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जानिए सिविल अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1955 के दाण्डिक प्रावधान

Shadab Salim
31 Oct 2021 7:45 AM GMT
जानिए सिविल अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1955 के दाण्डिक प्रावधान
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अस्पृश्यता भारत की प्रमुख समस्या रही है। भारतीय समाज जातियों में बंटा हुआ समाज है। जहां अलग-अलग जातियां निवास करती हैं। सभी जातियों के क्रियाकलाप भी अलग-अलग हैं। अनेक मौकों पर उनकी संस्कृति में भी पृथकता प्रतीत होती है। जातियों में ऊंची जाति तथा नीची जाति का भेद रहा है। इस भेद के परिणाम स्वरुप ही अस्पृश्यता का जन्म हुआ। एक मनुष्य को छूने तथा उससे संबंधित वस्तुओं को छूने से धर्म के भ्रष्ट हो जाने जैसी अवधारणा भी भारत में रही है।

संविधान में स्पष्ट उल्लेख कर छुआछूत को खत्म करने के लिए प्रावधान किए गए और इसके साथ ही एक आपराधिक कानून भी बनाया गया जिसका नाम 'सिविल अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1955'

यह कानून 8 मई 1955 को बनकर तैयार हुआ। इस कानून के अंतर्गत कुछ ऐसे कार्यों को अपराध घोषित किया गया जो छुआछूत से संबंधित है। इस प्रथक विशेष कानून को बनाए जाने का उद्देश्य छुआछूत का अंत करना तथा छुआछूत को प्रसारित करने वाले व्यक्तियों को दंडित करना था।

इस अधिनियम का विस्तार संपूर्ण भारत पर है। इस समय अधिनियम संपूर्ण भारत पर विस्तारित होकर अधिनियमित है और इसके दाण्डिक प्रावधान उन जातियों के अधिकारों को सुरक्षित कर रहे हैं जिन्हें छुआछूत का शिकार बनाया जाता रहा था।

इस आलेख के अंतर्गत उन दाण्डिक प्रावधानों का उल्लेख किया जा रहा है जो निम्नलिखित है:-

सिविल अधिकार संरक्षण अधिनियम 1955 की निम्न धाराएं अपराधियों का उल्लेख करती है तथा उनसे संबंधित दंड का प्रावधान करती है-

धारा-3

धार्मिक निर्योग्यताएं लागू करने के लिए दंड:-

जो कोई किसी व्यक्ति को (क) किसी ऐसे लोक पूजा-स्थान में प्रवेश करने से, जो उसी धर्म को मानने वाले या उसके किसी विभाग के अन्य व्यक्तियों के लिए खुला हो, जिसका वह व्यक्ति को, अथवा (ख) किसी लोक पूजा-स्थान में पूजा या प्रार्थना या कोई धार्मिक सेवा अथवा किसी पुनीत तालाब, कुएँ, जलस्त्रोत या [जल-सरणी, नदी या झील में स्थान या उसके जल का उपयोग या ऐसे तालाब, जल-सरणी, नदी या झील के किसी घाट पर स्नान] उसी रीति से और उसी विस्तार तक करने से, जिस रीति से और जिस विस्तार तक ऐसा करना उसी धर्म के मानने वाले या उसके किसी विभाग के अन्य व्यक्तियों के लिए अनुज्ञेय हों, जिसका वह व्यक्ति हो:-

"अस्पृश्यता" के आधार पर निवारित करेगा [ वह कम से कम एक मास और अधिक से अधिक छह मास की अवधि के कारावास से और ऐसे जुर्माने से, भी जो कम से कम एक सौ रुपये और अधिक से अधिक पांच सौ रुपये तक का हो सकेगा, दण्डनीय होगा।]

स्पष्टीकरण-इस धारा और धारा 4 के प्रयोजनों के लिए बौद्ध, सिक्ख या जैन धर्म के मानने वाले व्यक्ति हिन्दू धर्म के किसी भी रूप या विकास को मानने वाले व्यक्ति, जिनके अन्तर्गत वीरशैव, लिंगायत, आदिवासी, ब्राह्मी समाज, प्रार्थना समाज, आर्य समाज और स्वामी नारायण सम्प्रदाय के अनुयायी भी हैं, हिन्दू समझे जाएंगे।

धारा 4:-

सामाजिक निर्योग्यताएं लागू करने के लिए दंड:-

जो कोई किसी व्यक्ति के विरुद्ध निम्नलिखित के संबंध में कोई निर्योग्यता "अस्पृश्यता" के आधार पर लागू करेगा वह कम से कम एक मास और अधिक से अधिक छह मास की अवधि के कारावास से और ऐसे जुर्माने से भी, जो कम से कम एक सौ रुपये और अधिक से अधिक पाँच सौ रुपये तक का हो सकेगा, दंडनीय होगा।

(i) किसी दुकान, लोक उपहारगृह, होटल या लोक मनोरंजन स्थान में प्रवेश करना; अथवा

(ii) किसी लोक उपहारगृह, होटल, धर्मशाला, सराय या मुसाफिरखाने में, जनसाधारण, या [ उसके किसी विभाग के] व्यक्तियों के, जिसका वह व्यक्ति हो, उपयोग के लिए रखे गये किन्हीं बर्तनों और अन्य वस्तुओं का उपयोग करना; अथवा

(iii) कोई वृत्ति करना या उपजीविका [ या किसी काम में नियोजन]; अथवा

(iv) ऐसी किसी नदी, जलधारा, जलस्त्रोत, कुएं, तालाब, हौज, पानी के नल या जल के अन्य स्थान का या किसी स्नानघाट, कब्रस्तान या श्मशान, स्वच्छता संबंधी सुविधा, सड़क या रास्ते या लोक अभिगम के अन्य स्थान का, जिसका उपयोग करने के लिए या जिसमें प्रवेश करने के जनता के अन्य सदस्य, या [ उसके किसी विभाग के] व्यक्ति जिसका यह व्यक्ति हो, अधिकारवान् हो, उपयोग करना या उसमें प्रवेश करना; अथवा

(v) राज्य निधियों से पूर्णत: या अंशतः पोषित पूर्व या लोक प्रयोजन के लिए उपयोग में लाये जाने वाले या जन-साधारण के या 5[उसके किसी विभाग के व्यक्तियों के जिसका वह व्यक्ति हो,

उपयोग के लिए समर्पित स्थान का उपयोग करना या उसमें प्रवेश करना; अथवा (vi) जन साधारण या 6[ उनके किसी विभाग के] व्यकियों के जिसका वह व्यक्ति हो, फायदे के लिए सृष्ट किसी पूर्त न्यास के अधीन किसी फायदे या उपभोग करना; अथवा

(vii) किसी सार्वजनिक सवारी का उपयोग करना या उसमें प्रवेश करना; अथवा (viii) किसी भी परिक्षेत्र में, किसी निवास परिसर का सन्निर्माण, अर्जन या अधिभोग करना; अथवा

(ix) किसी ऐसे धर्मशाला, सराय या मुसाफिरखाने का, जो जनसाधारण या [उसके किसी विभाग के] व्यक्तियों के लिए, जिसका वह व्यक्ति हो, खुला हो, उपयोग ऐसे व्यक्ति के रूप में करना; अथवा

(x) किसी सामाजिक या धार्मिक रूढ़ि, प्रथा या कर्म का अनुपालन 2 [ या किसी धार्मिक, या सांस्कृतिक जुलूस में भाग लेना या ऐसा जुलूस निकालना]: अथवा

(xi) आभूषणों एवं अलंकारों का उपयोग करना।

[स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए, "कोई निर्योग्यता लागू करना" के अन्तर्गत के आधार पर विभेद करना है।]

धारा-5

अस्पतालों आदि में व्यक्तियों को प्रवेश करने से इंकार करने के लिए दंड:-

जो कोई "अस्पृश्यता" के आधार पर

(क) किसी व्यक्ति को किसी अस्पताल, औषधालय, शिक्षा संस्था या में, यदि वह अस्पताल, औषधालय, शिक्षा संस्था या छात्रावास जन-साधारण या उसके किसी विभाग के फायदे के लिए स्थापित हो या चलाया जाता हो, प्रवेश करने देने से इंकार करेगा,

(ख) पूर्वोक्त संस्थाओं में से किसी में प्रवेश के पश्चात् ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध कोई विभेद पूर्ण कार्य करेगा।

[ वह कम से कम एक मास और अधिक से अधिक छह मास की अवधि के कारावास से और ऐसे जुमनि से भी, जो कम से कम एक सौ रुपये और अधिक से अधिक पाँच सौ रुपये का हो सकेगा, दंडनीय होगा।]

धारा-6

माल बेचने या सेवा करने से इंकार के लिए दंड:-

जो कोई उसी समय और स्थान पर और वैसे ही निबन्धनों और शर्तो पर, जिस पर कारवार के साधारण अनुक्रम में अन्य व्यक्तियों को ऐसा माल बेचा जाता है या उसकी सेवा की जाती है, किसी व्यक्ति को कोई माल बेचने या उसकी सेवा करने से "अस्पृश्यता" के आधार पर इंकार करेगा, 6 [ वह कम से कम एक मास और अधिक से अधिक छह मास की अवधि के कारावास से और ऐसे जुमाने से भी, जो कम से कम एक सौ रुपये और अधिक से अधिक पाँच सौ रुपये का हो सकेगा, दंडनीय होगा। ]

धारा-7

"अस्पृश्यता" से उद्भूत अन्य अपराधों के लिए दंड:-

(1) जो कोई

(क) किसी व्यक्ति को संविधान के अनुच्छेद 17 के अधीन " अस्पृश्यता" के अन्त होने से उसका प्रोद्भूत होने वाले किसी अधिकार का प्रयोग करने से निवारित करेगा; अथवा (ख) किसी व्यक्ति को किसी ऐसे अधिकार के प्रयोग में उत्पादित करेगा, क्षति पहुंचाएगा, शून्य करेगा, बाधा डालेगा या बाधा कारित करने का प्रयत्न करेगा या किसी व्यक्ति के, कोई ऐसा अधिकार प्रयोग करने के कारण उसे उत्पीड़ित करेगा, क्षति पहुंचायेगा, क्षुब्ध करेगा; अथवा (ग) किसी व्यक्ति या व्यक्ति-वर्ग या जन-वर्ग या जन-साधारण को बोले गए या लिखित शब्दों द्वारा या संकेतों द्वारा दृश्यरूपेणों द्वारा या अन्यथा किसी भी रूप में " अस्पृश्यता" का आचरण रखने के लिए उदीप्त या प्रोत्साहित करेगा; या

2- [ (घ) अनुसूचित जाति के सदस्य का "अस्पृश्यता" के आधार पर अपमान करेगा, या अपमान करने का प्रयत्न करेगा, ] [ वह कम से कम एक मास और अधिक से अधिक छह मास की अवधि के कारावास से और ऐसे जुमाने से भी, जो कम से कम एक सौ रुपये और अधिक से अधिक पाँच सौ रुपये का हो सकेगा, दंडनीय होगा।]

[ स्पष्टीकरण-1] - किसी व्यक्ति के बारे यह समझा जाएगा कि वह अन्य व्यक्ति का बहिष्कार करता है जब वह (क) ऐसे अन्य व्यक्ति को कोई गृह भूमि पट्टे पर देने से इंकार करता है या ऐसे अन्य व्यक्ति को किसी गृह या भूमि के उपयोग या अधिभोग के लिए अनुज्ञा देने से इंकार करता है या ऐसे व्यक्ति के साथ व्यवहार करने से, उसके लिए भाड़े पर काम करने से उसके साथ कारबार करने से पा उसकी कोई रूढ़िगत सेवा करने से या उससे कोई रूढ़िगत सेवा लेने से इंकार करता है या उक्त बातों में से किसी ऐसे निबन्धनों पर करने से इंकार करता है, जिन पर ऐसी बातें कारबार के साधारण अनुक्रम में सामान्यतः की जाती है, अथवा (ख) ऐसे सामाजिक, वृत्तिक या कारवारी संबंधों में विरत रहता है, जैसे वह ऐसे अन्य व्यक्ति के साथ साधारणतया बनाये रखता है।

[ स्पष्टीकरण 2-खण्ड (ग) के प्रयोजनों के लिए यदि कोई व्यक्ति:-

(i) प्रत्यक्षतः या अप्रत्यक्षतः " अस्पृश्यता" का या किसी रूप में इसके आचरण का प्रचार करेगा, अथवा

(ii) किसी रूप में अस्पृश्यता" के आचरण को, चाहे ऐतिहासिक, दार्शनिक या धार्मिक आधारों पर या जाति व्यवस्था की किसी परम्परा के आधार पर या किसी अन्य आधार पर न्यायोचित ठहरायेगा। तो उसके बारे में यह समझा जाएगा कि वह "अस्पृश्यता" के आचरण को उद्दीप्त या प्रोत्साहित करता है।

[ (1-क) जो कोई किसी व्यक्ति के शरीर या उसकी सम्पत्ति के विरुद्ध कोई अपराध उसके द्वारा किसी ऐसे अधिकार, जो संविधान के अनुच्छेद 17 के अधीन " अस्पृश्यता" का अन्त करने के कारण उसे प्रोद्भूत हुआ है, प्रयोग किये जाने के प्रतिशोध के रूप में या बदला लेने की भावना से करेगा, वह जहाँ अपराध दो वर्ष से अधिक की अवधि के कारावास से दंडनीय है, वहाँ कम से कम दो वर्ष की अवधि के कारावास से और जुर्माने से भी, दंडनीय होगा।]

(2) जो कोई इस आधार पर कि ऐसे व्यक्तियों ने "अस्पृश्यता" का आचरण करने से इंकार किया है या ऐसे व्यक्ति ने इस अधिनियम के उद्देश्यों को अग्रसर करने में कोई कार्य किया है

(i) अपने समुदाय के या उसके किसी विभाग के किसी व्यक्ति को किसी ऐसे अधिकार या विशेषाधिकार से वंचित करेगा, जिसके लिए ऐसे व्यक्ति ऐसे समुदाय या विभाग के सदस्य के तौर पर हकदार हों, अथवा

(ii) ऐसे व्यक्ति को जातिच्युत करने में कोई भाग लेगा,

[वह कम से कम एक मास और अधिक से अधिक छह मास की अवधि के कारावास से और ऐसे जुर्माने से भी, जो कम से कम एक सौ रुपये और अधिक से अधिक पाँच सौ रुपये का हो सकेगा, दंडनीय होगा।]

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