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राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम, 1980 (NSA) भाग:1 अधिनियम का परिचय

Shadab Salim
16 Nov 2021 8:46 AM GMT
राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम, 1980 (NSA) भाग:1 अधिनियम का परिचय
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राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (National Security Act) एक निवारक अधिनियम है। इस आलेख के अंतर्गत इस अधिनियम का एक सारगर्भित परिचय दिया जा रहा है। अधिनियम को अपराध नामक रोग होने के पूर्व टीके के समान माना जा सकता है।

यह अधिनियम एक वैक्सीन है जो अपराध को होने के पहले ही रोकने का प्रयास करती है। इस प्रकार के अधिनियम मूल अधिकारों के संबंध में खतरनाक तो होते हैं परंतु एक शांत समाज, स्वच्छ वातावरण हेतु इस प्रकार के अधिनियमों की आवश्यकता भी है।

जब कोई व्यक्ति किसी समाज या राष्ट्र हेतु खतरा बनकर उभरता है, व्यवस्था को जिस व्यक्ति के कार्य या लोप के माध्यम से खतरा पैदा हो जाता है, ऐसे व्यक्ति की नजरबंदी राज्य द्वारा की जाना आवश्यक भी हो जाती है क्योंकि ऐसे व्यक्ति किसी भी राज्य के संबंध में खतरा पैदा कर सकते हैं तथा समाज को भयभीत कर सकते हैं। इन व्यक्तियों को निरुद्ध कर समाज को सुरक्षित किया जाता है।

भारत के संविधान का अनुच्छेद 21 व्यक्तियों को प्राण और दैहिक स्वतंत्रता प्रदान करता है परंतु अनुच्छेद 22(3) में प्रावधान निवारक निरोध के संबंध में उल्लेख करते हैं। किसी भी राज्य का यह कर्तव्य है कि राज्य सामूहिक हितों की रक्षा करें और ऐसी रक्षा करते समय उसे इस प्रकार के अधिनियम की आवश्यकता है।

यदि कोई व्यक्ति बार-बार अपराधों में संलिप्त है तथा वह आए दिन कोई न कोई अपराध कारित कर रहा है जिससे समाज में वैमनस्य फैल रहा है और नागरिकों के अधिकारों पर खतरा पैदा हो रहा है तब ऐसे व्यक्ति को निरुद्ध किए जाने का अधिकार राज्य को प्राप्त होता है क्योंकि यह राज्य की ही जिम्मेदारी है कि वह अपने नागरिकों के अधिकारों को सुरक्षित करें और उन्हें एक शांत वातावरण में जीवन यापन करने के अवसर प्रदान करें।

यह जिम्मेदारी राज्य को भारत के संविधान द्वारा दी गई है। राज्य अपने इस कर्तव्य को पूरा करने के उद्देश्य से ही उन लोगों को निरुद्ध करता है जिन लोगों द्वारा समाज को भयभीत किया जाता है तथा नागरिकों के अधिकारों पर अतिक्रमण किया जाता है।

भारत के उच्चतम न्यायालय द्वारा एक मामले में कहा गया है कि:-

निवारक कानून आपराधिक गतिविधियों को पूर्व में ही नियंत्रित रखने की विधि है, जो कि अपराध न होने देने के लिए प्रयुक्त की जाती है। इसका आपराधिक कार्यवाही से कोई संबंध नहीं है और न ही समानान्तर कार्यवाही है। निवारक कानून का ध्येय दण्डात्मक नहीं है, बल्कि किसी आपराधिक प्रवृत्ति पर रोक लगाना है। यह प्रशासनिक शक्ति एवं अधिकारों का सशक्त माध्यम है, जिसके द्वारा कार्यपालिका को किसी व्यक्ति के संबंध में यह विश्वास हो जाता है कि वह आपराधिक कार्य निरंतर कर रहा है या उसके किये जाने की प्रत्याशा है।

उसे निरोध आदेश द्वारा अपने कब्जे में रख कर आपराधिक गतिविधियों पर रोक लगाना है। प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा किसी व्यक्ति को निरुद्ध रखा जाना सावधानी के बतौर है और यह प्रशासनिक प्राधिकारी के विवेकाधिकार पर रखा गया है। उसे जहाँ भी समाज के हित में किसी व्यक्ति को निरुद्ध किया जाना आवश्यक प्रतीत हो, वह ऐसा कर सकेगा।

इन सभी उद्देश्यों को ध्यान में रखकर भारत की संसद द्वारा राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम, 1980 का निर्माण किया गया। यह अधिनियम उन लोगों को गिरफ्तार कर कारावास में निरुद्ध करने का अधिकार राज्य को देता है जो लोग समाज, व्यवस्था और राष्ट्र के लिए खतरा बन जाते हैं।

जैसे किसी व्यक्ति द्वारा बार-बार ऐसा अपराध कारित किया जा रहा है जो समाज को खंडित कर रहा है तथा समाज के लोगों के बीच वैमनस्य पैदा कर रहा है तथा राज्य को अपने दायित्व को पूरा नहीं करने दे रहा है उनके कार्यों में अड़चन पैदा कर रहा है ऐसे व्यक्ति को कारावास में निरुद्ध करने का अधिकार राज्य को समर्पित कर दिया गया है।

यह अधिनियम एक कार्यपालिका शक्ति है। यह ऐसी कार्यपालिका शक्ति है जो राज्य को समर्पित की गई है, कार्यपालिका अधिकारियों को समर्पित की गई है जिसके अधीन वे किसी भी व्यक्ति को बिना किसी अपराध के कारावास में निरुद्ध कर सकते हैं।

इसके लिए यह आवश्यक है कि ऐसे व्यक्ति द्वारा पूर्व में अनेक अपराध किए गए हो और ऐसे अपराध किए गए हो जो समाज के भीतर भय का वातावरण पैदा करते हैं। इस अधिनियम के अंतर्गत व्यक्ति को किसी अपराध के अधीन दोष सिद्ध कर दंडित नहीं किया जाता है अपितु बिना किसी अपराध के ही निरुद्ध किया जाता है।

अपराध होने के पूर्व निरुद्ध किया जाता है जब राज्य को यह लगने लगता है कि यह व्यक्ति किसी न किसी अपराध को कारित करेगा जिससे समाज और संस्थाओं और राष्ट्र को खतरा पैदा होगा तब राज्य ऐसे व्यक्तियों को निरुद्ध करता है।

इस अधिनियम के अंतर्गत लोक व्यवस्था की सुरक्षा की जाने में किसी भी व्यक्ति को आपराधिक क्रियाकलापों को केवल उसी स्थिति में विचार में लिया जा सकता है जबकि उसके द्वारा सामान्यतः लोक व्यवस्था को भंग किए जाने का कार्य किया जा रहा है। यह अपवाद स्वरूप प्रयुक्त की जाने वाली शक्तियां है और विशेष परिस्थितियों में ही किसी व्यक्ति को निरुद्ध किया जा सकता है।

न्यायालय द्वारा लोक व्यवस्था और विधि व्यवस्था में मौलिक अंतर करते हुए व्याख्या की गई है कि कानून व्यवस्था हमेशा सार्वभौमिक विषय है और विस्तृत है जबकि लोक व्यवस्था सीमित अर्थों में प्रयुक्त की जाने योग्य है। आम जीवन या समुदाय विशेष को अनुचित तरीके से प्रभाव डालने वाली कोई गतिविधि इसके अंतर्गत आती है। दोनों व्यवस्थाओं के अंतर्गत केवल श्रेणी का अंतर है।

कोई गतिविधि व्यक्ति को प्रभावित करती है या पूरे जन समुदाय को प्रभावित करती है उसके आधार पर ही कानून व्यवस्था और लोक व्यवस्था का निर्धारण किया जाएगा। निवारक निरोध के लिए किसी एक कृत्य पर विचार करते समय पूर्व में घटित घटनाओं को विचार में नहीं लिया जाएगा व्यक्ति को निरुद्ध किए जाने के लिए जो आधार बताए गए हैं वह निराधार होने से व्यक्ति को रिहा किया जा सकता है।

इससे यह स्पष्ट होता है कि भले किसी व्यक्ति द्वारा पूर्व में कोई अपराध न किए गए हो परंतु वर्तमान परिस्थितियां ऐसी है जहां किसी व्यक्ति द्वारा अपराध किए जाने की संभावना है वहां तो उस व्यक्ति को निरुद्ध किया जा सकता है।

निरुद्ध व्यक्ति को यह जानने का अधिकार है कि उसे समाज विरोधी आचरण के लिए किन आधारों पर असामाजिक बताया जा रहा है। किसी व्यक्ति को आबकारी मामले में गिरफ्तार किया गया और कई प्रकरण बनाए गए। दो मामलों में उसे जमानत पर रिहा किया गया और तीसरे मामले में जमानत दिए जाने की अत्यधिक संभावना है। केवल इस आधार पर किसी व्यक्ति को निवारक निरुद्ध नहीं किया जा सकता।

न्यायालय द्वारा अभिमत दिया गया कि निरोध अधिकारी की संतुष्टि समीक्षा उच्च न्यायालय द्वारा नहीं की जा सकती है और यह भी नहीं कहा जा सकता कि आबकारी अधिनियम के अंतर्गत किसी व्यक्ति को अभियुक्त बनाया गया वह असामाजिक व्यक्ति नहीं है उसे न्यायालय द्वारा उच्चारण के प्रक्रम पर दोषमुक्त भी किया जा सकता है। किसी व्यक्ति की दोष मुक्ति से उसका असामाजिक होना सिद्ध नहीं होता है। व्यक्ति को उसके आचरण के परिक्षेप में निरुद्ध किया जाता है। वह निवारक नजरबंदी का एकमात्र उद्देश्य है उसे अपराध कार्यों से रोकना।

विधि व्यवस्था और लोक व्यवस्था के मध्य अंतर किया जा सकता है। विधि का उल्लंघन किए जाने मात्र से केवल व्यवस्था प्रभावित होती है परंतु यह जन सामान्य को बड़े स्तर पर प्रभावित करने की स्थिति में लोक व्यवस्था का मामला बनता है। उसे यह माना जाता है कि लोक व्यवस्था को खतरा उत्पन्न हो गया है कोई भी कार्य जो जनजीवन को प्रभावित करता है लोक व्यवस्था भंग होने का आधार बनता है।

एक मामले में जिला मजिस्ट्रेट द्वारा निरोध आदेश पारित किया गया था जिसे याची ने चुनौती दी चुनौती का आधार यह लिया गया कि याची के विरुद्ध कुछ आपराधिक मामले में निश्चित किए गए और उसे दोषमुक्त किया गया। उसे दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराए गए। न्यायालय द्वारा अभिमत दिया गया कि इसके अंतर्गत जिला मजिस्ट्रेट का समाधान होना सर्वोपरि तथ्य है।

मजिस्ट्रेट द्वारा समाधान करते समय यह देखा जाएगा कि किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता लोक व्यवस्था बनाए रखने पर प्रतिकूल प्रभाव डालती है। अभिलेख पर यह तथ्य आया कि याची की छवि घोर अपराधी की है उसका आचरण सामाजिक जनजीवन को आतंकित करने वाला है। उसके मौजूद रहने मात्र से बाजार की दुकानें बंद हो चलेगी।

कई व्यक्ति घरों में छुपने के लिए विवश हैं। यह माना गया कि उसका आचरण लोक व्यवस्था को क्षति पहुंचाने का है। सलाहकार मंडल द्वारा निरोध आदेश की अभिपुष्टि की गई। निरोध आदेश समुचित आधारों पर होने से रिट याचिका को खारिज कर दिया गया।

इन मामलों के अध्ययन से यह मालूम होता है कि यह अधिनियम समाज और नागरिकों के अधिकारों कि सुरक्षा के उद्देश्य से बनाया गया है। राज्य का यह कर्तव्य है कि वह अपने नागरिकों के अधिकारों की सुरक्षा करें और कोई ऐसा व्यक्ति जो नागरिकों के अधिकारों का शत्रु बन गया है जो उन्हें किसी भी आधार पर अधिकारों को प्राप्त नहीं होने देना चाहता जैसे कि एक नागरिक का यह अधिकार है कि वह भयमुक्त वातावरण में रहकर कोई व्यापार करें और ऐसा व्यक्ति उस नागरिक को व्यापार करने से रोकता है तथा उससे अवैध वसूली करता है और नहीं देने पर हथियार से भयभीत करता है और विरोध करने पर हथियार चला देता है तब ऐसे व्यक्ति के प्रति इस प्रकार की प्रक्रिया को राज्य द्वारा अपनाया ही जाता है तथा यह सुनिश्चित किया जाता है कि भविष्य में अन्य व्यक्तियों के अधिकारों पर अतिक्रमण उस व्यक्ति द्वारा नहीं किया जा सके जिसने पूर्व में किसी व्यक्ति के अधिकारों का अतिक्रमण किया है।

इस अधिनियम का उद्देश्य अत्यंत पवित्र है। एक सार्थक उद्देश्य से यह अधिनियम बनाकर शक्तियां राज्य को सौंपी गई है परंतु यह कहना भी गलत नहीं होगा कि इस अधिनियम का उद्देश्य राजनीतिक स्वार्थों के अंतर्गत भी किया जाता रहा है परंतु ऐसे हर समय न्यायपालिका ने संज्ञान लेकर इस अधिनियम के उद्देश्य को स्पष्ट कर दिया और इसके पवित्र उद्देश्यों को पुनः निरंतर कर दिया क्योंकि न्यायपालिका का यह दायित्व बनता था यदि राज्य द्वारा किसी अधिनियम का द्वेषपूर्ण उपयोग किया जा रहा है तो राज्य को वहां निर्देशित किया जाए, राज्य को वहां रोका जाए, उसके द्वेषपूर्ण उद्देश्य को अवरुद्ध किया जाए तथा नागरिकों के अधिकारों को सुरक्षित किया जाए।

राज्य को भी इस अधिनियम का उपयोग करते समय इसके उद्देश्य का अवलोकन करना चाहिए तथा यह स्पष्ट कर लेना चाहिए कि जिस व्यक्ति को निरुद्ध किया जा रहा है क्या वह व्यक्ति यथार्थ में इस समाज और इस राष्ट्र के लिए खतरा है तथा क्या यथार्थ में वे नागरिकों के अधिकारों का अतिक्रमण कर रहा है।

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