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क्या है ऑनलाइन ट्रोलिंग पर कानून (साइबर क्राइम एवं महिलाओं के विरुद्ध हिंसा- भाग-2)

LiveLaw News Network
27 Sep 2019 7:07 AM GMT
क्या है ऑनलाइन ट्रोलिंग पर कानून  (साइबर क्राइम एवं महिलाओं के विरुद्ध हिंसा- भाग-2)
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चित्रांगदा शर्मा और सुरभि करवा

यह लेख साइबर स्पेस और महिलाओं के विरुद्ध हिंसा श्रेणी में दूसरा लेख है। पिछले लेख में हमने साइबर स्टाकिंग की बात की थी। आज हम ऑनलाइन ट्रोलिंग और उससे सम्बंधित कानून पर चर्चा करेंगे।

क्या है साइबर स्टॉकिंग पर कानून, साइबर क्राइम एवं महिलाओं के विरुद्ध हिंसा- भाग-1

क्या है ट्रोलिंग

'ट्रोलिंग' का सीधे-सीधे शब्दों में अर्थ है किसी व्यक्ति को परेशान करने, खिझाने आदि उद्देश्यों से अपमानजनक सन्देश भेजना। ट्रोलिंग में जाति, लिंग, सेक्सुअल ओरिएंटेशन, धर्म आदि पूर्वाग्रहों के आधार पर व्यक्ति को टारगेट करना आदि शामिल है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने भी ट्रोलिंग की समस्या पर चिंता व्यक्त की थी। दरअसल इंटरनेट आपको अपनी पहचान और नाम गुप्त रखने की आज़ादी देता है। इसी बात का फायदा ट्रोल्स उठाते है।

ट्रोलिंग एवं पितृसत्ता

जैसा कि हमने पिछले लेखे में भी देखा था कि इंटरनेट साफ़ तौर पर एक जेंडर्ड स्पेस बनता जा रहा है। हालाँकि पुरुष, महिला आदि सभी ऑनलाइन ट्रोलिंग झेलते हैं लेकिन कई शोधों में यह पाया गया है कि महिलाएं अपने जेंडर के आधार पर खास तौर पर टारगेट की जाती है। महिलाओं की ऑनलाइन ट्रोलिंग सीधे उस मानसिकता का नतीजा है जो यह कहती है एक 'अच्छी' महिला को खुलकर, प्रभावशाली तरीके से नहीं बोलना चाहिए। महिलाओं की आवाज को नियंत्रित करके पुरुष प्रधानता स्थापित करने की सोच का सीधा ऑनलाइन ट्रोलिंग से सम्बन्ध है।

शोध में यह भी पाया गया है कि वे महिला जो कई आधारों पर भेदभाव झेलती है,ट्रोलिंग की ज्यादा शिकार होती है| दलित महिलाएं, नि: शक्त महिलाऍं जाति और अपनी क्षमताओं दोनों के नाम पर और अधिक ट्रोलिंग झेलती हैं। अमेरिका के सन्दर्भ में 84% अधिक सम्भावना है कि एक ब्लैक महिला का ज़िक्र एक गैर-मुनासिब ट्वीट में किया जायेगा। (इसे समझने के लिए आप इंटेरसेक्शनलिटी के मुद्दे की ओर ध्यान दे सकते हैं)

राणा अयूब, बरखा दत्त, कविता कृष्णन, शेहला राशिद से लेकर प्रियंका गाँधी, स्मृति ईरानी और दिवंगत सुषमा स्वराज सभी राजनैतिक विचारधाराओं की महिलाएं ऑनलाइन ट्रोलिंग से टारगेट की जा चुकी हैं

ट्रोलिंग और महिलाओं के मूल अधिकार

ट्रोलिंग सीधे व्यक्ति के मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव डालती है। मानसिक दबाव, चिंता, अनिद्रा आदि प्रभाव ट्रोलिंग से देखने को मिले है। मानसिक स्वास्थ्य व्यक्ति के जीने के अधिकार से सीधा सम्बन्ध रखता है।

दूसरा, ट्रोलिंग महिलाओं की बोलने की आजादी को रोकता है। एमनेस्टी इंटरनेशनल द्वारा 2017 में किये सर्वे के मुताबिक लगभग 76% महिलाएँ जिन्होंने ऑनलाइन ट्रोलिंग झेली ने अपने सोशल मीडिया इस्तेमाल करने के तरीके में बदलाव किया। टारगेट होने के भय से अपना अकाउंट बंद करना, सेल्फ सेंसरशिप जैसे परिणाम देखे जा सकते हैं।

तीसरा, ट्रोल्स कई बार शारीरिक तौर पर चोट पहुँचाने की धमकी देते हैं, ऐसे में ट्रोलिंग महिलाओं की शारीरिक सुरक्षा को भी खतरा है।

धारा 66A की भूमिका

श्रेया सिंघल बनाम भारत सरकार के मामले के पूर्व सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम 2000 की धारा 66A का इस्तेमाल ट्रोल्स के विरुद्ध किया जा सकता था. हालाँकि 2000 का यह अधिनियम मुख्यत: ई- कॉमर्स को बढ़ावा देने के लिए लाया गया था, लेकिन 2008 में इस अधिनियम में कुछ आपराधिक विधि सम्बंधित प्रावधान शामिल किये गए, धारा 66A उनमें से एक थी।.

धारा 66A मोटे तौर पर यह कहती है-

कोई व्यक्ति कंप्यूटर या संचार उपकरण के साधनों द्वारा -

(क) कोई ऐसी सूचना जो पूर्णत: आपराधिक या धमकी युक्त है, प्रेषित करता है या

(ख) वह जानता है कि सूचना झूठ/ मिथ्या है फिर भी असुविधा पैदा करने, सामने वाले को खिझाने, खतरे का भय पैदा करने, बाधा डालने, अपमान करने, हानि पहुँचाने, आपराधिक धमकी देने, दुश्मनी करने, द्वेषता फ़ैलाने या दुर्भावनावश, ऐसी सूचना कंप्यूटर या संचार उपकरण द्वारा प्रेषित करता है, या

(ग) इलेक्ट्रॉनिक मेल द्वारा खिझाने या असुविधा पैदा करने के उद्देश्य से या सन्देश के प्राप्तिकर्ता को सन्देश के स्त्रोत के बारे में गुमराह करने की दृष्टि से सन्देश भेजता है

तो यह दंडनीय अपराध होगा।

इस धारा को पढ़ने मात्र से साफ़ होता है कि यह बेहद अस्पष्ट प्रावधान है। अपनी अस्पष्ट भाषा के चलते यह इतना व्यापक प्रावधान था कि अभिव्यक्ति की आज़ादी को खतरा पहुँचा रहा था, इसीलिए सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रावधान को असंवैधानिक घोषित कर दिया और पूर्णत: समाप्त कर दिया।

धारा 66A न होने पर कौनसे प्रावधान में चार्ज किया जा सकता है?

धारा 66A को समाप्त किये जाने के कारण एक समस्या उत्पन्न हो गयी है। अब ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जिसके तहत ट्रोलिंग को सीधे तौर पर कवर किया जा सके।

अब ट्रोलिंग के कुछ पहलुओं को निम्न लिखित धाराओं में चार्ज किया जा सकता है-

(अ) अगर किसी महिला पर जातिगत टिप्पणी की जाए तो SC/ST एक्ट के तहत चार्ज किया जा सकता है।

(ब) अगर ट्रोल हत्या करने, बलात्कार करने की धमकी दे रहा है तो धारा 506 के तहत चार्ज किया जा सकता है।

(स) अगर बार-बार, लगातार (उदहारण के तौर पर हर पोस्ट पर) ट्रोल कर रहा है तो धारा 354D के तहत साइबर स्टाकिंग के लिए चार्ज किया जा सकता है।

(द) अगर किसी तरह से लैंगिक आभासी टिप्पणियाँ (sexually coloured remark) कर रहा है तो धारा 354A, IPC के तहत चार्ज किया जा सकता है।

(न) अगर महिला की प्राइवेट सूचनाएँ ऑनलाइन कोई ट्रोल लीक करें तो धारा 509, IPC के तहत चार्ज किया जा सकता है।

पर इन सब धाराओं के बावजूद कई बार ट्रोलिंग के हर पहलू को कवर नहीं किया जा सकता.

कहाँ करें शिकायत

गृह मंत्रालय ने नेशनल साइबर क्राइम रिपोर्टिंग पोर्टल अपनी वेबसाइट पर उपलब्ध कावाया है, जहाँ इन मामलों की शिकायत की जा सकते हैं। (देखिये- https://cybercrime.gov.in/ ) आप महिला एवं बाल कल्याण मंत्रालय के ईमेल- complaint-mwcd@gov.in पर भी शिकायत कर सकते हैं और निकटतम पुलिस साइबर सेल में भी शिकायत लिखवा सकते हैं। शिकायत करते समय यह ध्यान रखे कि आप भेजे गए मैसेज का स्क्रीन शॉट, व्यक्ति की आईडी आदि का स्क्रीन शॉट सबूत के तौर पर सुरक्षित रखें। आप राष्ट्रीय महिला आयोग के नंबर (0111-23219750) पर भी संपर्क कर सकते हैं।

(चित्रांगदा शर्मा और सुरभि करवा राष्ट्रीय विधि विश्विद्यालय, दिल्ली की पूर्व छात्राएँ हैं. लेख में प्रोफ. मृणाल सतीश ने मार्गदर्शन किया। )

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