अविवाहित जोड़े का होटल के कमरे में रहना नहीं है अपराध : मद्रास हाईकोर्ट

अविवाहित जोड़े का होटल के कमरे में रहना नहीं है अपराध :  मद्रास हाईकोर्ट

मद्रास हाईकोर्ट ने माना है कि एक अविवाहित का होटल के कमरे में रहना कोई आपराधिक कृत्य नहीं है। न्यायमूर्ति एम.एस रमेश ने याचिकाकर्ता द्वारा संचालित एक होटल की सीलिंग को रद्द करते हुए कहा कि-

''जाहिर है, कोई ऐसा कानून या नियम नहीं है, जो बतौर मेहमान के रूप में होटल के कमरे में रहने के लिए विपरीत लिंग के अविवाहित व्यक्तियों को मना करता हो। जब दो वयस्कों के लिव-इन-रिलेशनशिप को अपराध नहीं माना जाता तो ऐसे में एक अविवाहित जोड़े का होटल के कमरे में रहना किसी अपराध को आकर्षित नहीं करता।

इस आधार पर परिसर को सील करने करना एक चरम कदम है कि एक अविवाहित युगल इस परिसर में रह रहा था, जबकि इस संबंध में प्रतिबंधित करने वाले किसी भी कानून के अभाव में ऐसा करना पूरी तरह से गैरकानूनी है।''

यह है मामला

इस मामले में याचिकाकर्ता तमिलनाडु के कोयम्बटूर में एक सर्विस अपार्टमेंट चला रहा था। 25 जून को, अपार्टमेंट के परिसर में तहसीलदार, पिलामेडु पुलिस स्टेशन की एक टीम द्वारा तलाशी ली गई। तलाशी के दौरान मेहमानों वाले एक कमरे के अंदर से कुछ शराब की बोतलें मिलीं और एक कमरे में दो वयस्क, पुरुष और महिला, जिनकी शादी एक-दूसरे से नहीं हुई थी, रह रहे थे।

टीम द्वारा बिना किसी लिखित आदेश के परिसर को सील कर दिया गया और जिस कारण याचिकाकर्ता को यह याचिका दायर करनी पड़ी।

याचिकाकर्ता के वकील ने आरोप लगाया कि प्रतिवादियों के पास याचिकाकर्ता को अपना पक्ष सामने रखने का अवसर नहीं देने का कोई स्पष्टीकरण नहीं था और याचिकाकर्ता को कोई आदेश तामील करवाए बिना ही परिसर को सील करना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है। उन्होंने यह भी कहा कि सोशल मीडिया पर वायरल हुई खबरों के आधार पर ही यह कार्रवाई की गई थी।

प्रतिवादियों के लिए उपस्थित होने वाले अतिरिक्त लोक अभियोजक ने प्रस्तुत किया कि तहसीलदार ने पिलामेडु पुलिस स्टेशन के पुलिस निरीक्षक को सूचित किया था कि याचिकाकर्ता ने अपने परिसर के लिए फॉर्म 'डी' प्राप्त नहीं किया था और बुक रजिस्टर में मेहमानों के विवरण के बिना, मेहमानों को अवैध गतिविधियों की अनुमति दे रहे हैं। साथ ही पड़ोसी महिलाओं ने याचिकाकर्ता के खिलाफ कार्रवाई करने का अनुरोध किया था।

प्रतिवादियों द्वारा अदालत के समक्ष सोशल मीडिया और साथ ही प्रिंट मीडिया की विभिन्न रिपोर्टें भी पेश की गईं, जिसमें मुख्य रूप से संकेत दिया गया था कि याचिकाकर्ता ने अविवाहित जोड़ों को होटल के कमरों में रहने की अनुमति दी थी, जिसे अनैतिक करार दिया गया था।

अदालत ने कहा, परिसर को सील करने का यह चरम कदम सोशल मीडिया और अन्य मीडिया में फैली वायरल खबरों को देखते हुए लिया गया था।

अभियोजन पक्ष कोर्ट के इस सवाल का कोई जवाब नहीं दे पाया कि एक अविवाहित जोड़ा का होटल के कमरे में रहना कैसे कानून का उल्लंघन है?

न्यायमूर्ति रमेश ने कहा,

''जब एक विशिष्ट प्रश्न प्रतिवादियों के समक्ष रखा गया था कि अविवाहित जोड़ों को होटल के कमरों में रहने की अनुमति देने में क्या अवैधता हो सकती है, तो प्रतिवादियों के पास इसका कोई जवाब नहीं था।''

प्रतिवादियों ने यह भी कहा कि सीलिंग की कार्रवाई शुरू की गई क्योंकि कुछ शराब की बोतलें भी मेहमानों के कब्जे वाले कमरे में पाई गई थीं, जबकि परिसर के मालिक के पास शराब परोसने या बेचने का लाइसेंस नहीं है।

याचिकाकर्ता ने कहा कि उन्होंने परिसर में शराब परोसी या बेची नहीं थी और ऐसी बोतलें खुद मेहमानों द्वारा लाई जा सकती थीं। कोर्ट ने कहा कि वह यह समझने में असमर्थ है कि अगर याचिकाकर्ता ने मेहमानों को कोई शराब नहीं बेची या परोसी और मेहमानों ने खुद से लाई गई शराब का सेवन किया, तो इसे कैसे गैर कानूनी माना जा सकता है।

अदालत ने कहा कि तमिलनाडु शराब (व्यक्तिगत उपभोग के लिए कब्जा) नियम, 1996 ( Tamil Nadu Liquor (Possession for Personal Consumption) Rules, 1996) के तहत किसी भी व्यक्ति को 4.5 लीटर आईएमएफएस, 4.5 लीटर विदेशी शराब, 7.8 लीटर बीयर, 9 लीटर वाइन, एक निश्चित समय पर, राज्य के भीतर,रखने का अधिकार है, इसलिए, याचिकाकर्ता के परिसर में मेहमानों द्वारा शराब का सेवन अवैध नहीं कहा जा सकता है।

न्यायालय ने इस बात पर भी जोर दिया कि परिसर को सील करने का पूरा प्रकरण प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पूर्ण उल्लंघन है।

अदालत ने कहा,

''वर्तमान मामले की पृष्ठभूमि में, हो सकता है कि क्लब में की गई कथित अनैतिक गतिविधियां अपराध न हों, इसलिए याचिकाकर्ता के खिलाफ कोई भी कठोर कदम उठाने से पहले, प्रतिवादियों द्वारा उसे स्पष्टीकरण के लिए बुलाना उचित व तर्कसंगत होगा।''

जब अतिरिक्त लोक अभियोजक ने दलील दी कि परिसर को राजस्व विभाग के 'फॉर्म डी' में भवन का लाइसेंस नहीं मिला था और बुकिंग रजिस्टर ठीक से नहीं बनाए गए थे तो अदालत ने कहा,

''यह मानते हुए कि अधिकारियों द्वारा इस तरह की कमियों की खोज की गई थी, इन्हें केवल दुर्बलता ही कहा जा जाता है, जिनका याचिकाकर्ता को स्पष्टीकरण के लिए बुलाकर संबोधित या निपटारा किया जाना आवश्यक है और उसके बाद आगे की कार्रवाई करनी चाहिए, जिससे प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन हो।''

अदालत ने याचिका की अनुमति देते हुए, प्रतिवादी को निर्देश दिया है कि आदेश की प्राप्ति की तारीख से दो दिनों की अवधि के भीतर याचिकाकर्ता के परिसर को खोल दिया जाए।

केस का विवरण

शीर्षक- माई प्रीफर्ड ट्रैन्स्फर्मेशन एंड हॉस्पिटैलिटी प्राइवेट लिमटेड बनाम दाॅ डिस्ट्रिक कलेक्टर एंड अदर्स

केस नंबर-डब्ल्यू.पी.नंबर 31230/2019

बेंच- न्यायमूर्ति एम.एम रमेश

प्रतिनिधित्व-वकील के. चंद्रशेखरन (याचिकाकर्ता के लिए) वकील सी. अय्यप्पराज (प्रतिवादियों के लिए) अतिरिक्त लोक अभियोजक (प्रतिवादियों के लिए)