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महिला वकीलों ने हैदराबाद में हुई पुलिस मुठभेड़ की निंदा की

LiveLaw News Network
7 Dec 2019 11:32 AM GMT
महिला वकीलों ने हैदराबाद में हुई पुलिस मुठभेड़ की निंदा की
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महिला वकीलों की संस्था वीमेन इन क्रिमिनल लॉ एसोसिएशन ने बलात्कार के मामले में शामिल चार संदिग्धों की पुलिस के साथ मुठभेड़ में हत्या कर दिए जाने की निंदा की है। इस एसोसिएशन की वकील सुप्रीम कोर्ट, दिल्ली हाईकोर्ट और दिल्ली की अन्य अदालतों में प्रैक्टिस करती हैं।

इन चारों लोगों पर हैदराबाद में 26 वर्षीया एक पशु चिकित्सक के साथ सामूहिक बलात्कार और फिर उसको जलाकर मार देने का आरोप है। पुलिस ने इन्हें गिरफ्तार कर लिया था। इन वकीलों ने महिलाओं के अधिकारों और उनकी सुरक्षा के नाम पर हिंसा के प्रयोग को गलत बताया।

एसोसिएशन ने इस बारे में एक विज्ञप्ति जारी किया था जिसमें कहा गया,

"हम हैदराबाद में 26 वर्षीय पशु चिकित्सक के साथ बलात्कार और उसकी हत्या के संदेह में चार व्यक्तियों की हिरासत में हत्या की निंदा करते हैं और महिलाओं के अधिकारों और महिला सुरक्षा के नाम पर हिंसा के इस्तेमाल का विरोध करते हैं। पुलिस और सुरक्षा बलों द्वारा तथाकथित "मुठभेड़ों" में लोगों की हत्या हमें एक सुरक्षित समाज नहीं देती।

यह केवल उत्पीड़न के एक उपकरण के रूप में हिंसा का उपयोग करता है, जिससे समाज और खासकर महिलाएं विशेष रूप से और कमजोर हो जाती हैं। यह एक संरचनात्मक समस्या के रूप में पितृसत्ता और अपना काम प्रभावी ढ़ंग से नहीं कर पाने की सभी संस्थानों की प्रणालीगत विफलता से हमारा ध्यान दूर ले जाता है।

हमारे देश में कई अन्य लोगों की तरह, हम महिलाओं के खिलाफ हिंसक अपराधों की घटनाओं पर स्तब्ध और भयभीत हैं। महिलाओं के रूप में, हम अपनी स्वतंत्रता पर यौन हमले के अनुशासनात्मक प्रभावों का अनुभव करते हैं और हम अक्सर अपनी सुरक्षा को लेकर भयभीत होते हैं। हम इस घटना में पीड़ित के परिवार के दुःख को समझते हुए अपनी हार्दिक संवेदना व्यक्त करते हैं। हम सभी पीड़ितों और इस हिंसा में बचे लोगों, उनके परिवारों और समाज के लिए समग्र रूप से न्याय की उम्मीद करते हैं।

एक वकील के रूप में, हमने बड़े पैमाने पर यौन हिंसा के जवाब में आपराधिक न्याय प्रणाली की विफलताओं का अनुभव किया है। समान रूप से, यह भी स्पष्ट है कि दलितों, मुस्लिमों और अन्य हाशिए के समुदायों के खिलाफ नियत प्रक्रिया के पालन में नियमित रूप से कोताही बरती जाती है।

हम उम्मीद करते हैं कि संपूर्ण व्यवस्था को दुरुस्त करने के साथ-साथ पुलिस जांच से लेकर मुकदमे तक, महिलाओं के बारे में सामाजिक नजरिए में व्यापक बदलाव इनको न्याय दिला पाएगा और इस तरह के अपराधों की पुनरावृत्ति पर रोक लगेगी। हमारी मांग है कि पुलिस को जज और जल्लाद की भूमिका अपने हाथ में लेने से पहले अपना काम करना चाहिए और उसका काम है नागरिकों की सुरक्षा और अपराधों की उचित जांच करना।"

इस मामले में 4 संदिग्धों को मारने में पुलिस की पागलपन भरी पूरी कार्रवाई गंभीर चिंता का कारण है। यह इंगित करना आवश्यक है कि 4 मृत व्यक्तियों का अपराध अभी ठहराया नहीं किया गया था। किसी भी अदालत ने मामले को नहीं निपटाया और पुलिस की जांच शुरुआती चरण में थी। यह न्याय नहीं है और हम इस संबंध में नेताओं और सार्वजनिक हस्तियों के जश्नपूर्ण बयानों की निंदा करते हैं।

हम यह नहीं भूल सकते कि इस देश की पुलिस भी अक्षम या भ्रष्ट जांच के माध्यम से बलात्कार पीड़ितों को न्याय देने से इंकार करती रही है। हम पहले उन्नाव मामले को नहीं भूल सकते जहां पीड़िता के पिता को न्यायिक हिरासत में मार दिया गया था और वह अपने वकील के साथ जानलेवा कार दुर्घटना की शिकार हुई थी और दूसरे के लिए सुरक्षा कहां थी, जहां पीड़िता को कोर्ट के लिए जाते हुए जला दिया गया और अस्पताल में अपने जीवन के लिए जूझ रही है (इस पीडिता की अब मौत हो चुकी है)।

यौन हमले के खिलाफ लड़ाई का इतिहास पुलिस हिंसा और यौन हमले के बीच गहरी पेचीदगी का सबूत भी देता है। यौन उत्पीड़न के खिलाफ पहला राष्ट्रव्यापी आयोजन आपराधिक कानून (संशोधन) अधिनियम, 1983 के पारित होने के परिणामस्वरूप मथुरा (1972) और रमीजा बी (1978) के हिरासत में बलात्कारों से शुरू हुआ, जो दोनों हाशिए के समुदायों की महिलाएं थीं। हम एक समाज के रूप में हिरासत में बलात्कार के खिलाफ नहीं हो सकते हैं लेकिन हिरासत में हत्या कर सकते हैं। जश्न मनाने के लिए कुछ भी नहीं है, और आज जो कुछ भी हुआ है, उसमें कोई न्याय नहीं है।

आपराधिक कानून में पुलिस द्वारा की गई हत्याएं कोई विशेष अपवाद नहीं हैं। इस तरह की हत्याएं हत्या हैं, जब तक कि वे आत्मरक्षा के सामान्य अपवाद के दायरे में नहीं आतीं, किसी भी व्यक्ति पर लागू होती हैं। इन मौतों को एफआईआर के पंजीकरण के माध्यम से जांच की आवश्यकता होती है और यह केवल इस तरह की जांच पर है कि यह निर्धारित किया जा सकता है कि क्या पुलिस ने इस अपवाद के दायरे में कार्रवाई की।

पुलिस ने 3 बजे सुबह हुई मुठभेड़ के बारे में मीडिया में जो स्पष्टीकरण दिया है उसकी उचित जांच होनी चाहिए। समाचार रिपोर्टों के अनुसार, एक मजिस्ट्रेटी जांच की घोषणा की गई है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों के अनुसार अकेले यह अपर्याप्त है।

सुप्रीम कोर्ट के निर्देश में कहा गया है कि प्राथमिकी दर्ज की जानी चाहिए, और राज्य की सीआईडी या किसी अन्य पुलिस स्टेशन की स्वतंत्र टीम से इसकी जांच कराई जानी चाहिए। इस जांच का नेतृत्व मुठभेड़ करने वाले अधिकारी से ऊंचे दर्जे के अधिकारी को करना चाहिए। अंततः, हम इस मामले में उचित और ठोस न्याय की उम्मीद करते हैं और यह आशा करते हैं कि यह राज्य एजेंसियों को संवैधानिक सिद्धांतों और कानून के नियम के अनुसार नागरिकों की सुरक्षा और कार्य करने की याद दिलाएगा।

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