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कैदियों की रिहाई के लिए सुप्रीम कोर्ट के आदेश का मतलब यह नहीं कि कैदियों को अनिवार्य रूप से रिहा किया जाए : पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट

LiveLaw News Network
22 April 2020 5:30 AM GMT
कैदियों की रिहाई के लिए सुप्रीम कोर्ट के आदेश का मतलब यह नहीं कि कैदियों को अनिवार्य रूप से रिहा किया जाए : पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट
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COVID-19 महामारी के चलते जेलों में भीड़ कम करने के लिए कैदियों को रिहा करने के लिए पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट ने एक आदेश दिया था। इसी आदेश के संबंध में पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने एक जमानत याचिका का निपटारा करते हुए कुछ महत्वपूर्ण टिप्पणी की है।

न्यायमूर्ति गुरविंदर सिंह गिल की पीठ ने स्पष्ट किया है कि कैदियों की रिहाई के लिए 23 मार्च को सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए आदेश की इस तरह व्याख्या नहीं की जानी चाहिए कि कैदियों को जेलों से रिहा करने के लिए ''मजबूर'' होना पड़े।

पीठ ने कहा कि इस तरह के आदेश विभिन्न कारकों पर निर्भर करते हैं, जिसमें अपराध की गंभीरता, जेल में ज्यादा भीड़ है या नहीं और किसी भी कैदी का कोरोना टेस्ट पाॅजिटिव पाया गया है या नहीं आदि शामिल हैं।

न्यायमूर्ति गिल ने कहा कि

''सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिशा-निर्देश जारी करने का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि सभी राज्य महामारी के प्रकोप के संबंध में अपनी जेलों की स्थिति का आकलन करें। वहीं जेलों की भीड़ को कम करने के लिए अंतरिम जमानत या पैरोल पर कैदियों की रिहाई पर विचार किया जाए ताकि अगर जेलों में कोरोना वायरस का प्रकोप सामने आए तो इस बीमारी का प्रसार नियंत्रण में रह सकें। इसलिए किसी भी मामले में निर्णय करते समय कई तथ्य मार्गदर्शक कारक के रूप में काम करेंगे। जिनमें अपराध की प्रकृति, किसी कैदी को कितने साल की सजा सुनाई गई है, किसी अंडर-ट्रायल पर लगाए गए अपराध की गंभीरता या कोई ऐसा संबंधित कारक, जिस पर समिति उचित विचार कर रही है,आदि शामिल हैं।''

13 अप्रैल को दिए गए अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने इस स्थिति को भी स्पष्ट किया था। अदालत ने कहा था कि-

''हम यह स्पष्ट करते हैं कि हमने राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों को अनिवार्य रूप से कैदियों को उनकी जेल से रिहा करने का निर्देश नहीं दिया है। हमारे पूर्वोक्त आदेश का उद्देश्य यह था कि देश की वर्तमान महामारी के प्रकोप के संबंध में राज्य/ केंद्रशासित प्रदेश अपनी जेलों में स्थिति का आकलन करें और कुछ कैदियों को रिहा कर दें। इसके लिए कैदियों की श्रेणी का निर्धारण किया जाना चाहिए।''

वर्तमान मामले में, आरोपी को जीएसटी अधिनियम 2017 की धारा 132 के तहत गिरफ्तार किया गया था, जिसमें अधिकतम 5 साल की सजा है।

इसलिए अभियुक्तों ने महामारी के कारण बनी स्थितियों को आधार बनाते हुए मुख्य रूप से जमानत मांगी थी। साथ ही यह तर्क दिया था कि कैदियों की रिहाई के लिए उच्चाधिकार समिति द्वारा बनाई गई नीति के अनुसार वह जमानत के ''हकदार'' हैं। चूंकि इस नीति या पाॅलिसी के अनुसार उन कैदियों को जमानत दी जानी चाहिए जिनके खिलाफ दर्ज अपराध के मामले में 7 साल तक की सजा का प्रावधान है।

इन तर्कों को खारिज करते हुए अदालत ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार गठित उच्चाधिकार प्राप्त समिति द्वारा लिए गए निर्णय के अनुसार बड़ी संख्या में कैदी पहले सेे ही अंतरिम जमानत पर रिहा थे। इसलिए अब जेलों में कोई भीड़ नहीं है।

अदालत ने यह भी कहा कि अभी तक जेल परिसर में COVID-19 का कोई भी मामला भी सामने नहीं आया है। इसलिए अभी जेलों में COVID-19 के प्रसार का कोई खतरा अभी नहीं है। इसलिए आरोपियों की जेल के परिसर के अंदर वायरस के संपर्क में आने की आशंका गलत है।

पीठ ने कहा कि-

''यह केवल तभी होता है जब कोई व्यक्ति संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आता है, जिससे दूसरे व्यक्तियों के भी वायरस के संपर्क में आने की संभावना बढ़ जाती है। लॉकडाउन शुरू हुए 3 सप्ताह बीत चुके हैं। ऐसे में जेल में नए प्रवेशकों की संख्या न्यूनतम होगी। राज्य के वकील ने बताया है कि नाभा जेल में कोई भीड़ नहीं है और वर्तमान में कैदियों की संख्या जेल की क्षमता से कम है और जल्द ही 47 कैदियों को दूसरी जेलों में स्थानांतरित किया जाना है। यह भी दलील दी गई कि जेल परिसर के भीतर COVID-19 का कोई भी मामला सामने नहीं आया है। उपरोक्त तथ्यों को देखने के बाद यह सुरक्षित रूप से कहा जा सकता है कि नई जिला जेल, नाभा के भीतर कैदी अपेक्षाकृत सुरक्षित हैं।''

यह भी कहा गया कि-

''यह न्यायालय इस तथ्य को भी ध्यान में रख सकता है कि बिहार राज्य ने किसी भी कैदी को रिहा नहीं करने का विकल्प चुना है क्योंकि वहां की जेलों में भीड़भाड़ नहीं है। न ही जेलों में कोरोना वायरस का कोई मामला पाया गया है। उक्त तथ्य का उल्लेख सुप्रीम कोर्ट ने अपने 13 मार्च 2020 के आदेश में विधिवत रूप से किया था। चूँकि नाभा जेल में पहले से ही भीड़ नहीं है और जेल के परिसर के भीतर COVID-19 का कोई भी मामला भी सामने नहीं आया है, इसलिए अपराध की प्रकृति और गंभीरता को ध्यान में रखते हुए याचिकाकर्ता अंतरिम जमानत के हकदार नहीं है।''

न्यायमूर्ति गिल ने यह भी कहा कि कैदियों की रिहाई के लिए बनाई गई नीति के तहत अंतरिम जमानत पर रिहाई के लिए अभियुक्तों को ''पूर्ण अधिकार'' नहीं दिया गया है। अदालत ने कहा कि आरोपी द्वारा किए गए अपराध में एक भयावहता शामिल है क्योंकि उसमें एक बड़ी राशि शामिल है,जो 20 करोड़ रूपए है।

कोर्ट ने कहा कि-

''यह सही है कि वर्तमान मामला एक ऐसा मामला है जहां याचिकाकर्ताओं के खिलाफ आरोप जीएसटी अधिनियम 2017 की धारा 132 के संबंध में है,जिसमें अधिकतम 5 साल की सजा का प्रावधान है। ऐसे में नीतिगत मामलों के तहत उन विचाराधीन कैदियों के मामलों पर विचार किया जा सकता है,जिन पर लगाए गए अपराधों में सात साल तक की सजा का प्रावधान हो।

हालांकि, वर्तमान मामले में शामिल कुल राशि के मद्देनजर अपराध की गंभीरता बढ़ जाती है जो कि 20 करोड़ रुपए है। निश्चित रूप से याचिकाकर्ता को अंतरिम जमानत पर रिहा करने का विचार करते समय इस कारक पर ध्यान दिया जाना चाहिए। याचिकाकर्ताओं पर आरोप यह है कि उन्होंने राज्य के सरकारी खजाने को नुकसान पहुंचाने के लिए अपने डिजाइनों को आगे बढ़ाने के लिए बिलों और अन्य दस्तावेजों का फर्जीवाड़ा किया था। जो प्रथम दृष्टया आईपीसी की धारा 467 के तहत भी दंडनीय अपराध होगा,जिसमें आजीवन कारावास की सजा का प्रावधान है।''

इस प्रकार पीठ ने जमानत अर्जी खारिज कर दी।

केस का विवरण-

केस का शीर्षक- राजिंदर बस्सी व अन्य बनाम पंजाब राज्य

केस नंबर- सीआरएम-एम 11954/2020

कोरम-न्यायमूर्ति गुरविंदर सिंह गिल

प्रतिनिधित्व-एडवोकेट जगमोहन बंसल (याचिकाकर्ता के लिए)व पंजाब के सीनियर डीएजी गौरव धुरीवाला (राज्य के लिए)




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