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स्क्रॉल के संपादकों ने यूपी पुलिस द्वारा दर्ज FIR रद्द करने की मांग करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दायर की

LiveLaw News Network
28 Jun 2020 3:00 AM GMT
स्क्रॉल के संपादकों ने यूपी पुलिस द्वारा दर्ज FIR रद्द करने की मांग करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दायर की
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स्क्रॉल.इन की कार्यकारी संपादक, सुप्रिया शर्मा और स्क्रॉल.इन के संपादक नरेश फर्नांडिस ने स्क्रॉल द्वारा प्रकाशित एक लेख के संबंध में उनके खिलाफ यूपी पुलिस में दर्ज प्राथमिकी (एफआईआर) रद्द करने के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दायर की है।

सुप्र‌िया शर्मा के ‌खिलाफ उत्तर प्रदेश पुलिस में एफआईआर दर्ज कराई गई है। शर्मा ने लॉकडाउन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी के एक गांव की हालत पर एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी। रामनगर पुलिस थाने में एफआईआर दज कराने वाली माला देवी ने आरोप लगाया है कि सुप्र‌िया शर्मा ने अपनी रिपोर्ट में उनके बयान को गलत तरीके से प्र‌‌काशित किया है और झूठे दावे किए हैं।

पुलिस ने शर्मा के खिलाफ अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के संबंधित प्रावधानों के साथ आईपीसी की धारा 501 (ऐसे मामलों का प्रकाशन या उत्कीर्णन, जो मानहान‌िकारक हों) और धारा 269 (लापरवाही, जिससे खतरनाक बीमारी के संक्रमण को फैलाने की आशंका हो) के तहत मामला दर्ज किया है।

शर्मा और फर्नांडिस की ओर से अधिवक्ता वृंदा ग्रोवर, स्वेताश्व अग्रवाल और राघव द्विवेदी द्वारा दायर की गई याचिका में कहा गया है कि याचिकाकर्ता एफआईआर की वैधता और शुद्धता को चुनौती दे रहे हैं और आगे याचिकाकर्ताओं की स्वतंत्रता की सुरक्षा की मांग कर रहे हैं।

"पूरी तरह से झूठी, दुर्भावनापूर्ण, निराधार और अस्थिर एफआईआर" के संबंध में याचिकाकर्ताओं ने अदालत से उनके खिलाफ कठोर कार्रवाई करने पर रोक लगाने निर्देश के निर्देश देने की मांग की।

याचिका में कहा गया,

"उक्त एफआईआर न केवल तथ्यों पर गलत है, बल्कि कानूनी आधार पर भी टिकने योग्य नहीं है, क्योंकि भारतीय दंड संहिता के तहत या अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के तहत कोई अपराध नहीं बनता है। उक्त प्राथमिकी में कानून की प्रक्रिया के दुरुपयोग, स्वतंत्र पत्रकारिता को डराने और दंडित करने का इरादा है।"

यह थी स्क्रॉल की रिपोर्ट

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में लॉकडाउन के प्रभावों पर आधार‌ित अपनी रिपोर्ट में, जिसका शीर्षक था- प्रधानमंत्री के गोद ल‌िए गांव में लॉकडाउन के दौरान भूखे रह रहे लोग, सुप्रिया शर्मा ने माला के बयान को प्र‌‌काशित किया था, जो कि कथित रूप से घरेलू कर्मचारी हैं।

रिपोर्ट में कहा गया था कि माला को लॉकडाउन के दौरान बहुत कठिनाई का सामना करना पड़ा, उन्हें राशन की कमी तक पड़ गई। हालांकि, 13 जून की एफआईआर में माला देवी ने दावा किया है कि वह घरेलू कर्मचारी नहीं हैं और उनकी टिप्पणियों को गलत तरीके से प्रस्तुत किया गया है।

उन्होंने दावा किया कि वह वाराणसी की नगरपालिका में ठेके पर सफाई कर्मी हैं, और उन्होंने लॉकडाउन के दौरान किसी भी संकट का सामना नहीं किया। उन्हे भोजन भी उपलब्‍ध था।

माला ने कहा, " शर्मा ने मुझसे लॉकडाउन के बारे में पूछा; मैंने उन्हें बताया कि न तो मुझे और न ही मेरे परिवार में किसी को कोई समस्या है।" एफआईआर में माला देवी कहती हैं, "यह कहकर कि मैं और बच्चे भूखे हैं, सुप्रिया शर्मा ने मेरी गरीबी और मेरी जाति का मजाक उड़ाया है।

उन्होंने समाज में मेरी भावनाओं और मेरी प्रतिष्ठा को चोट पहुंचाई है।" माला ने शर्मा और स्क्रॉल के एडिटर इन चीफ के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की मांग की थी। स्क्रॉल डॉट इन ने हालांकि दावा किया है कि माला देवी की टिप्पणियों को "सटीकता" के साथ रिपोर्ट किया गया है और एफआईआर स्वतंत्र पत्रकारिता को "डराने और चुप कराने" का प्रयास है।

स्क्रॉल एडिटोरियल ने वेबसाइट पर प्रकाशित एक बयान में कहा,

"स्क्रॉल डॉट इन ने 5 जून, 2020 को उत्तर प्रदेश के वाराणसी के डोमरी गांव की माला का साक्षात्कार किया। उनके बयान को आलेख में सटीकता के साथ रिपोर्ट किया गया। स्क्रॉल डॉट इन लेख का समर्थन करता है, जिसे प्रधानमंत्री के निर्वाचन क्षेत्र से रिपोर्ट किया गया है। यह एफआईआर COVID-19 लॉकडाउन के दौरान कमजोर समूहों की स्थितियों पर रिपोर्टिंग करने की कीमत पर स्वतंत्र पत्रकारिता को डराने और चुप कराने का एक प्रयास है। "

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