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उत्तरप्रदेश में लागू हुई पुलिस कमिशनर प्रणाली क्या है, जानिए ख़ास बातें

SPARSH UPADHYAY
14 Jan 2020 5:22 AM GMT
उत्तरप्रदेश में लागू हुई पुलिस कमिशनर प्रणाली क्या है, जानिए ख़ास बातें

उत्तर-प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सोमवार (14-01-2020) को राज्य के 2 शहरों, लखनऊ और गौतमबुद्धनगर में पुलिस आयुक्त प्रणाली (Commissionerate System of Policing) लागू करने की घोषणा की।

उन्होंने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, "हमारी सरकार द्वारा आज पुलिस सुधार की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया गया है। उत्तर-प्रदेश कैबिनेट ने लखनऊ और नोएडा में पुलिस कमिश्नर प्रणाली स्थापित करने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है।"


इस प्रणाली को लागू करने से दोनों ही जिलों में कानून व्यवस्था समेत तमाम प्रशासनिक अधिकार, नियुक्त किए गए पुलिस कमिश्नर के पास रहेंगे। जहाँ 1995-बैच के आईपीएस अधिकारी आलोक सिंह को नोएडा के पहले पुलिस आयुक्त के रूप में नियुक्त किया गया है, वहीँ ADG प्रयागराज मंडल, सुजीत पांडे को लखनऊ पुलिस आयुक्त के पद पर तैनात किया गया है।

पूर्व राज्यपाल भी उठा चुके हैं इस प्रणाली की मांग

दिसंबर 2018 में, यूपी के पूर्व राज्यपाल, राम नाईक ने भी राज्य सरकार को कानून और व्यवस्था की स्थिति में सुधार लाने के लिए उत्तर प्रदेश में पुलिस आयुक्त प्रणाली शुरू करने पर गंभीरता से विचार करने का सुझाव दिया था। उन्होंने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की मौजूदगी में लखनऊ में रिजर्व पुलिस लाइंस में एक पुलिस समारोह को संबोधित करते हुए इस सुझाव का उल्लेख किया था। नाइक ने राज्य सरकार को लखनऊ, कानपुर और गाजियाबाद - जहां जनसंख्या 20 लाख से अधिक है, में यह प्रणाली, परिक्षण के आधार पर शुरू करने का सुझाव दिया था।

प्रेस कांफ्रेंस के दौरान भी मुख्यमंत्री ने यह कहा कि इस नई प्रणाली से राज्य में कानून और व्यवस्था की स्थिति में सुधार करने में मदद मिलेगी। उन्होंने यह भी कहा कि, "लखनऊ में नगर निगम की सीमा के विस्तार के बाद कुल 40 पुलिस स्टेशन हैं। ये सभी 40 स्टेशन पुलिस आयुक्त प्रणाली के तहत आएंगे," उन्होंने कहा। मुख्यमंत्री आदित्यनाथ ने यह भी घोषणा की कि 2 नए पुलिस स्टेशन नोएडा में स्थापित किये जायेंगे।

गौरतलब है कि पुलिस कमिश्नर प्रणाली के अंतर्गत मजिस्ट्रियल शक्तियों सहित और भी तमाम प्रकार के अधिकार, पुलिस महानिरीक्षक (IGP) रैंक के IPS अधिकारियों (जो कमिश्नर के रूप में तैनात किए गए हैं) को दे दिए जाते हैं। पुलिस आयुक्त प्रणाली मौजूदा समय में देश के 15 राज्यों के लगभग 71 शहरों (उत्तर प्रदेश और बिहार के अलावा) में लागू की गयी है। सामान्य परिस्थिति में मजिस्ट्रियल शक्तियां, एक आईएएस अधिकारियों के पास होती हैं। मौजूदा लेख में पुलिस कमिश्नर प्रणाली के बारे में हम बात करेंगे।

क्या होती है पुलिस आयुक्त प्रणाली?

आसान भाषा में कहा जाए तो हम यह समझ सकते हैं कि इस प्रणाली के तहत किसी विशेष जिले में (आमतौर पर महानगर में) जो शक्तियां प्रशासनिक अधिकारियों के पास होती हैं, वह शक्तियां पुलिस कमिश्नर को दे दी जाती हैं ताकि वो भी जरुरत पड़ने पर बिना किसी रुकावट के प्रतिबंधात्मक कार्यवाहियों को अंजाम दे सके और उसे कुछ विशेष शक्तियों के इस्तेमाल करने के लिए किसी प्रशासनिक अधिकारी से इजाजत न लेनी पड़े। चूँकि इस प्रणाली में पुलिस बल के एक अधिकारी (पुलिस कमिश्नर) के हाथ में कानून व्यवस्था को बनाये रखने से सम्बंधित अहम् शक्तियां आ जाती हैं, इसलिए वो अन्य पुलिस अधिकारियों को आसानी से दिशा निर्देश देते हुए कानून व्यवस्था को सुगमता से अपने क्षेत्र में बनाए रख सकता है।

गौरतलब है कि संविधान की 7वीं अनुसूची के तहत, 'पुलिस' सब्जेक्ट राज्य सूची के अंतर्गत आता है, जिसका अर्थ है कि अलग-अलग राज्य, आमतौर पर इस विषय पर कानून बना सकते हैं और पुलिस बल को नियंत्रित कर सकते हैं। और इसी क्रम में उत्तर-प्रदेश सरकार द्वारा यह निर्णय लिया गया है। हम यह भी जानते हैं कि भारतीय पुलिस अधिनियम, 1861 के भाग 4 के अंतर्गत एक IAS रैंक के व्यक्ति के पास जिले में पुलिस नियंत्रण का अधिकार होता है (क्योंकि ऐसा व्यक्ति जिले में राज्य सरकार के प्रतिनिधि के तौर पर मौजूद होता है) और ऐसे व्यक्ति को डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट (जिलाधिकारी) कहा जाता है।

आमतौर पर, जिला स्तर पर पुलिस बल की व्यवस्था में, नियंत्रण की एक 'दोहरी प्रणाली' मौजूद होती है, जिसमें पुलिस प्रशासन की निगरानी के लिए पुलिस अधीक्षक (SP) को जिलाधिकारी (DM) के साथ समन्वय स्थापित करते हुए कार्य करना होता है। महानगरीय स्तर पर, कई राज्यों ने इस दोहरी प्रणाली को पुलिस आयुक्त प्रणाली के साथ बदल दिया है, क्योंकि यह प्रणाली महानगर के जटिल मुद्दों को हल करने के लिए तेजी से एवं आसानी से निर्णय लेने की अनुमति देने वाली प्रणाली होती है।

पुलिस आयुक्त को मिल जाती हैं अहम शक्तियां

दरअसल, दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 के अंतर्गत एक जिलाधिकारी को कानून-व्यवस्था को बनाए रखने के लिए कई शक्तियां प्रदान की गयी हैं। आमतौर पर किसी भी जिले में सामान्य पुलिस व्यवस्था के अंतर्गत, यदि किसी पुलिस अधिकारी या कर्मचारी का तबादला किया जाना होता है तो इसके लिए एक SSP रैंक के अधिकारी को जिलाधिकारी की मंजूरी लेनी होती है। इसी प्रकार से किसी विशेष क्षेत्र में धारा 141, दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 को लागू करने या कर्फ्यू लगाने का अधिकार भी प्रशासनिक अधिकारियों के पास ही होता है।

यह भी समझा जाना चाहिए कि सामान्य पुलिसिंग के अंतर्गत जहाँ भी दंगे होते हैं, वहां पुलिस बल को लाठी चार्ज या फायरिंग के लिए भी एक प्रशासनिक अधिकारी से अनुमति लेनी होती है। इसके अलावा जब किसी स्थान पर शांति भंग जैसी घटनाएँ होती हैं, और यदि दंड संहिता के अंतर्गत विभिन्न धाराओं के अंतर्गत आरोपी को जेल भेजना है या उसे जमानत देनी है, तो इसका फैसला भी प्रशासनिक अधिकारी ही करता है। पुलिस आयुक्त प्रणाली में यह सभी शक्तियां एक पुलिस आयुक्त के पास आ जाती हैं। यह भी ध्यान में रखा जाना चाहिए कि कुछ विशेष मामलों में राज्य सरकार, सीआरपीसी की धारा 20 (5) के तहत, पुलिस आयुक्त को एक कार्यकारी मजिस्ट्रेट की कानूनी शक्तियां प्रदान कर सकती है।

सरल शब्दों में, दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 के अंतर्गत एक एक्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट (Executive Magistrate) को कानून व्यवस्था को बनाये रखने के लिए कुछ शक्तियां प्रदान कर दी जाती हैं। जिसका सीधा मतलब है कि एक पुलिस अधिकारी को सीधे तौर पर कोई भी फैसला लेने के लिए स्वतंत्रता नहीं दी गयी है। जहाँ भी आकस्मिक परिस्थितियां उत्पन्न होती हैं वहां डीएम या कमिश्नर या फिर शासन के आदेश के तहत ही पुलिस अधिकारी कार्य करते हैं। आयुक्त प्रणाली लागू हो जाने से डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट को मिले पुलिस पर नियंत्रण के अधिकार, एक पुलिस अफसर यानी कि पुलिस आयुक्त को मिल जाते हैं।

साफ़ है कि इस प्रणाली के अंतर्गत एक आईएएस अफसर से एक पुलिस कमिश्नर के पास विभिन्न शक्तियों का स्थानांतरण हो जाता है। कमिश्नर प्रणाली में पुलिस को तमाम प्रशासनिक अधिकार भी मिल जाते हैं। इस प्रणाली में, पुलिस आयुक्त (CP) एक एकीकृत पुलिस कमांड संरचना का प्रमुख बन जाता है, जो शहर में बल के लिए जिम्मेदार होता है, और राज्य सरकार के प्रति जवाबदेह होता है। ऐसे आयुक्त में मजिस्ट्रेटियल शक्तियां निहित होती हैं, जिनमें विनियमन, नियंत्रण और लाइसेंसिंग से सम्बंधित अधिकार शामिल होते हैं।

लखनऊ और गौतम बुद्ध नगर में ऐसी होगी व्यवस्था

नई प्रणाली के तहत, लखनऊ में 1 अपर पुलिस महानिदेशक रैंक का अधिकारी होगा, जिसे आयुक्त बनाया जाएगा, उसके अधीन 2 संयुक्त पुलिस आयुक्त होंगे, जो पुलिस महानिरीक्षक रैंक के अधिकारी होंगे। ये दोनों संयुक्त पुलिस आयुक्त, कानून-व्यवस्था और अपराध के मामले देखेंगे और उनके अधीन एसपी रैंक के 9 अधिकारी होंगे। इनके अलावा, नई टीम में महिला सुरक्षा के लिए एक विशेष SP भी नियुक्त की जाएगी ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि महिलाओं से संबंधित अपराध पर नियंत्रण हो और महिलाओं के खिलाफ अपराध के मामलों में समय पर जांच हो। विशेष महिला एसपी यह भी सुनिश्चित करेंगी कि महिलाओं के खिलाफ अपराध के मामलों में चार्जशीट समय पर दायर की जाए। इसके अलावा, एक अन्य SP रैंक का अधिकारी होगा, जो ट्रैफिक प्रबंधन का प्रभारी होगा और उसके अधीन एक अतिरिक्त SP रैंक का अधिकारी होगा।

इसके अलावा गौतम बुद्ध नगर में, जहाँ ADG रैंक के अधिकारी को आयुक्त के रूप में नियुक्त किया जाएगा, उनके अधीन 2 DIG रैंक के अधिकारी काम करेंगे, जबकि 5 पुलिस अधीक्षक इन दो DIG के अधीन कार्य करेंगे। लखनऊ की तरह गौतम बुद्ध नगर में भी महिला सुरक्षा के लिए 1 विशेष पुलिस अधीक्षक का पद होगा और दूसरा यातायात के लिए पद होगा। यह भी निर्णय लिया गया है कि मजिस्ट्रियल शक्तियां इन अधिकारियों को सौंपी जाएंगी, जिन्हें 15 नई शक्तियां सौंपी गई हैं

अंत में, चूँकि महानगरों में कानून व्यवस्था से जुडी समस्याएँ जटिल प्रकृति की होती हैं, इसलिए महानगरों के लिए पुलिस आयुक्त प्रणाली उचित समझी जाती है, हालाँकि इसको लेकर भी कई मत मौजूद हैं। ऐसे महानगरों के अलावा आमतौर पर पूरे देश में पुलिस प्रणाली, पुलिस अधिनियम, 1861 पर आधारित होती है। इस विशेष प्रणाली को लागू करने के पीछे की एक प्रमुख वजह यह होती है कि अक्सर ही एमरजेंसी हालात में पुलिस के पास तत्काल निर्णय लेने के अधिकार नहीं होते और उन्हें प्रशासनिक गतिविधियों के लिए जिलाधिकार या अन्य प्रशासनिक अधिकारियों के पास जाना होता है। ऐसे में कई बार हालात बेकाबू हो जाते हैं और ऐसी ही परिस्थितियों से बचने के लिए यह प्रणाली उपयोगी साबित होती है।

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