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जानबूझकर अवज्ञा: मद्रास हाईकोर्ट ने जिला कलेक्टर को अवमानना का दोषी ठहराया; तीन महीने की जेल की सजा सुनाई

LiveLaw News Network
12 March 2021 8:13 AM GMT
जानबूझकर अवज्ञा: मद्रास हाईकोर्ट ने जिला कलेक्टर को अवमानना का दोषी ठहराया; तीन महीने की जेल की सजा सुनाई
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मद्रास हाईकोर्ट ने एक जिला कलेक्टर और दो अन्य को कोर्ट के अवमानना का दोषी ठहराया, इसमें जिला कलेक्टर ने कोर्ट के उस न्यायिक आदेश की जानूबूझकर अवज्ञा की, जिसमें कुछ किसानों को उनकी कृषि भूमि से एक जलाशय बनाने के उद्देश्य से बेदखल करने पर रोक लगाने का आदेश दिया गया था।

न्यायमूर्ति एमएस रामचंद्र राव की एकल पीठ ने उन्हें तीन महीने के लिए साधारण कारावास की सजा सुनाई और 20,000 रूपये का जुर्माना भरने का आदेश दिया।

कोर्ट ने निर्देश में आगे कहा कि वे प्रत्येक याचिकाकर्ता को 10,000 रुपये मुआवजे के रूप में भुगतान करें।

जिला कलेक्टर, संयुक्त कलेक्टर और प्रशासक, (पुनर्वास और पुन:स्थापन) और भूमि अधिग्रहण अधिकारी सह तमिलनाडु के राजना सिरसीला जिले के राजस्व विभागीय अधिकारी ने यह निर्देश दिया था।

बेंच ने आदेश में कहा कि प्रतिवादी अधिकारी 12 अक्टूबर, 2018 को अदालत के आदेश की अवहेलना करते हुए आगे बढ़े और इस प्रक्रिया में कुछ भूमि को जब्त कर लिया, जिसके लिए मार्च 2019 में एक याचिका डाली गई थी।

पीठ ने कहा कि,

"हालांकि पहले प्रतिवादी ने पैरा संख्या 6 के आधार पर दलील दी कि कभी भी याचिकाकर्ताओं को उनकी कृषि भूमि या आवास से निकालने का प्रयास नहीं किया गया था और जैसा कि याचिका में याचिकाकर्ताओं की ओर से कहा गया है कि जमीनें खोदी गई हैं और याचिकाकर्ताओं की ओर से जो तस्वीरें दिखाई गई हैं, वे सब गलत हैं और यह याचिका भी सही नहीं है।"

पीठ ने आगे कहा कि जब याचिकाकर्ताओं ने न्यायिक आदेश की जानबूझकर अवज्ञा करने पर आपत्ति जताई, तो उन्हें प्रतिवादी द्वारा नियुक्त पुलिस द्वारा याचिकाकर्ता को धमकी दी गई।

एकल पीठ ने अपने आदेश में जिला कलेक्टर द्वारा उठाए गए एक तर्क को भी खारिज कर दिया कि वह अक्टूबर 2018 में इस पद पर आसीन नहीं था और इस प्रकार, उसके पास उस समय न्यायालय द्वारा दिए गए आदेशों का पालन सुनिश्चित करने की कोई जिम्मेदारी नहीं थी।

कोर्ट ने कहा कि,

"अक्टूबर, 2019 में प्रतिवादी को उक्त जिले का जिला कलेक्टर नियुक्त किया गया , और जब याचिकाकर्ताओं की कृषि भूमि जलमग्न हो गई (इस बारे में नीचे विस्तार से चर्चा की गई है) तो इसका उल्लंघन रोकना जिला कलेक्टर का कर्तव्य है क्योंकि जिला कलेक्टर कार्यालय, राजन्ना सिरसीला जिला याचिका ( याचिका में 5 वीं प्रतिवादी) में एक पार्टी हैऔर उक्त आदेश दिनांक 12.10.2018 को दिया गया था और इसलिए यह उसे बांध देता है, भले ही वह बाद में उक्त पोस्ट पर आए हों।"

खंडपीठ ने आगे कहा कि सुधार और पुनर्वास अधिनियम, 2013 की धारा 31 के तहत मुआवजा, सुधार और पुनर्वास दिखाने वाले किसी भी दस्तावेज को प्रतिवादी दिखाने में असमर्थ है, जिसमें याचिकाकर्ताओं को उनके कृषि भूमि के अधिग्रहण के बदले में मुआवजा, सुधार और पुनर्वास के लिए भुगतान किया जाना था।

कोर्ट ने कहा कि,

"मेरे द्वारा विशेष रूप से सरकार की ओर से दलील देने वाले ए. संजीव कुमार को पूछे गए एक विशेष प्रश्न पर, जो सुधार और पुनर्वास अधिनियम, 2013 की अनुसूची II की धारा 31 के तहत मुझे एक ऑवर्ड दिखाने के लिए अपर महाधिवक्ता कार्यालय से संलग्न है। उपरोक्त याचिकाकर्ताओं द्वारा उल्लिखित अधिसूचनाओं के तहत याचिकाकर्ताओं की कृषि भूमि के अधिग्रहण पर सुधार और पुनर्वास अधिनियम के तहत याचिकाकर्ताओं की ओर से दायर की गई याचिका पर प्रतिवादी द्वारा दायर काउंटर एफिडेविट में किसी भी अनुबंध में एक भी दस्तावेज को यह इंगित करने में सक्षम नहीं है कि किसी भी तहर का ऑर्वड पास किया गया हो और किसी को मुआवजा प्रदान किया गया हो।"

कोर्ट ने WP (PIL) नंबर 191/2016 में एक डिवीजन बेंच के फैसले पर भरोसा जाताय, इसमें स्पष्ट रूप से कहा गया था कि राज्य द्वारा भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया में भूमि या अन्य अचल संपत्ति खो देने वाला एक भूमि स्वामी सुधार और पुनर्वास अधिनियम, 2013 की धारा 3 (c) (i) के तहत 'प्रभावित परिवार' की परिभाषा में आएगा।

कोर्ट ने अंत में निर्देश दिया कि प्रतिवादी के सेवा रिकॉर्ड में एक प्रतिकूल प्रविष्टि दर्ज की जाएगी, जो कि न्यायालय के आदेशों की जानबूझकर की गई अवज्ञा है। इसके साथ ही कोर्ट ने छह सप्ताह की कारावास की सजा को भी निलंबित कर दिया।

आदेश की कॉपी यहां पढ़ें:




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