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जानिये क्या है गर्भपात को लेकर भारत में कानून और गर्भावस्था की किस अवधि तक यह होता है वैध?

SPARSH UPADHYAY
11 Dec 2019 2:30 AM GMT
जानिये क्या है गर्भपात को लेकर भारत में कानून और गर्भावस्था की किस अवधि तक यह होता है वैध?
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चिकित्सा शब्दावली के अनुसार, 'गर्भपात' (Abortion), 'गर्भावस्था' (Pregnancy) की समाप्ति है। भारत में गर्भपात के कानून को गर्भ का चिकित्सभकीय समापन अधिनियम, 1971 (Medical Termination of Pregnancy- MTP Act) के तहत नियंत्रित किया जाता है। शब्द 'गर्भपात' जैसा कि पहले ही उल्लेख किया गया है, जन्म से पहले गर्भावस्था का समापन है। दूसरे शब्दों में, जब पूर्ण रूप से विकसित होने से रोकने के उद्देश्य से मातृ गर्भाशय से एक विकासशील भ्रूण को समाप्त किया जाता है तो यह गर्भपात (Abortion) कहलाता है। गौरतलब है कि यह कार्य उद्देश्यपूर्वक किया जाता है, इसलिए इसे Miscarriage से भिन्न समझा जाना चाहिए।

किन परिस्थितियों में गर्भपात है वैध?

भारत में गर्भपात, कानूनी रूप से वैध है, और इसके लिए मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी एक्ट, 1971 जिम्मेदार है। हालांकि, कानूनी तौर पर, गर्भधारण के केवल 20 सप्ताह तक ही गर्भपात कराया जा सकता है। मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी एक्ट की धारा 3 (2) के तहत, गर्भधारण के 20 सप्ताह तक (या 12 सप्ताह तक, जैसा भी मामला हो) गर्भ को निम्नलिखित परिस्थितियों में समाप्त किया जा सकता है।

(a) यदि गर्भावस्था की निरंतरता, गर्भवती महिला के जीवन पर खतरा डालेगी या उसके शारीरिक या मानसिक स्वास्थ्य पर इसके गंभीर प्रभाव होंगे,

(b) यदि गर्भावस्था, बलात्कार का परिणाम है,

(c) यदि यह सम्भावना है कि बच्चा (यदि जन्म लेता है) तो वह गंभीर शारीरिक या मानसिक दोष के साथ पैदा होगा,

(d) या यदि गर्भनिरोधक विफल रहा है।

गौरतलब है कि 12-20 सप्ताह तक की गर्भावस्था को समाप्त करने के लिए जो आवश्यकताएं एक्ट में दी गयी हैं, वही आवश्यकताएं 12 सप्ताह तक की गर्भावस्था को समाप्त करने के लिए भी लागू होती हैं। यह भी समझना आवश्यक है कि, नाबालिगों या मानसिक रूप से विक्षिप्त महिला की गर्भावस्था के मामले में, गर्भपात के लिए माता-पिता से लिखित सहमति की आवश्यकता होती है। इसके अलावा एक अविवाहित महिला, गर्भपात के कारण के रूप में गर्भनिरोधक की विफलता का हवाला नहीं दे सकती है।

वर्ष 1971 तक, भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 312 के अंतर्गत गर्भपात कराना, एक अपराध हुआ करता था। हालांकि, असुरक्षित गर्भपात की संख्या में भारी वृद्धि को देखते हुए, भारत सरकार ने शांतिलाल शाह कमेटी को इससे सम्बंधित एक कानून बनाने के लिए सुझाव देने के लिए नियुक्त किया, जिससे भारत में गर्भपात को कानूनी रूप दिया जा सके। वर्ष 1970 में, इस समिति की सिफारिशों को स्वीकार कर लिया गया, और 1 साल बाद, मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी एक्ट, 1971 अस्तित्व में आया।

अधिनियम के अंतर्गत चिकित्सक की राय है अहम्

जैसा कि हमने समझा, वर्ष 1971 के इस कानून की धारा 3 (2) (बी), गर्भावस्था समाप्त करने की अवधि को 20 सप्ताह तक सीमित रखती है, और यदि 2 चिकित्सकों की यह राय है कि गर्भावस्था की निरंतरता, भ्रूण या मां को काफी जोखिम में डाल सकती है, तो गर्भपात कराया जा सकता है। हालाँकि यह प्रावधान केवल 12 सप्ताह से अधिक एवं 20 सप्ताह तक की गर्भावस्था के मामले में लागू होता है। इस कानून का एक अन्य खंड, 3 (2) (ए), की यह आवश्यकता है कि यदि गर्भधारण के 12 सप्ताह तक गर्भपात कराया जाना है तो ऐसा केवल तभी किया जा सकता है, जब केवल 1 चिकित्सक की यह राय है कि गर्भावस्था की निरंतरता, मां या भ्रूण के जीवन को खतरे में डालेगी।

इस एक्ट में वर्ष 2002 और 2003 में संशोधन किया गया ताकि डॉक्टरों को गर्भावस्था के सातवें सप्ताह तक, प्रिस्क्रिप्शन पर Mifepristone और Misoprostol (जिसे "मॉर्निंग-आफ्टर पिल" कहा जाता है) प्रदान करने की अनुमति दी जा सके।

वर्ष 2003 में स्वास्थ्य मंत्रालय के दिशानिर्देशों के अनुसार, एक गर्भपात केवल एक पंजीकृत स्त्री रोग विशेषज्ञ और प्रसूति रोग विशेषज्ञ द्वारा किया जा सकता है (अधिक जानकारी के लिए पढ़ें नियम 4)। MTP act की धारा 2(d) के अनुसार, एक रजिस्टर्ड मेडिकल प्रैक्टिशनर का मतलब, एक ऐसे मेडिकल प्रैक्टिशनर से है, जो कि इंडियन मेडिकल काउंसिल एक्ट, 1956 की धारा 2 (1956 का 102) के क्लॉज (h) में परिभाषित, कोई भी मान्यता प्राप्त मेडिकल योग्यता रखता है, और जिसका नाम राज्य मेडिकल रजिस्टर में दर्ज किया गया है और जिसे स्त्री रोग और प्रसूति में ऐसा अनुभव या प्रशिक्षण है, जैसा कि इस अधिनियम के तहत बनाए गए नियमों (वर्ष 2003 के नियम) द्वारा निर्धारित किया जा सकता है।

अदालत की भूमिका

20 सप्ताह की सीमा से परे गर्भधारण को समाप्त करने की अनुमति केवल अदालतों द्वारा दी जाती है, यह अनुमति केवल उन मामलों में दी जाती है, जहां गर्भवती महिला के जीवन की रक्षा के लिए गर्भपात कराना आवश्यक हो जाता है, हालाँकि अदालत के हालिया फैसलों में, जहाँ भ्रूण में कुछ गंभीर अनियमितता पाई गयी, वहां भी 20 सप्ताह से परे गर्भपात को अनुमति दी गयी है।

जहाँ बीते अगस्त में बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक 28-सप्ताह की गर्भवती महिला द्वारा गर्भावस्था की समाप्ति की अनुमति के लिए दायर याचिका को अनुमति दी थी, क्योंकि सोनोग्राफी के दौरान भ्रूण में कई विकृति पाई गई थी। वहीँ पिछले महीने, कर्नाटक उच्च न्यायालय ने एक 24 वर्षीय महिला को अपनी 31 सप्ताह की गर्भावस्था को समाप्त करने की अनुमति दी थी, क्योंकि यह पाया गया था कि भ्रूण में कई असामान्यताएं थीं।

इसी वर्ष अप्रैल में एक अन्य मामले में बॉम्बे उच्च न्यायालय की जस्टिस ए. एस. ओका व जस्टिस एम. एस. सोनक की खंडपीठ ने यह माना था कि अगर एक रजिस्टर्ड मेडिकल प्रैक्टिशनर को यह लगता है कि गर्भवती महिला की जान बचाने के लिए गर्भपात किया जाना जरूरी है, तो ऐसी स्थिति में वह बिना हाईकोर्ट की अनुमति के भी 20 सप्ताह के ज्यादा की प्रेगनंसी का गर्भपात यानि मेडिकली टर्मिनेट कर सकता है

इंडिया स्पेंड की एक रिपोर्ट के मुताबिक, अप्रैल 2016 से जुलाई 2019 के बीच 82 मामलों में से 17% मामलों में अदालतों ने नाबालिग बलात्कार पीड़ितों को गर्भपात की अनुमति देने से इनकार कर दिया। भले ही एमटीपी अधिनियम, 20 सप्ताह तक गर्भपात की अनुमति देता है, लेकिन अप्रैल 2016 और जुलाई 2019 के बीच देश भर की अदालतों में 20 सप्ताह से कम की गर्भावस्था को समाप्त करने की मांग वाली 40 याचिकाओं को दायर करना पड़ा, क्योंकि डॉक्टरों ने गर्भपात करने से इनकार कर दिया। इनमें से 33 मामले बलात्कार पीड़ितों द्वारा दर्ज किए गए थे।

महिला के अधिकार और MTP एक्ट

हालांकि, MTP अधिनियम, सीमित मायनों में वयस्क महिलाओं को अपने लिए निर्णय लेने की स्वायत्तता देता है (कि उसे बच्चे को जन्म देना है या नहीं), पर फिर भी एक महिला को केवल अपनी मर्जी से गर्भपात करने की कानूनी रूप से अनुमति नहीं है (यदि डॉक्टर ऐसा करने की सलाह न दे तो)। यह जरुर है कि एक डॉक्टर को (गर्भपात को लेकर अपनी राय बनाने के बाद), माँ के अलावा किसी की सहमति की आवश्यकता नहीं होगी।

सुचिता श्रीवास्तव एवं अन्य बनाम चंडीगढ़ एडमिनिस्ट्रेशन (2009) 9 SCC 1 के मामले में, सुप्रीम कोर्ट ने गर्भावस्था जारी रखने के संदर्भ में महिलाओं के अधिकारों की पुष्टि की है। सुचिता श्रीवास्तव मामले में, सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट रूप से यह कहा कि यह राज्य का दायित्व है कि वह महिला के प्रजनन अधिकारों को व्यक्तिगत स्वतंत्रता, गरिमा और गोपनीयता के उसके अनुच्छेद 21 के अंतर्गत अधिकारों के एक घटक के रूप में सुनिश्चित करे। सर्वोच्च न्यायालय ने वर्ष 1992 में नीरा माथुर बनाम भारतीय जीवन बीमा निगम 1992 AIR 392 के मामले में यह निर्णय दिया था कि गर्भ-धारण को निजी रखना, निजता के अधिकार का मामला है।

हालाँकि चिंताजनक बात यह है कि भारत में 56% गर्भपात, असुरक्षित रूप से किये जाते हैं। भारत में मातृ-मृत्यु के 8.5% मामले, असुरक्षित गर्भपात के कारण होते हैं; और प्रतिदिन 10 महिलाएं इस कारण से मर जाती हैं (एक रिपोर्ट के मुताबिक यह संख्या 10 से बढ़कर अब 13 हो चुकी है)। अनचाहे या अवांछित गर्भधारण के मामले, गर्भनिरोधक की कमी, गर्भनिरोधक की विफलता या बलात्कार के कारण उत्पन्न हो सकते हैं।

जब एक महिला को कानूनी रूप से गर्भपात करने की अनुमति नहीं मिलती है (एक्ट के अंतर्गत प्रतिबन्ध, डॉक्टर की सलाह न मिलने एवं अदालत से इजाजत ने मिलने के कारण), या उसकी पहुँच प्रशिक्षित डॉक्टर/नर्सेज तक नहीं होती है, तो उसे अवैध रूप से गर्भपात को अंजाम देने के लिए मजबूर होना पड़ता है, जिससे उसके जीवन पर खतरा बढ़ जाता है। एक्ट एवं नियमों/दिशानिर्देशों में इस बात को लेकर उचित व्यवस्था दी जानी अब आवश्यक हो चली है।

MTP एक्ट में बदलाव: समय की मांग?

एमटीपी अधिनियम के अनुसार, गर्भपात केवल 20 सप्ताह की गर्भावस्था तक ही किया जा सकता है। जब इस नियम को लागू किया गया था, तब इसका इरादा लिंग परीक्षण के जरिये लिंग-चयनात्मक गर्भपात को रोकने का था, क्यूंकि यह परिक्षण तब केवल गर्भावस्था के 20-सप्ताह के बाद ही किया जा सकता था। हालाँकि, एमटीपी अधिनियम यह समझने में विफल है कि विज्ञान एवं तकनीक में प्रगति के साथ, यह परीक्षण अब 20 सप्ताह की गर्भवस्था से बहुत पहले किया जा सकता है।

जहाँ एक नए प्रकार के रक्त परीक्षण के माध्यम से गर्भावस्था के 7 सप्ताह तक शिशु के लिंग का निर्धारण किया जा सकता है। वहीँ कोरियोनिक विलस सैंपलिंग (सीवीएस) के माध्यम से 10वें से 12वें सप्ताह के आसपास भ्रूण के लिंक का पता लगाया जा सकता है। एमनियोसेंटेसिस द्वारा 15 से 20 सप्ताह के बीच भी लिंग निर्धारित किया जा सकता है। यदि हम चिकित्सा विज्ञान की बात करते हैं, तो डॉक्टर यह कहते हैं कि वैज्ञानिक प्रगति के कारण गर्भावस्था के 24 सप्ताह तक गर्भपात करना अब बिल्कुल सुरक्षित है। कई डॉक्टर तो इस अवधि के बाद भी गर्भपात को एक सुरक्षित प्रक्रिया मानते हैं।

अंत में, यह कहना उचित होगा कि गर्भपात कराने की मौजूदा अवधि को बढाकर 24-26 सप्ताह किया जाना आवश्यक मालूम पड़ने लगा है। हालाँकि, मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (संशोधन) विधेयक, 2019 ड्राफ्ट, मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (एमटीपी) अधिनियम, 1971 में संशोधन करने का प्रस्ताव रखता है। यह विधेयक 26 सप्ताह तक गर्भावस्था को समाप्त करने की अनुमति देने का प्रस्ताव रखता है (भ्रूण की असामान्यताओं या मां या बच्चे के जीवन पर जोखिम के मामलों में)।

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