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जजों को कानून के नियमों का पालन करना चाहिए या शासकों के क़ानून का?

LiveLaw News Network
13 Sep 2019 6:15 AM GMT
जजों को कानून के नियमों का पालन करना चाहिए या शासकों के क़ानून का?
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एम श्रीधर आचार्युलू

"तबादला का अधिकार बहुत ही ख़तरनाक अधिकार है जो उन जजों के लिए भारी मुश्किलें पैदा करता है और उनकी प्रतिष्ठा पर दाग़ लगाता है जिसका तबादला होता है, क्योंकि तबादला किसी नीति पर अमल की वजह से नहीं होता बल्कि तबादले के लिए जज का चुनाव मनमाने ढंग से किया जाता है और मेरी समझ में इसमें कोई अंतर नहीं है कि तबादला सरकार के कहने पर होता है या भारत के मुख्य न्यायाधीश के कहने पर"।

यह बयान सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने एसपी गुप्ता बनाम भारत संघ के ऐतिहासिक मामले में दिया था। यह टिप्पणी मद्रास हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश विजया तहिलरमानी को मेघालय हाईकोर्ट भेजने के निर्णय पर सटीक बैठती है।

मद्रास हाईकोर्ट में 75 जज हैं जबकि मेघालय हाईकोर्ट में मुख्य न्यायाधीश सहित सिर्फ़ दो जबकि यहाँ स्वीकृत जजों की संख्या तीन है। कैसे इस स्थानांतरण को "बेहतर प्रशासन के लिए हुआ तबादला"कहा जा सकता है?

यह तबादला अस्वाभाविक है। जब ताहिलरमानी ने कॉलेजियम से इस निर्णय पर पुनर्विचार करने को कहा तो उन्हें कहा गया "आपके आग्रह पर ग़ौर करना हमारे लिए संभव नहीं है" इसके बाद ताहिलरमानी ने अपना इस्तीफ़ा दे दिया। पर यह असंभव क्यों है? अगर कॉलेजियम के पास कोई कारण है तो वे कौन से हैं? या ऐसा तो नहीं कि यह तबादला अकारण है? कॉलेजियम के इस क़दम से कई तरह के सवाल उठ खड़े हुए हैं और हमारे संविधान की कई आधारभूत बातों और न्यायिक प्रशासन और न्यायिक स्वतंत्रता के बारे में संदेह पैदा हो गया है।

यह संदेह पैदा हो गया है कि 2017 में गुजरात दंगे से जुड़े बिलक़िस बानो के मामले में उन्होंने जो फ़ैसला दिया था उसके साथ उनके तबादले का कोई संबंध है? इस फ़ैसले में उन्होंने 11 लोगों की आजीवन कारावास की सज़ा को सही ठहराया था और पांच पुलिस अधिकारियों और दो डॉक्टरों को बरी किए जाने के फ़ैसले को साक्ष्य को नष्ट करने के आरोप में पलट दिया था।

न्यायमूर्ति जयंत पटेल का तबादला

इससे पूर्व, न्यायमूर्ति जयंत पटेल को इलाहाबाद हाइकोर्ट तबादला कर दिया गया था और इस क्रम में उनकी वरिष्ठता का भी ख़याल नहीं रखा गया था। वे पदोन्नति से सुप्रीम कोर्ट में नियुक्ति के लायक़ थे या किसी हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश बनाए जाने की योग्यता रखते थे। हालांकि, न्यायमूर्ति पटेल ने अपने तबादले के विरोध में त्यागपत्र दे दिया। बिना कोई कारण बताए उनके अस्वाभाविक तबादले से यह संदेह पैदा हुआ है कि इसका संबंध विवादास्पद इशरत जहाँ और तीन अन्य लोगों के मामले में सीबीआई जांच के उनके आदेश से है। उनकी निगरानी में यह जांच हुई जिसमें ख़ुफ़िया ब्यूरो (आईबी) और गुजरात पुलिस के शीर्ष अधिकारियों के नाम सामने आए।

गुजरात हाईकोर्ट बार एसोसिएशन ने उनके तबादले के ख़िलाफ़ प्रस्ताव पास किया और कहा कि सरकार के सामने नहीं झुकने की सज़ा उनको दी गई है।

दो बड़े जजों का तबादला

न्यायमूर्ति अब्दुल अकील कुरैशी का गुजरात हाईकोर्ट से बॉम्बे हाईकोर्ट तबादला कर दिया गया। ऐसा माना जाता है कि अमित शाह को शोहराबुद्दीन मामले में हिरासत में भेजने के उनके फ़ैसले के कारण ऐसा किया गया। गुजरात हाईकोर्ट ने इस तबादले के ख़िलाफ़ भी एकमत से प्रस्ताव पारित किया।

एसपी गुप्ता मामले की सुनवाई करनेवाले न्यायूमूर्ति ऊँटवालिया ने कहा, "संबंधित जज की मर्ज़ी जाने बिना उसका तबादला करने के गंभीर परिणाम होंगे और यह न्यायपालिका की प्रतिष्ठा को नुक़सान पहुँचाएगा और उसकी स्वतंत्रता को तार-तार करेगा"।

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश ख़ालिद के बयानों को अगर याद करें जो उन्होंने तबादलों के बारे में कहा था कि तबादला बर्ख़ास्तगी से ज़्यादा ख़तरनाक हथियार हो सकता है और उन्होंने इस बारे में आपातकाल की याद दिलाई। "कॉलेजियम जिस तरह से काम कर रहा है उससे यही लगता है कि हाईकोर्ट कॉलेजियम के अंगूठे के नीचे है। इससे हाईकोर्ट की गरिमा को चोट पहुँचती है और संविधान में हाईकोर्ट को जो दर्जा दिया गया है उसको कमतर करता है"।

इंदिरा गांधी की शैली

पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने तीन जजों की वरिष्ठता को नज़रंदाज़ किया और चौथे को देश का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया। यह स्पष्ट था कि प्रधानमंत्री उन तीन जजों को पसंद नहीं करती थीं क्योंकि उन्होंने सरकार के ख़िलाफ़ फ़ैसला दिया था। इस घटना के तुरंत बाद, तीनों जजों ने अपना इस्तीफ़ा दे दिया। भारत के न्यायिक इतिहास में यह एक निर्णायक मोड़ साबित हुआ। इस घटना से न्यायपालिका में शासकों की नीयत के प्रति संदेह पैदा हो गया।

तीन जजों को जिन कारणों से इस्तीफ़ा देने के लिए मजबूर होना पड़ा वह एक तरह से बिना उचित कारण के उनकी बर्ख़ास्तगी के बराबर है। यह तीन जजों की सेवा को गरिमाहीन तरीक़े से समाप्त करना है जिन्हें महाभियोग की भारी भरकम प्रक्रिया के अलावा किसी और तरीक़े से हटाया नहीं जा सकता है। महाभियोग के लिए यह ज़रूरी है कि सिद्ध आरोप के इस प्रस्ताव को सर्वाधिक सांसदों का समर्थन हासिल हो। इंदिरा गांधी को न्यायपालिका पर इस प्रतिशोधात्मक हमले के लिए आज भी याद किया जाता है।

यह अस्वाभाविक तबादला दमन से कम नहीं है। तबादले का कारण नहीं बताना और कॉलेजियम के निर्णयों को गुप्त रखना न्याय करने के बुनियादी चरित्र के ख़िलाफ़ है। सार्वजनिक सुनवाई में पारदर्शिता न्यायिक कामकाज की आधारभूत बातें हैं। तो फिर इस तरह के महत्त्वपूर्ण तबादलों के बारे में इस तरह की गोपनीयता क्यों? विशेषकर तमिलनाडु और मेघालय की जनता के साथ-साथ इस देश के लोगों को यह जानने का हक़ है कि एक मुख्य न्यायाधीश का तबादला क्यों हुआ? सुप्रीम कोर्ट और भारत संघ का यह क़ानूनी कर्तव्य है कि वह संविधान और आरटीआई अधिनियम के तहत इन तबादलों के कारणों को सार्वजनिक करें।

अभी हाल ही में दिवंगत प्रख्यात वक़ील राम जेठमलानी ने क़ानून मंत्री के रूप में सभी फ़ाइलों को आम लोगों के लिए खोल दिया था। पर नौकरशाहों के दबाव में इस परिपाटी को बंद कर दिया गया। न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा के सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के पद पर रहने के दौरान कॉलेजियम के निर्णयों को सार्वजनिक करने का ऐतिहासिक निर्णय लिया गया था। पर लिए गए निर्णय के पीछे क्या कारण थे यह बताने से इंकार क्यों किया गया?

मद्रास हाईकोर्ट के वकीलों ने मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई को पत्र लिखकर इस तबादले पर पुनर्विचार का आग्रह किया है। इन वकीलों ने जो कड़े शब्दों में अपना मेमोरेंडम भेजा है उसमें उन्होंने कहा है : "इस तरह के मनमाने तबादले से न्यायिक स्वतंत्रता को आघात पहुँचता है और जजों के आत्मविश्वास को चोट लगता है…सर्वशक्तिशाली कॉलेजियम तबादले को हथियार के रूप में प्रयोग कर रहा है जबकि कॉलेजियम किसी क़ानून से नहीं बना है बल्कि न्यायपालिका ने ही उसको गठित किया है और न्यायिक प्रशासन के मामले में किसी भी तरह का रोक या संतुलन नहीं है"।

ऊपर सुप्रीम कोर्ट के जिन जजों को उद्धृत किया गया है उनका हवाला देते हुए इस पत्र में न्याय करने की माँग की गई है। दिलचस्प यह है कि जिन तीन जजों का तबादला हुआ है उनमें सभी ने गुजरात दंगों से जुड़े मामलों की सुनवाई की है।

(एम श्रीधर आचार्युलू पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त रह चुके हैं और बेनेट यूनिवर्सिटी में संवैधानिक क़ानून के प्रोफ़ेसर हैं)

[इस आलेख में व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं, लाइव लॉ के नहीं और लाइव लॉ इसकी कोई ज़िम्मेदारी नहीं लेता।]

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