ट्रगान है तो उसे स्कूलों में अनिवार्य कर दिया जाना चाहिए। साथ ही उस याचिका का विरोध किया जिसमें राष्ट्रगान के दौरान खड़े होने के आदेश को वापिस लेने की मांग की गई थी।

पाॅपकार्न राष्ट्रीयता

मामले की सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव धवन ने मामले में हस्तक्षेप करने की अनुमति मांगते हुए कहा कि वह फिल्म के दौरान अनिवार्य तौर पर बजने वाले राष्ट्रगान और उस दौरान सभी दर्शकों के खड़े होने के आदेश से सहमत नहीं है।उन्होंने कहा कि यह एक पाॅपर्कान नेशनलिज्म होगा और उससे ज्यादा कुछ नहीं। जिस पर न्यायमूर्ति मिश्रा ने कहा कि सवाल यह नहीं है कि आप सहमत है या नहीं है। सवाल यह है कि आदेश सही है या गलत। इस पर बहस चल रही है,इसलिए आप चिंता न करें।

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