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लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 भाग 7: प्रवेशन लैंगिक हमले में दोषमुक्ति पर न्यायालय के कुछ निर्णय

Shadab Salim
18 Jun 2022 5:51 AM GMT
लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 भाग 7: प्रवेशन लैंगिक हमले में दोषमुक्ति पर न्यायालय के कुछ निर्णय
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लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 (The Protection Of Children From Sexual Offences Act, 2012) धारा 4 प्रवेशन लैंगिक हमले से संबंधित है। इस धारा में प्रवेशन लैंगिक हमले के लिए दंड प्रावधानित किया गया है। न्यायालय ने अपने निर्णयों में अभियुक्त को दोषमुक्ति भी दी है। इस आलेख में ऐसे ही कुछ निर्णयों पर चर्चा की जा रही है।

यदि सम्बद्ध विषय के बारे में अभियोजन का साक्ष्य लेने अभियुक्त की परीक्षा करने और अभियोजन और प्रतिरक्षा को सुनने के पश्चात् न्यायाधीश का यह विचार है कि इस बात का साक्ष्य नहीं है कि अनियुक्त ने अपराध किया है तो। न्यायाधीश दोषमुक्ति का आदेश अभिलिखित करेगा

राजस्थान राज्य बनाम नूरे खान एआईआर 2000 एससी 1812 के मामले में दोषमुक्ति के आदेश की वैधानिकता न्यायालय को महिलाओं पर लैंगिक हमले के आरोप पर विचार करते हुए उत्तरदायित्व की अधिक भावना को प्रदर्शित करना है तथा अधिक संवेदनशील होना है। वर्तमान मामले में इसके बारे में इंगित करने के लिए कोई कारण नहीं है कि अभियोकी अथवा उसके परिवार का कोई सदस्य अभियुक्त को मिथ्या रूप में क्यों साएगा।

इसलिए उच्च न्यायालय अभियोक्त्री को उसके 16 वर्ष से अधिक आयु का होना साबित न किए जाने के बावजूद लैंगिक उत्पीडन का सम्मत पक्षकार होना अभिनियोरित करने में न्यायसंगत नहीं था इसलिए दोषमुक्ति का आदेश अवैध है।

अपीलीय न्यायालय के द्वारा दोषमुक्ति के आदेश में हस्तक्षेप-

जहाँ पर उच्च न्यायालय न दोषसिद्धि के विरुद्ध अपील में सत्र न्यायालय से अभिलेख पहुंचने की प्रतीक्षा किए बिना और अभियोजन के द्वारा प्रस्तुत किए गये साक्ष्य का परिशीलन किए बिना अभियुक्त को दोषमुक्त किया था. वहा पर वह न्याय की घोर हत्या थी और दोषमुक्ति का आदेश अपास्त किए जाने के लिए दायी था।

सुरिन्दर सिंह बनाम उत्तरप्रदेश राज्य, (2003) (एससी) क्रि लॉ जर्नल 4446, के मामले में सर्वोच्च न्यायालय के द्वारा निम्न प्रकार से कहा गया है -

यह सत्य है कि दोषमुक्ति के आदेश में हल्के से हस्तक्षेप नहीं किया जाना चाहिए। हालांकि अपीलीय न्यायालय को उस साक्ष्य जिस पर दोषमुक्ति का आदेश पाया गया हो का पुनर्विलोकन करने की पूर्ण शक्ति प्राप्त होती है, फिर भी दोषमुक्ति के मामले में ऐसी अपीलीय शक्ति का प्रयोग करते हुए अपीलीय न्यायालय को तथ्य और अवर न्यायालय के द्वारा दोषमुक्ति के अपने आदेश के समर्थन में प्रदान किए गये कारणों के प्रश्न पर सम्बन्ध रखने वाले अभिलेख के प्रत्येक मामले पर विचार नहीं करना चाहिए।

उसे निर्णय में अपने ऐसे कारणों को अभिव्यक्त करना चाहिए जो उसे यह अभिनिर्धारित करने के लिए अग्रसर करते हैं कि दोषमुक्ति न्यायसंगत नहीं है।

पुनः पैरा 15 में भी निम्न प्रकार से सप्रेक्षण किया गया है दोषमुक्ति के आदेश को उलटते समय अभियुक्त को दोषमुक्त करने के लिए विचारण न्यायालय के द्वारा प्रदान किए गये प्रत्येक कारणों पर विचार करना तथा विचार-विमर्श करना और तब उन कारणों को विस्थापित करना उच्च न्यायालय पर बाध्यकारी होता है।

हिमाचल प्रदेश राज्य बनाम ओम प्रकाश, 2005 क्रि लॉ जर्नल 779 के मामले में प्रत्येक अभियुक्त अपने दोष के सम्बन्ध में युक्तियुक्त संदेह के लाभ का हकदार होता है और जब विचारण न्यायालय उसे दोषमुक्त करता है, तब वह अपीलीय न्यायालय में भी उस लाभ को प्रतिधारित करेगा। इस प्रकार दोषमुक्तियों के विरुद्ध अपीलों में अपीलीय न्यायालय को बहुत सतर्कतापूर्वक कार्यवाही करना है और केवल यदि अभिलेख पर साक्ष्य पर अभियुक्त के दोष को यह पूर्ण आश्वासन प्रदान किया गया हो तब ही दोषमुक्ति का आदेश हस्तक्षेप अथवा विक्षुब्ध किए जाने के लिए दायी है।

वर्तमान मामले में अभिलेख पर सम्पूर्ण साक्ष्य का मूल्याकन और सनिरीक्षण करने पर सर्वोच्च न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित किया था कि विचारण न्यायालय प्रत्यर्थीगण को आरोपों से दोषमुक्त करने में बिल्कुल न्यायसंगत था, क्योंकि अपनाया गया विचार युक्तियुक्त था और दोषमुक्ति के आदेश को प्रतिकूल होना नहीं कहा जा सकता है।

अर्जुन सिंह बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य एआईआर 2009 एससी 242 के प्रकरण में अपीलार्थी अन्य व्यक्तियों के साथ अभियोक्त्री को जंगल में घसीट कर ले गया था और उसके साथ बलात्संग कारित किया था। अभियोक्त्री का साक्ष्य यह था कि अभियुक्त एक-दूसरे को नाम से बुला रहे थे। किया गया पहचान परीक्षण परेड अविश्वसनीय है।

अपीलार्थी घटना स्थल पर पकड़े गये अभियुक्तों में से एक नहीं था। घटना स्थल पर अपीलार्थी की उपस्थिति को साबित करने के लिए कोई साक्ष्य नहीं था। अपीलार्थी को मात्र इस कारण से दोषसिद्ध नहीं किया जा सकता है कि उसका नाम अभियोक्त्री के द्वारा बताए गये अभियुक्त के नामों के समान था।

महाराष्ट्र राज्य बनाम अम्बरनाथ बापूसाहब गाडे 2004 क्रि. लॉ जर्नल 4445 (बम्बई) दोषमुक्ति के आदेश को अपास्त करना वर्तमान मामले में यह अभिकथन किया गया था कि अभियुक्त पति मध्यरात्रि के दौरान अपनी पत्नी (अभियोक्त्री) को बलपूर्वक उसका मुह दबाने के पश्चात् कृषि खेत में ले गया था और तब सभी पांचों अभियुक्त उसके साथ बलात्संग कारित किए थे। घटना से पीड़िता को इस सीमा तक आघात लगा था कि वह उन्मत्त हो गयी थी और भूलने की बीमारी से ग्रस्त हो गयी थी।

उसका ऐसे जघन्य अपराध में अभियुक्त को मिथ्या रूप में फंसाने का कोई हेतुक नहीं था। यह तथ्य कि यह हिस्ट्रीकल एमनेसिया (भूलने की बीमारी) में परिणामित गम्भीर और घोर मानसिक आघात उपगत की थी और ऐसी किसी चीज़ जो उसके साथ एक सप्ताह पहले घटित हुई थी अथवा घटित हो रही थी को समझने के लिए निर्योग्य हो गयी थी, सभी ऐसी सशक्त समर्थनकारी परिस्थिति है कि उसके साथ शिकायत किया गया अपराध कारित किया गया था। इसलिए किसी संपुष्टि की माँग की जानी आवश्यक नहीं थी।

वहां पर अभियोक्त्री के भाई का साक्ष्य, स्वयं उसके तथा अभियुक्त के फटे हुए कपड़ों की बरामदगी का साक्ष्य, उसकी शारीरिक तथा मानसिक स्थिति, जब भाई उसके द्वारा रिपोर्ट दर्ज कराते समय उसे पाया था. उसके द्वारा पंचों तथा पुलिस दल को अपराध स्थल को दर्शाने तथा सामूहिक बलात्संग के दौरान उसके द्वारा उपगत क्षतियाँ थी।

ये सभी परिस्थितियां न केवल उसके अभिसाक्ष्य को आश्वासन प्रदान करती है, वरन वे सशक्त रूप में उसके मामले को संपुष्ट करती है। इसके अलावा अभियुक्त का अचारण तथा व्यवहार अर्थात् उसे मानसिक आघात की स्थिति में गांव में पाए जाने तथा हिस्ट्रीकल एमनेसिया से ग्रस्त होना पाए जाने के पश्चात् उसके स्वास्थ्य तथा सुरक्षा के बारे में कोई चिन्ता न करना सभी उसके द्वारा किए गये अभिकथनों की सकेतक तथा समर्थनकारी है। इस सामूहिक बलात्संग का प्रयोजन उसे ऐसी रीति में समाप्त करना था कि वह स्वस्थ महिला न रह सके, जिससे कि अपने पति के दूसरे विवाह का प्रतिरोध न कर सके।

अभियुक्त के आचरण को उपयुक्त रूप में ऐसे कामुक बुद्धिहीन व्यक्ति के आवरण के रूप में वर्णित किया जा सकता है, जो अभियोक्त्री के साथ सामूहिक बलात्संग कारित करने के ऐसे अविवेकहीन, धोखापूर्ण तथा कपटपूर्ण कृत्य को प्रदर्शित कर सके, जब वह अभियुक्त-पति के साथ उसके दूसरे विवाह के लिए उसे क्षमा करने के पश्चात् भी वैवाहिक जीवन जीने की सभी आशा के साथ अपने घर आयी थी। यह ऐसा मामला है, जो घोर दण्ड की अपेक्षा करता है। विचारण न्यायालय का दोषमुक्ति का निर्णय अपास्त किया गया।

सुरेश एन भुसारे बनाम महाराष्ट्र राज्य, एआईआर 1998 एससी 3131 दोषमुक्ति के आदेश का प्रत्यावर्तन जहाँ पर चिकित्सीय साक्ष्य के साथ असंगतता थी तथा शरीर पर कोई क्षति नहीं पायी गयी थी और पुन जहाँ पर अन्य साक्षी का आचरण अस्वाभाविक हो, वहां पर दोषमुक्ति के आदेश को प्रत्यावर्तित किया गया।

प्रहलाद सिंह बनाम म प्र राज्य 1997 (7) अभियोक्त्री ने यह कथन किया था कि वह अपने कथन की तारीख पर अपने पिता के साथ आयी थी और पुलिस चाचा भी बाहर थे और यह कि पुलिसवाला और उसके पिता ने उसे यह बताया कि वह अभियुक्त था और इस कारण से वह कह रही थी कि वह अभियुक्त था। उसने यह स्वीकार किया कि उसे न्यायालय कक्ष के बाहर पुलिसवाला के द्वारा सिखाया गया था। ऐसे कथन और मामले की अन्य परिस्थितियों की दृष्टि में उच्च न्यायालय अभियुक्त को दोषसिद्ध करने में न्यायसंगत नहीं था। उच्च न्यायालय के आदेश को अपास्त किया गया तथा अभियुक्त को दोषमुक्त करते हुए विधारण न्यायालय के आदेश को प्रत्यावर्तित किया गया।

दोषमुक्ति के एक मामले में जब अभियोजन मामला युक्तियुक्त संदेह से परे साबित न किया गया हो अभियोजन के अनुसार युवा लड़की के साथ बलात्सग कारित करने का प्रयत्न किया गया था. जिसका उस पर मिटटी का तेल उडेलकर लड़की पर आग लगा करके विरोध किया गया था। मृत्युकालिक घोषणा के बारे में डॉक्टर, जिसने कथन करने के लिए मृतका की उपयुक्तता के बारे में प्रमाणित किया था, से सहायक पुलिस निरीक्षक, जिसने घोषणा को अभिलिखित किया था. के द्वारा घोषणा में उसका पृष्ठांकन करने के लिए नहीं कहा था, यद्यपि डॉक्टर उपस्थित था। मृत्युकालिक घोषणा में शैथिल्यताओं के कारण उस पर कोई विश्वास व्यक्त नहीं किया जा सकता था। इसलिए दोषसिद्धि अपास्त की गयी।

दोषी को साबित करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य के अभाव में दोषमुक्ति साक्ष्य की गुणवत्ता और सबूत की मात्रा तथा संपुष्टिकारी और समर्थनकारी साक्ष्य, जो मामलों के इस वर्ग में दोषसिद्धि को संधार्य बनाने के लिए बहुत आवश्यक हैं, का वर्तमान मामले में पूर्ण रूप में तथा सम्पूर्ण रूप में अभाव अथवा कमी है। यह इस कारण से है कि दोषमुक्ति के आदेश मे कोई हस्तक्षेप प्राधिकृत नहीं है।

आन्ध्र प्रदेश राज्य बनाम लंकापल्ली वेंकटश्वरलू 2000 के मामले में अभियोक्त्री ने न्यायालय में अभिलिखित अपने साक्ष्य में प्रथम सूचना रिपोर्ट में यथाअभिलिखित प्रकथन से इन्कार कर दिया था। चिकित्सीय साक्ष्य भी अभियोक्त्री के द्वारा किए गये अभिकथनों का समर्थन नहीं कर रहा था। इसलिए दोषमुक्ति का आदेश सपुष्ट किया गया।

दिलीप बनाम मप्र राज्य, एआईआर 2001 एससी 3049 के मामले में जहाँ पर अभियोक्त्री के द्वारा घटना के प्रकथन का उसकी चाची, जिसे वह लैंगिक हमले की कहानी बतायी थी, के कथन के द्वारा खण्डित किया गया था और इसे चिकित्सीय साक्ष्य अथवा न्यायालयिक विज्ञान प्रयोगशाला की रिपोर्ट के द्वारा अथवा उन डॉक्टरों के द्वारा, जो अभियोक्त्री की जांच किए थे, संपुष्ट नहीं किया गया था, यह अभिनिर्धारित किया गया था कि अभियोक्त्री के अभिसाक्ष्य पर विश्वास व्यक्त नहीं किया जा सकता था और अभियुक्त दोषमुक्ति का हकदार था।

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