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4 साल की बच्ची के यौन शोषण के आरोपी को POCSO के तहत 9 दिन में सज़ा, अदालत ने कहा, बच्चा एक सक्षम गवाह, पढ़िए फैसला

LiveLaw News Network
1 Sep 2019 6:11 AM GMT
4 साल की बच्ची के यौन शोषण के आरोपी को POCSO के तहत 9 दिन में सज़ा, अदालत ने कहा, बच्चा एक सक्षम गवाह, पढ़िए फैसला
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एक रिकॉर्ड स्थापित करते हुए औरैया (उत्तर प्रदेश) की एक विशेष अदालत ने आरोप पत्र दाखिल करने के 9 दिनों के भीतर यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण करने संबंधी (POCSO) अधिनियम, 2012 के तहत सजा का आदेश पारित किया। पुलिस ने अपराध के 20 दिनों के भीतर आरोप पत्र प्रस्तुत किया था।

यह अधिनियम, परीक्षण पूरा करने के लिए संज्ञान लेने की तिथि से एक वर्ष की एक बाहरी सीमा देता है। पिछले महीने, POCSO मामलों के निपटान में देरी को ध्यान में रखते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों में विशेष अदालतों की संख्या बढ़ाने के निर्देश दिए थे।

मामले की पृष्ठभूमि

IPC की धारा 376 और पोक्सो की धारा 5 और 6 के तहत FIR, एक व्यक्ति श्यामवीर (उम्र 19 साल) के खिलाफ 01.08.2019 को दर्ज की गई थी, जिसमें उस पर आरोप था कि उसने अपने घर में 4 साल की बच्ची को फंसा लिया था और उसका उत्पीड़न किया था। प्राथमिकी में खुलासा किया गया कि उसने अपनी अंगुलियों को उसके (बच्ची) निजी अंगों में प्रवेश कराया था, जिसके परिणामस्वरूप बच्ची को गंभीर रक्तस्राव हुआ। पीड़िता ने इस घटना की जानकारी अपनी मां को दी, जिन्होंने बाद में मामले को पीड़ित के पिता को सूचित किया।

शिकायत मिलने पर, पुलिस ने आरोपी को तुरंत गिरफ्तार कर लिया और धारा 161 सीआरपीसी के तहत पीड़िता का बयान दर्ज किया। पीड़िता का मेडिकल परीक्षण 02.08.2019 को डॉ. सीमा गुप्ता ने किया था। 20 दिनों के भीतर जांच पूरी करने के बाद, 20.08.19 को "उत्तर प्रदेश राज्य बनाम श्यामवीर" के मामले में विशेष POCSO कोर्ट के समक्ष आरोप पत्र दायर किया गया।

अदालत ने दिनांक 21.08.2019 को उपर्युक्त प्रावधानों के तहत आरोप तय किए और केवल 8 दिनों में ट्रायल को तेजी से पूरा किया। जिला एवं सत्र न्यायाधीश श्री. राजेश चौधरी ने 29.08.2019 को सजा का आदेश पारित किया।

आरोपी का तर्क

अभियुक्त का एक बयान धारा 313 सीआरपीसी के तहत दर्ज किया गया था जिसमें उसने सभी आरोपों से इनकार किया था। आरोपी ने कहा कि उक्त प्राथमिकी, शिकायतकर्ता के निजी प्रतिशोध से प्रेरित थी। इसके अलावा उसने यह दावा किया कि पीड़िता महज 4 साल की बच्ची थी और उसके बयानों पर अदालत द्वारा भरोसा नहीं किया जा सकता था।

जांच - परिणाम

अभियुक्तों द्वारा दिए गए तर्कों को खारिज करते हुए, अदालत ने निम्नलिखित बातों पर विचार किया:

1 - सबसे पहले, अदालत POCSO की धारा 29 के तहत अभियुक्त द्वारा अपराध किए जाने के एक अनुमान के साथ आगे बढ़ी। प्रावधान में यह कहा गया है कि जब किसी व्यक्ति पर POCSO की धारा 3, 5, 7 और 9 के तहत अपराध करने का आरोप लगाया जाता है, तो अदालत, अपराध साबित होने तक यह मान लेगी कि अभियुक्त ने उक्त अपराध किया था।

2 - इसके बाद, अदालत ने कहा कि अभियुक्त ने उसके और शिकायतकर्ता के बीच दुश्मनी के बारे में गवाही देने के लिए कोई गवाह नहीं पेश किया।

3 - चूंकि अभियोजन पक्ष के एक गवाह ने अपराध के आरोप के समय से पहले पीड़िता के साथ आरोपी को देखा था, इसलिए उसके द्वारा अपराध किये जाने के प्रति संदेह बढ़ गया और अदालत ने इसे विजय रायकवार बनाम मध्य प्रदेश राज्य, (2019) 4 SCC 210 के मद्देनजर एक महत्वपूर्ण कारक के रूप में माना।।

4 - आरोपियों द्वारा उठाए गए दूसरे विवाद को खारिज करते हुए, अदालत ने कहा कि साक्ष्य अधिनियम की धारा 118 के अनुसार, एक बच्चा एक सक्षम गवाह हो सकता है। इसको लेकर, गुल सिंह बनाम मध्य प्रदेश राज्य 2015 (88) ACC 358 (एससी) के मामले पर अदालत ने भरोसा किया।

5 - अदालत ने यह पाया कि अदालत में पीड़िता/बाल गवाह द्वारा दिए गए बयानों की, पुलिस के सामने दिए उसके बयानों के साथ अच्छी तरह से पुष्टि की गई थी। इस संबंध में, अदालत ने कहा कि यदि बाल गवाह का बयान, यथोचित जांच के बाद, अदालत के आत्मविश्वास को प्रेरित करता है, तो सजा इस तरह के बयान पर आधारित हो सकती है। इसको लेकर, सुदीप कुमार सेन बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (2016) 3 SCC 26 के मामले पर अदालत ने भरोसा किया।

6 - अदालत ने गंगा सिंह बनाम मध्य प्रदेश राज्य, AIR 2013 SC 3008 के मद्देनजर यह भी कहा कि केवल इसलिए कि किसी अन्य व्यक्ति ने अपराध को होते हुए नहीं देखा था, अभियोजन पक्ष की क्रेडिट-योग्यता को चुनौती नहीं दी जा सकती थी। अदालत ने यह भी सुझाव दिया कि किसी अन्य व्यक्ति ने अपराध को निश्चित रूप से इसलिए नहीं देखा था क्योंकि यह अपराध अभियुक्त के घर के अंदर हुआ था।

7 - अदालत ने डॉ. गुप्ता सहित सभी गवाहों के बयानों की जांच की जिन्होंने यह पुष्टि की कि चोटों की प्रकृति प्राथमिकी में लगाए गए आरोपों के समान थी।

8 - अदालत की यह राय थी कि घटना के बारे में अपनी मां को सूचित करने का पीड़िता का तुरंत बाद का आचरण, भारतीय साक्ष्य अधिनियम 1872 की धारा 8 के तहत प्रासंगिक था। इसको लेकर असम राज्य बनाम रामेन डावराह, (2016) 3 SCC 19 के मामले पर अदालत ने भरोसा किया।

सजा के आदेश को पारित करते समय, न्यायालय ने दीपक राय, आदि बनाम बिहार राज्य, (2013) 10 SCC 421 के मामले पर भरोसा किया, जिसमें यह ठहराया गया था कि सजा पारित करने के दौरान अभियुक्त की कम उम्र, सजा को कम करने वाला कारक नहीं हो सकती है। अदालत ने यह भी नोट किया कि सत्य नारायण तिवारी @ जॉली एवं अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, (2010) 13 SCC 689, में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि "महिलाओं के खिलाफ अपराध, साधारण अपराध नहीं हैं जो गुस्से में या संपत्ति के लिए किए जाते हैं। वे सामाजिक अपराध हैं। वे पूरे सामाजिक ताने-बाने को बाधित करते हैं। इसलिए, वे कठोर दंड को आकर्षित करते हैं।"

पूर्वोक्त सामग्रियों और टिप्पणियों के आधार पर, अदालत ने आरोपी को उक्त प्रावधानों के तहत दोषी ठहराया और उसे आजीवन कारावास और 2,00,000 / - रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई।



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