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सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार कहा है कि ट्रिब्यूनल में न्यायिक सदस्य के रूप में नियुक्ति के लिए कानून में 10 साल का अनुभव पर्याप्त है: बॉम्बे हाईकोर्ट

LiveLaw News Network
15 Sep 2021 4:49 AM GMT
सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार कहा है कि ट्रिब्यूनल में न्यायिक सदस्य के रूप में नियुक्ति के लिए कानून में 10 साल का अनुभव पर्याप्त है: बॉम्बे हाईकोर्ट
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बॉम्बे हाईकोर्ट ने नए उपभोक्ता संरक्षण नियम, 2020 के कुछ प्रावधानों को रद्द करते हुए कहा है कि ट्रिब्यूनल में न्यायिक सदस्य के रूप में नियुक्ति के लिए कानून और अन्य विशिष्ट क्षेत्रों में 10 साल का अनुभव पर्याप्त है।

इसलिए, बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर पीठ ने नियमावली 2020 के नियम 3 (2) (बी) और 4 (2) (सी) को भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 के असंवैधानिक और उल्लंघन करार देते रद्द कर दिया, जिसमें राज्य आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति के लिए कम से कम 20 साल और जिला फोरम के अध्यक्षों और सदस्यों की नियुक्ति के लिए कम से कम 15 वर्ष का न्यूनतम अनुभव निर्धारित किया गया था।

हाईकोर्ट ने मद्रास बार एसोसिएशन (एमबीए- 2020 और एमबीए- 2021) के विभिन्न मामलों सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों का उल्लेख किया, जिसमें कहा गया था कि 10 वर्षों के अनुभव वाले अधिवक्ताओं को ट्रिब्यूनल के सदस्यों के रूप में नियुक्ति के लिए विचार किया जाना चाहिए।

इसी प्रकार यू.पी. सरकार और अन्य बनाम ऑल यू.पी. उपभोक्ता संरक्षण बार एसोसिएशन, मामले में भी सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि राज्य आयोगों और जिला मंचों दोनों के संबंध में, एक सदस्य को अर्थशास्त्र, कानून, वाणिज्य, लेखा, उद्योग, सार्वजनिक मामले या प्रशासन से संबंधित समस्याओं से निपटने में कम से कम 10 वर्षों के पर्याप्त ज्ञान और अनुभव के साथ समझ होनी चाहिए ।

कोर्ट ने इस प्रकार टिप्पणी की:

"इस प्रकार, यह स्पष्ट है कि भारत के माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने बार-बार यह माना है कि जैसा कि क़ानून के तहत निर्धारित और निर्धारित है, कानून और अन्य विशिष्ट क्षेत्रों में 10 साल का अनुभव न्यायाधिकरण में न्यायिक सदस्य के रूप में नियुक्ति के लिए पर्याप्त है।

नियमावली 2020 के नियम 3 (2) (बी) और 4 (2) (सी) में राज्य आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति के लिए कम से कम 20 साल और जिला फोरम के अध्यक्षों और सदस्यों की नियुक्ति के लिए कम से कम 15 वर्ष का न्यूनतम अनुभव निर्धारित किया जाना अधिनियम के तहत MBA-2020 और UPCPBA में जारी निर्देशों को दरकिनार करने का एक प्रयास है। इसलिए, वे मनमाना एवं अवैध हैं और कानून के समक्ष समानता के सिद्धांत का उल्लंघन करते हैं।"

चयन समिति

प्रत्येक राज्य की चयन समिति को राज्य सरकार में योग्यता के क्रम में नियुक्ति के लिए नामों की सिफारिश करने के लिए अपनी प्रक्रिया निर्धारित करने की शक्ति देने वाले नियमों के प्रावधान 6 (9) को खारिज करते हुए, कोर्ट ने चयन के लिए उचित मानदंड या एकरूपता न होने के प्रतिकूल प्रभावों पर विचार किया।

याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया था कि हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने यूपीसीपीबीए में मॉडल नियम, 2017 को मंजूरी दी थी, जिसमें एक लिखित परीक्षा शामिल थी, लेकिन अंतिम 2020 नियमावली में प्रावधान हटा दिया गया था।

इसके अतिरिक्त अदालत ने कहा कि MBA-2020 में उपभोक्ता मंचों के सदस्यों को उन्हीं मानकों को बनाए रखना चाहिए जो मुख्यधारा की न्यायपालिका से अपेक्षित हैं। पीठ ने कहा कि तभी उनका आदेश उच्च न्यायपालिका की जांच का सामना कर सकेगा।

हालांकि, महाराष्ट्र में चयन समिति ने लिखित परीक्षा नहीं बल्कि केवल मौखिक परीक्षा निर्धारित की थी। और वर्तमान याचिका के लंबित रहने के दौरान और चयन प्रक्रिया के बीच में चयन समिति द्वारा चयन के लिए लिखित परीक्षा आयोजित करने का निर्णय लिया गया।

अदालत ने इसे कानून के सुस्थापित सिद्धांत के विपरीत माना कि चयन प्रक्रिया के बीच में, चयन के नियमों को नहीं बदला जा सकता है।

पीठ ने कहा,

"इसके अलावा, लिखित परीक्षा आयोजित करने के लिए चयन समिति का निर्णय, याचिकाकर्ता के मामले का समर्थन करता है कि जिला और राज्य आयोगों के अध्यक्ष और सदस्यों द्वारा किए जाने वाले न्यायिक कार्यों को देखते हुए, चयन और नियुक्ति के मानदंड मुख्यधारा की न्यायपालिका में न्यायाधीशों पर यथासंभव समान स्तर के लागू हों।"

केस शीर्षक: विजयकुमार भीमा दीघे बनाम भारत सरकार एवं अन्य और डॉ महिंद्रा भास्कर लिमये बनाम भारत सरकार एवं अन्य

आदेश की कॉपी यहां पढ़ें:




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