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क्या कोई ऐसा व्यक्ति जो वक़ील नहीं है, अदालत में किसी मुक़दमे की पैरवी कर सकता है? जानिए क्या कहता है कानून

LiveLaw News Network
23 Nov 2019 11:15 AM GMT
क्या कोई ऐसा व्यक्ति जो वक़ील नहीं है, अदालत में किसी मुक़दमे की पैरवी कर सकता है? जानिए क्या कहता है कानून
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क्या कोई ग़ैर-वक़ील व्यक्ति किसी मुक़दमादार की पैरवी करने के लिए क़ानून की अदालत में पेश हो सकता है? या क्या कोई मुक़दमादार किसी ऐसे व्यक्ति को अदालत में अपनी पैरवी करने के लिए कह सकता है जो वक़ील नहीं है? इस आलेख में इन्हीं बातों को स्पष्ट किया गया है।

क़ानूनी व्यवस्था

एडवोकेट्स एक्ट की धारा 30 में कहा गया है कि ऐसा कोई भी वक़ील जिसका नाम राज्य की सूची में शामिल है उसे सुप्रीम कोर्ट सहित किसी भी अदालत में किसी भी ट्रिब्यूनल या व्यक्ति जिसको क़ानूनी तौर पर सबूत लेने को अधिकृत किया गया है, के समक्ष या प्रैक्टिस करने का अधिकार है और किसी भी अन्य अथॉरिटी या व्यक्ति के समक्ष इस तरह के वक़ील को किसी क़ानून के द्वारा या उसके तहत थोड़े समय के लिए प्रैक्टिस करने की छूट दी गई है। धारा 33 इस अधिकार को यह कहते हुए दुहराता है कि किसी भी व्यक्ति को किसी अदालत या किसी अथॉरिटी के समक्ष प्रैक्टिस करने की इजाज़त नहीं होगी, जब तक कि वह एक एडवोकेट के रूप में पंजीकृत नहीं है। धारा 29 में कहा गया है कि एडवोकेट एकमात्र ऐसे मान्यता प्राप्त व्यक्ति हैं जिन्हें क़ानून के प्रैक्टिस का अधिकार है।

हालांकि, धारा 32 किसी भी अदालत, अथॉरिटी या व्यक्ति को यह अधिकार देता है कि वह ऐसे व्यक्ति जो इस अधिनियम के तहत एडवोकेट के रूप में पंजीकृत नहीं है, को अपने या उसके समक्ष किसी विशेष मामले में पैरवी की इजाज़त दे सकता है।

ग़ैर-वक़ील पेश हो सकते हैं अगर अदालत अनुमति दे

सुप्रीम कोर्ट ने हरिशंकर रस्तोगी बनाम गिरधारी शर्मा, AIR 1978 SC 1019 मामले में इस प्रश्न का उत्तर दिया है। इस फ़ैसले में शीर्ष अदालत ने कहा -

"कोई निजी व्यक्ति जो वक़ील नहीं है, को अदालत में पेश होने और किसी पक्षकार की ओर से पैरवी करने का अधिकार नहीं है, उसे इसके लिए अदालत की पूर्व अनुमति लेनी होगी और इसके लिए पक्षकार को ही पहल करनी होगी। इसकी अनुमति देना या नहीं देना यह अदालत की इच्छा पर है। ऐसा भी हो सकता है कि अदालत इसकी अनुमति देने के बाद बीच में ही इसे वापस ले ले अगर उसको लगता है कि प्रतिनिधि कोई नींदनीय काम कर रहा है। इसकी अनुमति देने या इंकार करने से पहले संबंधित व्यक्ति के बारे में जानकारी, उसका संबंध, किसी निजी व्यक्ति की सेवा लेने की अनुमति की वजह और अन्य परिस्थितियों के बारे में सूचनाएं इकट्ठी की जानी चाहिए।"

इस तरह दंड प्रक्रिया संहिता 1973 (सीआरपीसी) की धारा २ (q) पर ग़ौर किया गया जिसमें वक़ील, परिभाषा के अनुरूप, ऐसा व्यक्ति जिसको क़ानून ने किसी अदालत में क़ानून की प्रैक्टिस के लिए अधिकृत किया है के अलावा ऐसा कोई भी व्यक्ति हो सकता है अगर उसे अदालत की अनुमति से किसी विशेष मामले में शिरकत करने के लिए नियुक्त किया जाता है।

न्यायमूर्ति वीआर कृष्ण अय्यर ने इस बारे में कहा :


"अगर ऐसा है भी, तो क्या यह उस पक्ष पर निर्भर नहीं करता जो कि किसी कारण से अपना केस ठीक तरीक़े से पेश नहीं कर सकता, कि वह इसके बदले किसी अन्य व्यक्ति की मदद ले? इस आग्रह को ठुकराना कुछ विशेष मामलों में न्याय से पूरी तरह इंकार करना हो सकता है, विशेषकर एक ऐसे देश में जहां निरक्षरता और ग़रीबी है, जबकि न्यायिक प्रक्रिया बहुत ही उन्नत प्रकृति की है। यही कारण है कि विधायी नीति में इसका ध्यान रखा गया है और इस तरह की ज़रूरतें पूरी की गई हैं।


सीआरपीसी की धारा 302, 303 और 304 विधायिका की इस नीतियों को दर्शाती है। मुझे नहीं लगता कि इस अदालत में हमें पक्षकार के अलावा किसी व्यक्ति के प्रतिनिधित्व की व्यवस्था को उस स्थिति में पूरी तरह बंद कर दें जब वक़ील उस पक्षकार की ओर से पेश नहीं हो रहा है। मुफ़्त क़ानूनी सेवाओं के लिए विस्तृत कार्यक्रम एक तरह से राज्य का गंभीर दायित्व है अगर क़ानून के शासन को ज़्यादा महत्व देना है। तब तक के लिए पक्षकार अपने वक़ील के माध्यम से (अदालत में) पेश हो सकते हैं और अगर उन्हें वक़ील उपलब्ध नहीं हैं, तो इसके लिए वे अपने किसी मित्र का चुनाव कर सकते हैं।


यह दूसरा व्यक्ति ऐसा नहीं हो सकता है जो आदतन किसी भी पक्ष के प्रतिनिधि के रूप में अदालत में पेश होता है तो उस स्थिति में वह पेशेवर रूप में एडवोकेट अधिनियम के तहत पाबंदियों का उल्लंघन करेगा। मैं उसे इसकी अनुमति नहीं दे सकता। इसके बावजूद, किसी मामले के पक्षकार पर यह निर्भर करता है कि वह किसी ग़ैर-वक़ील को किसी विशेष मामले में अपना प्रतिनिधित्व करने के लिए चुने। किसी पेशे की प्रैक्टिस करना किसी मित्र या रिश्तेदार का किसी अवसर पर या किसी मामले में या कुछ मौक़ों पर प्रतिनिधित्व करना पूरी तरह अलग मामला है। वर्तमान मामले में, ग़ैर-वक़ील के माध्यम से प्रतिनिधित्व की माँग की गई है।


यह पूरी तरह स्पष्ट है कि कोई भी व्यक्ति को एडवोकेट नहीं है, अदालत में ज़बरदस्ती घुसने को अपना अधिकार नहीं मान सकता और किसी के लिए जिरह करने का दावा नहीं कर सकता। स्थिति को देखते हुए और कई सारे कारकों का ख़याल रखते हुए यह अदालत इस तरह के ग़ैर-पेशेवर प्रतिनिधित्व की अनुमति दे सकता है। यह सीपीसी की नीतियों (मेरा मतलब यहाँ आपराधिक मामलों से है) के अनुरूप है जैसा कि धारा 2(q) में कहा गया है।


परिभाषा के हिसाब से, ऐसा व्यक्ति जिसको क़ानून ने किसी अदालत में क़ानून की प्रैक्टिस के लिए अधिकृत किया है के अलावा ऐसा कोई भी व्यक्ति हो सकता है अगर उसे अदालत की अनुमति से किसी विशेष मामले में शिरकत करने के लिए नियुक्त किया जाता है। श्रोताओं के विनियमन के लिए इस अदालत के अधिकार का प्रयोग धारा 2(q) की भावनाओं के अनुरूप किया जा सका है।"

इस वर्ष के शुरू में मद्रास हाईकोर्ट ने इस फ़ैसले पर भरोसा करते हुए कहा था कि अदालत किसी भी व्यक्ति को जो कि एक एडवोकेट के रूप में पंजीकृत नहीं है, अदालत के समक्ष अपना विचार रखने को कह सकता है। न्यायमूर्ति ए आनंद वेंकटेश ने नक्किरन गोपाल की हिरासत को ख़ारिज करते हुए कहा था कि वरिष्ठ पत्रकार एन राम को बुलाकर उनकी राय लेने में कोई हर्ज नहीं था।

कोई एजेंट आपराधिक सुनवाई में किसी पक्ष का वक़ील नहीं हो सकता

टीसी मथाई एवं अन्य बनाम ज़िला और सत्र जज (1999) 3 SCC 614 मामले में कहा गया कि आपराधिक सुनवाई में कोई एजेंट किसी पक्षकार का उस समय तक वक़ील नहीं बन सकता जब तक कि पक्षकार इसके लिए अदालत की अनुमति नहीं ले लेता। एम कृष्णम्मल बना टी बालासुब्रमनीय पिल्लै मामले में मद्रास हाईकोर्ट के फ़ैसले को उद्धृत किया गया।

न्यायमूर्ति केटी थोमस ने अदालत का पक्ष रखते हुए कहा था -


" पॉवर ऑफ़ अटर्नी एक्ट की धारा 2 किसी क़ानून के विशेष प्रावधान की अनदेखी नहीं कर सकता है जिसमें यह ज़रूरी है कि किसी व्यक्ति के लिए एक काम को को ख़ुद करना ज़रूरी है। जब संहिता के तहत यह ज़रूरी है कि आरोपी को अदालत में पेश होना ज़रूरी है, तो अगर उसके बदले में उसका पॉवर ऑफ़ अटर्नी अदालत में हाज़िर होता है तो यह नहीं कहा जा सकता कि अदालत के आदेश का पालन हुआ। यह अलग बात है कि किसी पक्ष को उसके वक़ील के माध्यम से पेश होने की अनुमति दी जाए। संहिता के अध्याय XVI के तहत मजिस्ट्रेट को यह अधिकार है कि वह आरोपी को अदालत में पेश होने के लिए सम्मन या वारंट जारी करे।


संहिता की धारा 205 मजिस्ट्रेट को यह अधिकार देता है कि वह आरोपी को अदालत में ख़ुद पेश होने के लिए नहीं कहे और अगर उसको लगता है तो उसके वक़ील को उसके प्रतिनिधित्व की अनुमति दे। धारा 273 में आरोपी के वक़ील की मौजूदगी में साक्ष्य की रिकॉर्डिंग के बारे में अदालत के अधिकार की बात कही गई है अगर आरोपी को अदालत में पेशी से छूट मिली हुई है। पर किसी भी सूरत में किसी पॉवर ऑफ़ अटर्नी धारक को आरोपी का प्रतिनिधित्व करने की इजाज़त नहीं दी जा सकती है। इसलिए पॉवर ऑफ़ अटर्नी के आधार पर अपीलकर्ता की दलील का इस मामले में कोई मतलब नहीं है।"

जिमी जहांगीर मदन बनाम बॉली करियप्पा हिंडलेय (मृत) (2004) 12 SCC 509 मामले में यह कहा गया कि सीआरपीसी के दोनों प्रावधानों के तहत पॉवर ऑफ़ अटर्नी धारक को संबंधित पक्ष का प्रतिनिधित्व करने की इजाज़त दी जा सकती है बशर्ते कि ऐसा करने के लिए अनुमति ली गई है और अदालत ने यह अनुमति दी है। पर अगर इस तरह की अनुमति संबंधित व्यक्ति द्वारा नहीं माँगी गई है, जिसका मतलब यह हुआ कि सीआरपीसी की धारा 205 के संदर्भ में, आरोपी और धारा 302 के संदर्भ में कोई पक्ष जिसके पास अभियोजन को जारी रखने का अधिकार है, यह स्पष्ट किया गया कि पॉवर ऑफ़ अटर्नी धारक को कार्यवाही में संबंधित व्यक्ति का प्रतिनिधित्व करने की अनुमति नहीं दी जा सकती है ।

इस वर्ष के शुरू में कलकत्ता हाईकोर्ट की एकल पीठ ने कहा कि सिर्फ़ एडवोकेट अधिनियम के तहत पंजीकृत एडवोकेट को ही किसी क़ानूनी अदालत में किसी मुक़दमादार की पैरवी करने का अधिकार होगा। इसके ख़िलाफ़ अपील पर ग़ौर करते हुए खंडपीठ ने कहा कि निकट संबंधी के मामले में अदालत अपने विशेषाधिकार के तहत पॉवर ऑफ़ अटर्नी धारक को अदालत को संबोधित करने की अनुमति दे सकता है अगर अदालत को लगता है कि याचिकाकर्ता की ओर से अदालत में पेश होने वाला व्यक्ति क़ानून, तथ्यों का जानकार है और अदालत को संबोधित कर सकता है और इस मामले में मदद कर सकता है ।

प्रैक्टिस करने का अधिकार अदालत में पेश होने के अधिकार से अलग है

प्रैक्टिस का अधिकार किसी एडवोकेट को क़ानून के पेशे की सभी अदालतों, ट्रिब्यूनलों, अथॉरिटीज़ आदि के समक्ष प्रैक्टिस करने का अधिकार देता है पर अदालत की अनुमति से किसी मामले में पेश होने का अधिकार एडवोकेटों को प्रैक्टिस के अधिकार का अपवाद है। हालाँकि, हम विभिन्न हाइकोर्टों के इस मत से सहमत हैं कि पॉवर ऑफ़ अटर्नी धारक को अदालत को संबोधित करने का अधिकार नहीं है, पर हमारी राय में कोई निकट संबंधी होने पर पॉवर ऑफ़ अटर्नी धारक को अदालत में पेश होने की अनुमति देने का अदालत को अधिकार है।

2018 में बार काउंसिल ऑफ़ इंडिया बनाम एके बालाजी AIR 2018 SC 1382 दिए गए एक फ़ैसले में कहा गया कि विदेशी लॉ फ़र्म भारत में अपना कार्यालय नहीं खोल सकतीं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि लॉ की प्रैक्टिस का मतलब सिर्फ़ अदालत में पेश होना ही नहीं है बल्कि ऐसी राय देना भी इसमें शामिल है जो क़ानूनी है, किसी क़ानून का ड्राफ़्ट तैयार करना, क़ानूनी बहस वाले सम्मेलनों में भाग लेना आदि भी है।

एडवोकेट अधिनियम के अध्याय IV में कहा गया है कि सिर्फ़ बार काउन्सिल में पंजीकृत एडवोकेट ही क़ानून की प्रैक्टिस कर सकते हैं। अन्य लोग सिर्फ़ इस अदालत की अनुमति से ही अदालत में पेश हो सकते हैं जिसके समक्ष मामले की सुनवाई लंबित है।

एडवोकेट अधिनियम की धारा 45

यह बताना महत्त्वपूर्ण है कि एडवोकेट अधिनियम की धारा 45 के अनुसार, अगर कोई व्यक्ति जिसे एडवोकेट अधिनियम के तहत अदालत में प्रैक्टिस करने का अधिकार नहीं है, वह अदालत में प्रैक्टिस करता है तो ऐसे व्यक्ति को छह माह तक के जेल की सज़ा हो सकती है। 2011 में आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने इस प्रावधान का हवाला देते हुए मडुपु हरिनारायण बनाम प्रथम अतिरिक्त ज़िला जज मामले में अपने फ़ैसले में बार काउन्सिल ऑफ़ आंध्र प्रदेश को एक ऐसे व्यक्ति के ख़िलाफ़ मामला दर्ज कराने का निर्देश दिया जो एक पक्षकार की ओर से जीपीए के रूप में पेश हुआ जबकि उसको किसी भी अदालत में प्रैक्टिस करने की अनुमति नहीं थी।

निष्कर्ष

इस तरह निष्कर्ष के रूप में कहा जा सकता है कि एक ऐसा व्यक्ति जो वक़ील नहीं है, किसी पक्षकार की ओर से अदालत में पेश हो सकता है बशर्ते उसने इसके लिए अदालत की पूर्व अनुमति ली है। जैसा कि हरिशंकर रस्तोगी के मामले में कहा गया है कि इसकी अनुमति देने या इंकार करने से पहले संबंधित व्यक्ति के बारे में जानकारी, उसका संबंध, किसी निजी व्यक्ति की सेवा लेने की अनुमति की वजह और अन्य परिस्थितियों के बारे में सूचनाएं इकट्ठी की जानी चाहिए।

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