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माता-पिता को बराबर का मौका देेने के बाद ही हो सकता है बच्चे की कस्टडी का निर्णय

LiveLaw News Network
4 April 2017 3:21 PM GMT
माता-पिता को बराबर का मौका देेने के बाद ही हो सकता है बच्चे की कस्टडी का निर्णय
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सुप्रीम कोर्ट ने विवेक सिन्हा बनाम रोमानी सिंह केस में अपना फैसला देते हुए व्यवस्था दी है कि माता व पिता,दोनों को बराबर का मौका देने के बाद ही यह निर्णय लिया जा सकता है कि बच्चे की कस्टडी किसे सौंपना उचित रहेगा। सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति जे चेलमेश्वर व न्यायमूर्ति एके सिकरी ने अपने फैसले में कहा कि जिस बच्चे ने अपनी मां को देखा नहीं,वह उसके साथ रहा नहीं या कोई अनुभव नहीं किया,ऐसे में वह किस तरह यह निर्णय कर सकता है कि उसका भला या कल्याण मां के साथ रहने में है या पिता के साथ रहने में।

’बच्ची अभी यह समझने में सक्षम नहीं है कि दूसरी तरफ की घास भी उसके लिए अच्छी या लाभदायक साबित हो सकती है। इसलिए बच्ची की मां को भी कुछ समय के लिए बच्ची की कस्टडी दी जानी चाहिए।’

इस मामले में बच्ची सैसा शुरूआत से अपने पिता के साथ रह रही है। उस समय वह मात्र 21 महीने की थी। इसलिए वह अपने पिता के साथ खुश है और उसी के साथ रहना चाहती है। ऐसे में यह सब तथ्य इस बात की तरफ इशारा करते हैं कि बच्ची की कस्टडी उसके पिता के पास ही रहनी चाहिए,परंतु यह एक तरफ की तस्वीर होगी या एक तरफा निर्णय होगा।

खंडपीठ ने कहा कि बच्ची 21 माह की उम्र से अपने पिता के साथ है और इस समय वह आठ साल तीन माह की हो चुकी है। इसी कारण वह अपने पिता से काफी लगाव करती है और उसी के साथ रहना चाहती है। जिस बच्ची ने कभी अपनी मां को नहीं देखा और न उसके साथ रहने का कोई अनुभव लिया,वह इस बात का निर्णय करने में सक्षम नहीं है कि उसकी मां के साथ रहने से भी उसे अच्छा लगेगा या खुशी मिलेगी। अपनी मां के साथ रहने व उस प्यार को अनुभव करने के बाद ही बच्ची यह निर्णय लेने में सक्षम हो पाएगी कि उसका कल्याण या खुशी मां के साथ रहने में है या पिता के।

खंडपीठ के कहा कि अगर चाईल्ड वेल्फेयर पाॅलिसी के तहत अनुमान लगाया जाए तो इस मामले में ऐसा लगता है कि बच्ची की खुशी या उसका कल्याण उसके पिता के साथ रहने में है,परंतु इस बात का निर्णय तभी ठीक रहेगा,जब पहले माता व पिता को बच्ची को अपने साथ रखने का बराबर का मौका दिया जाए।

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