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तानाशाही राज का यह आलम है कि एमसीजीएम आज भी यह समझता है कि उस पर कोई क़ानून लागू नहीं होता : बॉम्बे हाईकोर्ट

LiveLaw News Network
24 March 2020 4:00 AM GMT
तानाशाही राज का यह आलम है कि एमसीजीएम आज भी यह समझता है कि उस पर कोई क़ानून लागू नहीं होता : बॉम्बे हाईकोर्ट
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मुंबई बंदरगाह में जहाज़ों, नावों और बजरों में पानी की आपूर्ति करनेवाली दो कंपनियों ने रिट याचिका दायर किया जिस पर सुनवाई करते हुए बॉम्बे हाइकोर्ट ने कहा कि वृहनमुंबई नगरपालिका में तानाशाही 'राज' अभी भी चल रहा है और अधिकारियों को यह भ्रम है कि क़ानून के नियम उनपर लागू नहीं होते।

न्यायमूर्ति एसजे कठवल्ला और बीपी कोलाबावाला ने जनवरी में अपने फ़ैसले में निगम के कुछ अधिकारियों के ख़िलाफ़ कड़ी टिप्पणी की।

पृष्ठभूमि

अदालत में हार्बर वॉटर सप्लायर्स कंपनी (याचिकाकर्ता नम्बर 1) और ओके मरीन प्राइवेट लिमिटेड (याचिकाकर्ता नम्बर 2) ने याचिका दायर की थी। याचिकाकर्ता नम्बर 1 के लाइसेन्स की अवधि अभी बाँकि है पर एमसीजीएम ने उसके कनेक्शन पर पानी की आपूर्ति रोक दी।

इसी तरह नगरपालिका ने याचिकाकर्ता नम्बर 2 को भी पानी की आपूर्ति रोक दी। याचिकाकर्ताओं ने इसके लिए स्थाई समेटी के अध्यक्ष यशवंत जाधव को दोषी बताया और उससे बातचीत को भी टेप रेकर्ड किया। जाधव की पत्नी बायकुला की विधानसभा सदस्य है और मझगाँव बायकुला विधानसभा क्षेत्र में ही आता है।

दोनों याचिकाकर्ताओं ने पाया बायकुला, दारूखाना और मझगाँव के निवासियों ने पानी की क़िल्लत की शिकायत की जिसके बाद इन लोगों का पानी का कनेक्शन बंद कर दिया गया।

फ़ैसला

एडवोकेट गौरव शाह और डी नलवाड़े ने याचिकाकर्ताओं की पैरवी की। अदालत ने पूछा कि इससे पहले हुई सुनवाई में पानी का कनेक्शन काटने के बारे में अदालत को सही कारण क्यों नहीं बताया गया। कोई भी वक़ील अदालत के प्रश्न का जवाब नहीं दे पाया।

पीठ ने कहा पूछा कि जिस व्यक्ति के पास पिछले 37 साल से लाइसेन्स है उसका पानी का कनेक्शन बिना किसी पूर्व नोटिस के किस क़ानून के तहत काट दिया गया। अदालत ने पूछा कि क्या सिर्फ़ किसी मुहल्ले के लोगों की शिकायत पर स्थाई समिति का अध्यक्ष या कोई अन्य अधिकारी पानी का कनेक्शन इस तरह काट सकता है जबकि इस शिकायत के बारे में अदालत को बताया भी नहीं गया। अदालत ने पूछा कि कि किस क़ानून के तहत याचिकाकर्ता नंबर 1 की जल आपूर्ति मीटिंग के दिन ही 3 दिसंबर 2019 को काट दी गई और इस बारे में किसी तरह की पूर्व सूचना भी याचिकाकर्ता नंबर 1 को नहीं दी गई।

इसी तरह, अदालत ने ग़ौर किया कि दूसरे याचिकाकर्ता को भी एमसीजीएम ने यह कहना उचित नहीं समझा कि क्रॉस कनेक्शन के लिए वे साइट का दौरा नहीं करेंगे जबकि नवीनीकरण के अन्य सारी शर्तें पूरी हो गई थीं।

अदालत ने कहा,

"एमसीजीएम में तानाशाही का आलम यह है कि… संबंधित व्यक्ति इस भ्रम में काम कर रहे हैं कि एमसीजीएम पर कोई क़ानून लागू नहीं होता। वे सिर्फ़ नियम-क़ानूनों को ही धता नहीं बताते बल्कि वे अदालत के प्रति भी बेइमान हैं और एमसीजीएम के सहायक अभियंता अब्दुल हक़ के व्यवहार से यह स्पष्ट है।"

अदालत ने एमसीजीएम को निर्देश दिया कि वह याचिकाकर्ता का कनेक्शन बहाल करे और अब्दुल अंसारी को अदालत में हलफ़नामा दायर कर यह बताने को कहा है कि अदालत को भ्रमित करने कि लिए उसके ख़िलाफ़ क्यों नहीं कार्रवाई की जाए। अदालत ने दूसरे याचिकाकर्ता के ख़िलाफ़ जारी नोटिस को निरस्त कर दिया और कहा कि ओके मरीन ने तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश किया पर इसके लिए उसे नोटिस किया जाना चाहिए और इसकी सुनवाई होनी चाहिए।




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