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भारत-ऑस्ट्रेलिया तुलनात्मक संवैधानिक संदर्भ पर विमर्श का आयोजन

LiveLaw News Network
1 Feb 2020 3:15 AM GMT
भारत-ऑस्ट्रेलिया तुलनात्मक संवैधानिक संदर्भ पर विमर्श का आयोजन
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ऑस्ट्रेलिया उच्चायोग में 24 जनवरी को प्रोजेक्ट कॉन्स्टिटूशनलिज्म की ओर से संवैधानिक अधिकारों को बचाने और संवैधानिक प्रशासन को मज़बूत करने के विषय पर एक विचार-विमर्श का आयोजन किया गया। प्रोजेक्ट कॉन्स्टिटूशनलिज्म लाभ के लिए काम नहीं करने वाला संगठन है और उसने ऑस्ट्रेलिया-न्यूज़ीलैंड-इंडिया बिज़नेस असोसीएशन (एएनज़ेडआईबीए) के सहयोग से इसका आयोजन किया था। बातचीत का विषय था "अ कम्पैरटिव लुक ऐट द कॉन्स्टिटूशनल कॉंटेक्स्ट अव इंडिया एंड ऑस्ट्रेलिया" और यह भारत के गणतंत्र दिवस और ऑस्ट्रेलिया दिवस के मौक़े पर आयोजित हुआ।

इस कार्यक्रम में शामिल वक़्ता थे सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वक़ील श्याम दीवान, जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी में इंडिया-ऑस्ट्रेलिया स्टडीज़ के एसोसियेट डीन और इग्ज़ेक्युटिव डिरेक्टर प्रो. शॉन स्टार और नलसार, हैदराबाद के डॉक्टरल फ़ेलो मालविका प्रसाद।

इस कार्यक्रम में शुरुआती व्यक्तव्य एएनज़ेडआईबीए के निदेशक विक्रम गेरा ने दिया और उन्होंने स्वतंत्र प्रेस, बहुलवाद, और भारत-ऑस्ट्रेलिया के बीच प्रशासन की संरचना पर अपनी बात रखी। इसके बाद प्रोजेक्ट कॉन्स्टिटूशनलिज्म के संस्थापक ट्रस्टी अभिषेक जेबराज ने अपना वक्तव्य दिया और अपने संगठन के क्रियाकलापों की जानकारी दी।

समानता और भिन्नता

प्रो. स्टार ने दोनों देशों में क़ानून की जड़ों के आम होने के बावजूद एक-दूसरे देशों की क़ानूनी व्यवस्था के बारे में जानकारी का अभाव होने की न्यायमूर्ति माइकल किर्बी के बयान का ज़िक्र किया। उन्होंने कहा कि भारत और ऑस्ट्रेलिया के प्रोफ़ेसरों ने एक संयुक्त अध्ययन किया है जिसमें कहा गया है कि भारतीय फ़ैसलों का जो उल्लेख किया गया है उसमें अकेले न्यायमूर्ति किर्बी ने अपने फ़ैसलों में उसके 64% का ज़िक्र किया है। उन्होंने यह भी कहा कि ब्रिटिश उपनिवेश का हिस्सा होने के कारण दोनों ही देशों की क़ानूनी व्यवस्थाओं में काफ़ी समानता है। ऑस्ट्रेलिया का छोटा संविधान 1901 में आया जबकि भारत का संविधान उसके लगभग 50 साल बाद आया। उन्होंने यह भी कहा कि अभी तक चार भारतीयों को ऑस्ट्रेलिया का सर्वोच्च नागरिक सम्मान दिया गया है - मदर टेरेसा, सोली सोराबजी, सचिन तेंदुलकर और अभी हाल में डॉक्टर किरण मजूमदार शॉ को भी यह दिया गया। स्टार ने न्यू साउथ वेल्स के सुप्रीम कोर्ट के जज सर विलियम बर्टन का भी ज़िक्र किया जिन्हें मद्रास हाईकोर्ट में नियुक्ति दी गई थी।

स्टार ने कहा कि ऑस्ट्रेलिया के संविधान को संशोधित करना मुश्किल है जबकि भारतीय संविधान के साथ इस तरह की बात नहीं है और यहाँ ऑस्ट्रेलिया भारत से सीख सकता है जहाँ संशोधन करना अपेक्षाकृत आसान है। नागरिकों के ऐसे बहुत से अधिकार हैं जो भारत में उपलब्ध हैं पर ऑस्ट्रेलिया में नहीं।

एडवोकेट श्याम दीवान ने अपने वक्तव्य की शुरुआत महिला जननांगों को क्षत-विक्षत करने के बारे में दायर जनहित याचिका से जुड़े एक घटना का ज़िक्र किया। उन्होंने कहा कि न्यू साउथ वेल्स की अदालत ने इस अपराध में शामिल होने के आरोप में तीन लोगों को सज़ा दी थी और वे इस फ़ैसले का हवाला देना चाहते थे। पर ऑस्ट्रेलियन क्रिमिनल कोर्ट अव अपील ने इसे पलट दिया। हालाँकि, अच्छी बात यह है कि इसे दुबारा पलट दिया गया। उन्होंने कहा कि 2009 में दिल्ली हाईकोर्ट ने समलैंगिकों के अधिकारों को लेकर जो फ़ैसला दिया था वह न्यायमूर्ति एपी शाह के न्यायमूर्ति कैमरुन के साथ हुई वार्ता का परिणाम होगा, ऐसा अनुमान लगाया जा सकता है। कैमरून समलैंगिक थे और एचआईवी पोज़िटिव भी।

दीवान ने ऑस्ट्रेलिया के संविधान में संपत्ति के अधिकार के महत्व की भी चर्चा की जो भारत में इस अधिकार से भिन्न है। भारत में यह मौलिक अधिकार नहीं है।

अंत में दीवान ने यह प्रश्न किया कि इंटरनेट के युग से संविधान किस तरह प्रभावित होगा। एडवार्ड स्नोडेन की 2019 में प्रकाशित आत्मकथा 'पर्मनेंट रेकर्ड' का ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा कि 21वीं सदी में स्वतंत्रता सीधे-सीधे निजता से जुड़ा हुआ है।

संघीय ढाँचा

मालविका प्रसाद ने दोनों के संघीय ढाँचे के बारे में प्रश्न पूछा था। इस पर प्रो. स्टार ने कहा कि ऑस्ट्रेलिया का यह अनुभव केंद्रियता का है और इस संबंध में वह यूके के काफ़ी नज़दीक है।दीवान ने कहा कि भारत में किस तरह सरकार को राज्यों की सीमा में बदलाव का अधिकार है और केंद्रियता की धारणा काफ़ी अधिक है। उन्होंने कहा कि भारतीय संरचना काफ़ी मज़बूत संघीय संरचना नहीं है।

विधायी प्रक्रिया का प्रतिनिधित्व चरित्र

स्टार ने मालविका प्रसाद के प्रश्न के उत्तर में कहा कि अधिकांश ऑस्ट्रेलियाई विधायिका जिस तरह से अधिकारों से निपटती है उससे संतुष्ट हैं। पर उन्होंने कहा कि इस वजह से वहाँ अल्पसंख्यकों के लिए समस्या बढ़ गई है जो इसका लाभ पूरी तरह नहीं उठा पाए हैं। उदाहरण के लिए आवश्यक रूप से हिरासत में लेने के बारे में 1992 में बना और 1994 में संशोधित क़ानून में शरण चाहने के इच्छुक लोगों को अनिश्चित काल तक के लिए हिरासत में रखने का प्रावधान है और इसकी समीक्षा का कोई प्रावधान नहीं है।

दीवान ने कहा कि मौलिक अधिकार होने के बावजूद कुछ अधिकारों को लागू करने की प्रक्रिया काफ़ी धीमी है। उन्होंने पीआईएल व्यवस्था की ख़ामियों के बारे में कहा कि इसने मानवाधिकार के वैधानिक संरक्षण को कमज़ोर किया है।

जलवायु परिवर्तन का संपत्ति के अधिकार पर असर

प्रो. स्टार ने कहा कि उनकी सरकार जलवायु परिवर्तन को गंभीरता से नहीं लेती है जो दुर्भाग्यपूर्ण है और इस बारे में राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी पर अफ़सोस जताया। पर उन्होंने कहा कि भूमि और पर्यावरण अदालतों ने कुछ प्रगतिकामी निर्णय दिए हैं।

दीवान ने कहा कि जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाले प्रवासन से राष्ट्र राज्य के विचार को गंभीर चुनौती मिलनेवाली है और भारत में जलवायु परिवर्तन से संबंधित पीआईएल के शीघ्र सुप्रीम कोर्ट तक पहुँचने की उम्मीद है।

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