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संविदा विधि (Law of Contract ) भाग 18 : उपनिधान की संविदा में उपनिहिती के क्या कर्तव्य होतें हैं (Duties of a Bailee)

Shadab Salim
7 Nov 2020 5:45 AM GMT
संविदा विधि (Law of Contract ) भाग 18 :  उपनिधान की संविदा में उपनिहिती के क्या कर्तव्य होतें हैं (Duties of a Bailee)
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संविदा विधि से संबंधित लाइवलॉ वेबसाइट पर उपलब्ध की जा रही इस सीरीज के आलेखों के अंतर्गत अब तक संविदा विधि के आधारभूत सिद्धांतों के साथ प्रत्याभूति की संविदा, क्षतिपूर्ति की संविदा तथा उपनिधान की संविदा के संदर्भ में सारगर्भित उल्लेख किया जाता चुका है। इस आलेख में उपनिधान की संविदा के अंतर्गत एक उपनिहिती के कर्तव्यों पर विवेचना की जा रही है। पिछले आलेख में उपनिधान की संविदा क्या होती है इस संदर्भ में विवेचना की गई थी तथा यह आलेख दूसरा आलेख है। यदि पाठकगण आलेख 18 का अध्ययन करना चाहते हैं तो इसके साथ आलेख 17 का अध्ययन पहले करें क्योंकि आलेख 18 आलेख 17 के साथ सहपाठित आलेख है।

उपनिहिती के कर्तव्य (Duties of a Bailee)

उपनिधान की संविदा के अंतर्गत उपनिहिती और उपनिधाता के बीच संविदा होती है। किसी कार्य के प्रयोजन हेतु इस प्रकार की संविदा का निर्माण किया जाता है तथा उस कार्य के पूरा हो जाने के पश्चात संविदा के अंतर्गत दी गई वस्तु उपनिहिती द्वारा वापस लौटा दी जाती है।

जैसे कि किसी साइकिल स्टैंड पर साइकिल रखने वाला उपनिधाता होता है तथा उस स्टैंड का मालिक उपनिहिती होता है। जितने समय तक साइकिल को स्टैंड पर रखने की संविदा होती है उस समय के पूरा हो जाने के बाद साइकिल स्टैंड का मालिक साइकिल को उसके मूल मालिक को सौंप देता है। इस प्रकार की संविदा उपनिधान की संविदा होती है। आज व्यापारिक युग में अनेकों इस प्रकार की संविदा देखने को मिलती है। जो वस्तु का प्रदान करता है उसे उपनिधाता कहा जाता है तथा जिसे वस्तु प्रदान की जाती है वे उपनिहिती कहलाता है। उपनिहिती के कुछ कर्तव्य होते हैं जिनका पालन करने के लिए बाध्य होता है। भारतीय संविदा अधिनियम 1872 की धारा 151 के अंतर्गत उपनिहिती के कर्तव्यों का उल्लेख किया गया है जो अग्रलिखित है-

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 151 हालांकि स्पष्ट रूप से एक उपनिहिती के कर्तव्यों का उल्लेख तो नहीं करती है परंतु इस धारा के अंतर्गत लगभग समस्त कर्तव्यों का उल्लेख कर भी दिया गया है। यह धारा उपनिहिती द्वारा बरती जाने वाली सतर्कता के नाम से उल्लेखित की गई है। यह धारा उपनिधान की सभी दशाओं में उपनिहिती द्वारा बरते जाने वाली सतर्कता पर बल देती है। इसके अनुसार उपनिधान की सभी दशाओं में उपनिहिती अबाध्य है कि वह अपने को उपनिहित माल के प्रति उसी प्रकार की और वैसी सतर्कता बरतें जैसे कि मामूली बुद्धि विवेक वाला मनुष्य समय एवं परिस्थितियों के अनुसार अपने ऐसे माल के प्रति बरतेगा जो उसी के किसी परिणाम,क्वालिटी और मूल्य का हो अर्थात इस धारा का विस्तार रूप उपनिहिती द्वारा बरती जाने वाली सतर्कता अथवा सावधानी के प्रति है।

धारा 151 उपनिहिती का युक्तियुक्त सावधानी के कर्तव्य का उपबंध करती है। उपनिहिती का यह कर्तव्य है कि अपने हित माल के प्रति युक्तियुक्त सावधानी बरतें, उससे यह भी अपेक्षा की जाती है कि वह उसकी युक्तियुक्त रूप में देखभाल करें।

ब्राइस बनाम क्रिश्चियनिटी 1928 (44) एलआर 332 के प्रकरण में यह स्पष्ट कहा गया है कि यह धारा उपनिहिती का युक्तियुक्त सावधानी के कर्तव्य का उपबंध करती है।

बांबे स्टीम नेवीगेशन कंपनी बनाम वासुदेव 1928 (52) बॉम्बे, बॉम्बे 37 के मामले में न्यायालय ने यह विचार व्यक्त किया कि उपनिधान से संबंधित प्रत्येक दशाओं में उपनिहिती अबाध्य है कि वह अपने को उपनिहित माल के प्रति उसी प्रकार की सतर्कता बरतें जैसी मामूली प्रज्ञा वाला व्यक्ति वैसी ही परिस्थितियों में अपने ऐसे माल के प्रति बरतता है।

यह धारा वह मानक सुनिश्चित करती है जिसके अनुसार उपनिहिती सामान्य कर्तव्य को धारित करता है। जिसका संबंध युक्तियुक्त सावधानी से है, वह उपनिधान की सभी दशाओं से आबद्ध है और उससे यह अपेक्षा की जाती है कि वह उपनिहित किए गए माल के प्रति वही सतर्कता बरतें जिस प्रकार मामूली प्रज्ञावान मनुष्य उक्त परिस्थितियों में उक्त सतर्कता से युक्त समझा जाता है किंतु वह सतर्कता उपनिहित माल के परिणाम, क्वालिटी और मूल्य में सार रखती हैं।

धारा 151 का अध्ययन करने से कुछ तथ्य निकल कर सामने आते हैं जिनको इस प्रकार रखा जा सकता है-

1)- उपनिहिती द्वारा युक्तियुक्त सावधानी बरती जानी चाहिए।

2)- उपनिधान की सभी दशाओं में वह आबद्ध है।

3)- उसकी सतर्कता सामान्य प्रज्ञा वाले व्यक्ति की भांति हो।

4)- युक्तियुक्त सावधानी परिस्थितियों के अनुरूप हो।

5)- वह सावधानी परिणाम के सापेक्ष हो।

6)- वह सावधानी क्वालिटी के संदर्भ में हो।

इन तथ्यों पर यह कहा जा सकता है कि उपनिहिती द्वारा युक्तियुक्त सावधानी बरतीं जानी चाहिए। यह सावधानी मामले की परिस्थितियों के अनुरूप होना चाहिए। हर मामले में सिद्धांत लागू नहीं होता है जैसे कि यदि किसी स्कूटर को सुधारने के लिए मैकेनिक को सौंपा गया है तथा मैकेनिक ने स्कूटर को बगैर लॉक किए खुली सड़क पर पटक दिया तथा व स्कूटर चोरी हो गया कोई भी प्रज्ञा वान व्यक्ति अपने किसी स्कूटर को इस प्रकार खुली सड़क पर नहीं छोड़ेगा तो यहां पर प्रज्ञा का अर्थ इस बात से लगाया जा सकता है कि मैकेनिक अपने मालिकाना हक के स्कूटर के प्रति कैसी सतर्कता बरतता।

सरस्वती कुंवर बनाम बद्री प्रसाद 1916 (36) आईसी 31 के प्रकरण में कहा गया है कि जहां प्रतिवादी ने धन बॉक्स के माध्यम से उपनिधान किया था जो कि बंद था वहां उक्त बंद बॉक्स के संदर्भ में धन की हानि के लिए प्रतिवादी को उत्तरदायीं नहीं ठहराया जा सकता।

जुगनी लाल कमलापति ऑयल मिल्स बनाम यूनियन ऑफ इंडिया 1976 (1) सीसी एआईआर 1976 एससी 227 के प्रकरण में कहा गया है कि कोई व्यक्ति किसी धोबी को अपने कपड़े आदि धुलने के उद्देश्य से देता है और धोबी से अपेक्षा करता है कि वह उसे सुरक्षित रखेगा यदि वह किसी भी प्रकार की लापरवाही का बर्ताव करता है तो ऐसी स्थिति में वह उक्त बर्ताव के लिए स्वयं उत्तरदायीं होगा।

सुंदरलाल बनाम रामस्वरूप एआईआर 1952 इलाहाबाद (205) के प्रकरण में कोई दुकान किराए पर ली गई थी जो लकड़ी की बनी थी। एक लिखित करार के अंतर्गत उक्त दुकान को उसी हालत में लौटने की भी प्रतिज्ञा शामिल थी। करार में यह भी उपबंध किया गया था कि दुकान को होने वाली क्षति के लिए किराए पर लेने वाला व्यक्ति उत्तरदायीं होगा। शहर में सांप्रदायिक तनाव फैल गया और दंगा हो गया और इसके परिणामस्वरूप दंगाई भीड़ में उक्त दुकान में आग लगा दी जिससे वह दुकान जलकर नष्ट हो गई।

इस पर न्यायालय ने निर्णय दिया कि किराए पर लेने वाले की असावधानी के बिना दुकान को ऐसी घटनाओं के कारण क्षति हुई है जो उसके नियंत्रण में नहीं थी और इस लिए उपयुक्त प्रकार की क्षति के लिए प्रतिवादी दायीं नहीं था।

शांतिलाल बनाम ताराचंद्र एआईआर 1973 इलाहाबाद (158) के प्रकरण में गोदाम में खदान रखा हुआ था यह गोदाम उपनिहिती के कब्जे में था। नगर में संभावित तरीके से प्रबल रूप में बाढ़ आ गई जिससे खदान में क्षति हुई। इस पर न्यायालय ने कहा कि उपनिहिती इसके लिए उत्तरदायीं नहीं है।

जगदीश चंद्रा बनाम पी एन बी एआईआर 1998 दिल्ली 266 के प्रकरण में उपनिहिती की उपेक्षा के कारण अथवा उपनिहिती की असावधानी के कारण वादी के माल की क्षति होती है तो ऐसी स्थिति में प्रतिवादी को उक्त माल की नुकसानी के संदर्भ में दायीं ठहराया जाएगा।

जहां उपनिधाता और उपनिहिती संविदा के अंतर्गत यह उपबंध कर सकते हैं की उपनिहिती की असावधानी के कारण होने वाली हानि के लिए वह दायीं नहीं होगा अर्थात वह दायित्व से मुक्त होगा अर्थात विशेष संविदा द्वारा उपनिहिती अपनी असावधानी के कारण होने वाली हानि से छुटकारा प्राप्त कर सकता है परंतु इस प्रकार की एक विशेष संविदा होना चाहिए।

आकस्मिक घटना से होने वाली हानि

कुछ घटनाएं ऐसी होती है जो प्राकृतिक होती है। उन घटनाओं पर मनुष्य का कोई निर्णय नियंत्रण नहीं होता है। यह बिल्कुल अप्रत्याशित घटना होती है, इस प्रकार की अप्रत्याशित घटना के घटित होने के परिणामस्वरूप कोई हानि हो जाती है तो ऐसी स्थिति में उक्त प्रकार की क्षति के लिए प्रतिवादी दायीं होगा परंतु इसके लिए एक सिद्धांत है।

प्रतिवादी केवल उन्हीं हानियों के लिए उत्तरदायीं ठहराया जा सकता है जिसके अंतर्गत वह-

अपने प्रयास से हानि को बचा सकता था।

जिनका सुरक्षित कर लिया जाना युक्तिसंगत प्रयास के द्वारा उचित और न्यायसंगत हो।

प्रतिवादी ने यथोचित प्रयास किया हो।

प्रतिवादी के द्वारा प्रयास करने के बावजूद भी वादी के माल को हानि से बचाया जाना संभव न रहा हो।

प्रतिवादी यदि प्रयास किया गया था किंतु विधि व्यवस्था के निर्धारित होने से उनका प्रयास सार्थक हुआ हो।

ब्रिटिश एंड फॉरेन इंश्योरेंस कंपनी बनाम इंडिया जनरल नेवीगेशन एंड रेलवे कंपनी 1910 कोलकाता 28 के मामले में कहा गया है कि जहां देवी प्रकोप जैसे भूकंप, अतिवृष्टि, सूखा, बाढ़, विद्युत आघात एवं अन्य प्राकृतिक आपदा हो वहां पर प्रतिवादी वादी के माल को हुई हानि के लिए उत्तरदायीं नहीं होता है।

इसी प्रकरण में यह भी कहा गया है कि किसी प्रशासनिक अथवा सरकारी विधि व्यवस्था संबंधित फेरबदल, शासन संबंधी नीतियों के फेरबदल के परिणाम यदि किसी प्रकार की हानि होती है तो उसमें भी प्रतिवादी वादी की नुकसानी के लिए उत्तरदायीं नहीं होता है।जैसे कि अभी हाल ही में कोरोना संक्रमण के कारण लॉक डाउन की कार्यवाही की गई तथा इसमें अनेकों नुकसान भी हुए हैं, कोई भी इस प्रकार के लॉक डाउन के अंतर्गत होने वाली नुकसानी के लिए उत्तरदायीं नहीं होता है।

कोई भी उपनिहिती जिसे माल उपनिहित किया गया है उक्त माल की देखभाल करने हेतु दायीं होता है। यदि वह माल खो जाता है तो ऐसी स्थिति में प्रसारित उपधारणा की जाती है कि उक्त संदर्भ में निश्चित कोई लापरवाही बरतीं गई होगी।

रामलाल बनाम मोरिया एंड कंपनी 1899 (22) इलाहाबाद 164 के प्रकरण में न्यायाधीश द्वारा कहा गया है यदि कोई कार्य क्षति इस प्रकार की है कि वह घटनाओं के सामान्य अनुक्रम में हो तो ऐसी स्थिति में यदि उपनिहिती द्वारा उक्त प्रकार की क्षति को निर्धारित करने के यथासंभव प्रयास किए है तो वह उक्त क्षति के लिए दायीं न होगा किंतु यदि उसने ऐसा उचित रूप से न तो कोई प्रयास किया था कि उक्त हानि को रोका जा सकें और न ही उसका वैसा कोई आशय हो कि वह हानि को रोकना चाहता है या हानि को नियमित करना चाहता है तो ऐसी स्थिति में वह वादी के माल को क्षति के लिए दायीं होगा। यहां पर यह समझना चाहिए कि यदि अपने ध्यान में कोई क्षति होती है तो न्यायालय सर्वप्रथम तो यह उपधारणा करके चलता है कि कोई न कोई लापरवाही बरतीं गई होगी। अब यदि उपनिहिती सिद्ध कर देता है कि उसने क्षति को रोकने के समस्त प्रयास किए परंतु फिर भी क्षति हो गई तो ऐसी परिस्थिति में उत्तरदायीं नहीं होगा। क्षति को रोकने के प्रयासों का सिद्ध करने का भार उपनिहिती के ऊपर होता है।

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